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Short Essay on Guru Tegh Bahadur Ji – Guru Tegh Bahadur’s Martyrdom Day Essay in Hindi Pdf download

गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2018: गुरु तेग बहादुर सिख समुदाय के लोगों के नौवे गुरु थे और इनका असली नाम त्याग मल था | गुरु तेग बहादुर का जन्म 18 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था | उनकी शहादत के लिए गुरु तेग बहादुर की पुण्यतिथि 24 नवंबर को शहीदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है | इस्लाम कबूल न करने पर चांदनी चौक में मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने उनका सिर कटवा दिया था | आज उसी जगह पर शीषगंज नाम से गुरुद्वारा बना हुआ है | उनके त्याग और बलिदान के लिए उन्हें “हिन्द दी चादर” भी कहा जाता है |

Guru teg bahadur essay in english

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Guru Tegh Bahadur Sahib Ji is the ninth Guru of the Sikhs. He was the youngest son of Guru Hargobind Sahib Ji. He was born on April 1st, 1621 at Amritsar. His mother was Bibi Nanki Ji. His birth name was Tyag Mal but keeping in view his courage and bravery, he was named Tegh Bahadur. At the time of his eternal rest, Guru Har Krishan Sahib Ji bowed down saying, “Baba Bakale” ie. My successor is at Bakala.

Guru Tegh Bahadur Sahib Ji meditated at Bakala for about twenty years (1644-1664) and lived there with his wife Mata Gujari Ji and mother Mata Nanaki Ji. Bhai Makhan Shah Lobana, a rich businessman, revealed him at Bakala. Guru Tegh Bahadur Sahib Ji received Guruship on March 30th, 1664 when he was living at Baba Bakala.

The Mughal Emperor of India, Aurangzeb, attempted to consolidate India into one Islamic nation. In order to achieve this aim, he set out to virtually eliminate Hinduism from India. When the ninth Guru Ji heard of this from a desperate group of Hindus, he challenged the Emperor that, in order to convert all the Hindus, the Guru himself would have to embrace Islam. He offered to sacrifice everything for the cause of righteousness. As a result the Guru was imprisoned at the request of Aurangzeb in 1675, Three devout Sikhs Bhai Mati Das Ji, Bhai Sati Das Ji and Bhai Dyala Ji who accompanied the Guru were arrested and martyred in front of Guru Tegh Bahadur Sahib Ji at Delhi.

Despite being forced to watch the torture and execution of these disciples, the Guru Ji simply refused to concede to the Emperor’s demand. The Emperor Aurangzeb gave Guru Tegh Bahadur Sahib Ji three options.

1) To embrace Islam,
2) To perform miracles
3) Be ready for death.

Finally, the Guru preferred the latter. His head was chopped off publicly at Chandni Chowk in Delhi on November 11th, 1675 for being a protector of fundamental human rights. Unparalleled in the history of humankind, the martyrdom of Guru Tegh Bahadur Sahib Ji was an act of sacrifice for another religious community. The Guru Ji’s martyrdom served to awaken the collective conscience of the Sikh community, which was about to undergo a final transformation in the years to follow.

The headless body was taken away by Bhai Lakhi Shah Vanjara Ji who cremated it respectfully at his place in Delhi on November 12th, 1675. Gurdwara Rakab Ganj Sahib Ji was erected at this location to commemorate the incidence. The Severed head of Guru Tegh Bahadur Sahib Ji was then presented respectfully to, Guru Gobind Singh Ji by Bhai Jaita Ji at Sri Anandpur Sahib Ji in Punjab. Gurdwara Sis Ganj Sahib Ji has been erected inside the town of Anandpur Sahib Ji where the severed and revered head of the Guru Ji was cremated

Some writers have stated that once you promise allegiance to anybody, sacrifice your head but do not let him down at any cost. A great example of this is Guru Tegh Bahadur Sahib Ji who sacrificed his life but did not falter from his faith. Gobind Rai Ji son of Guru Tegh Bahadur Sahib Ji was nominated to Gurgaddi. Guru Gobind Singh Ji was a child of 9 years when he was called upon to shoulder the responsibilities of a Guru. Bani of Guru Tegh Bahadur Sahib Ji was entered into Sri Guru Granth Sahib Ji by Guru Gobind Singh at Talwandi Sabo Ji, Takht Sri Damdama Sahib Ji. Guru Tegh Bahadur Sahib Ji’s bani gives the message of non-attachment

Short essay on guru tegh bahadur ji

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गुरु तेगबहादुर जी का जन्म पंजाब के अमृतसर नगर में हुआ था। ये गुरु हरगोविन्द जी के पाँचवें पुत्र थे। आठवें गुरु इनके पोते ‘हरिकृष्ण राय’ जी की अकाल मृत्यु हो जाने के कारण जनमत द्वारा ये नवम गुरु बनाए गए। इन्होंने आनन्दपुर साहिब का निर्माण कराया और ये वहीं रहने लगे थे । उनका बचपन का नाम त्यागमल था। मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुग़लों के हमले के ख़िलाफ़ हुए युद्ध में उन्होंने वीरता का परिचय दिया। उनकी वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम त्यागमल से तेगबहादुर (तलवार के धनी) रख दिया।

Guru teg bahadur ji essay in english

युद्धस्थल में भीषण रक्तपात से गुरु तेगबहादुर जी के वैरागी मन पर गहरा प्रभाव पड़ा और उनका का मन आध्यात्मिक चिंतन की ओर हुआ। धैर्य, वैराग्य और त्याग की मूर्ति गुरु तेगबहादुर जी ने एकांत में लगातार 20 वर्ष तक ‘बाबा बकाला’ नामक स्थान पर साधना की। आठवें गुरु हरकिशन जी ने अपने उत्तराधिकारी का नाम के लिए ‘बाबा बकाले’ का निर्देश दिया। गुरु जी ने धर्म के प्रसार लिए कई स्थानों का भ्रमण किया। आनंदपुर साहब से कीरतपुर, रोपण, सैफाबाद होते हुए वे खिआला (खदल) पहुँचे। यहाँ उपदेश देते हुए दमदमा साहब से होते हुए कुरुक्षेत्र पहुँचे। कुरुक्षेत्र से यमुना के किनारे होते हुए कड़ामानकपुर पहुँचे और यहीं पर उन्होंने साधु भाई मलूकदास का उद्धार किया।

इसके बाद गुरु तेगबहादुर जी प्रयाग, बनारस, पटना, असम आदि क्षेत्रों में गए, जहाँ उन्होंने आध्यात्मिक, सामाजिक, आर्थिक, उन्नयन के लिए रचनात्मक कार्य किए। आध्यात्मिकता, धर्म का ज्ञान बाँटा। रूढ़ियों, अंधविश्वासों की आलोचना कर नये आदर्श स्थापित किए। उन्होंने परोपकार के लिए कुएँ खुदवाना, धर्मशालाएँ बनवाना आदि कार्य भी किए। इन्हीं यात्राओं में 1666 में गुरुजी के यहाँ पटना साहब में पुत्र का जन्म हुआ। जो दसवें गुरु- गुरु गोविंद सिंह बने।

गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस निबंध

गुरु तेगबहादुर जी सिखों के नौवें गुरु माने जाते हैं। औरंगज़ेब के शासन काल की बात है। औरंगज़ेब के दरबार में एक विद्वान पंडित आकर रोज़ गीता के श्लोक पढ़ता और उसका अर्थ सुनाता था, पर वह पंडित गीता में से कुछ श्लोक छोड़ दिया करता था।

एक दिन पंडित बीमार हो गया और औरंगज़ेब को गीता सुनाने के लिए उसने अपने बेटे को भेज दिया परन्तु उसे बताना भूल गया कि उसे किन किन श्लोकों का अर्थ राजा से सामने नहीं करना था। पंडित के बेटे ने जाकर औरंगज़ेब को पूरी गीता का अर्थ सुना दिया। गीता का पूरा अर्थ सुनकर औरंगज़ेब को यह ज्ञान हो गया कि प्रत्येक धर्म अपने आपमें महान है किन्तु औरंगजेब की हठधर्मिता थी कि वह अपने के धर्म के अतिरिक्त किसी दूसरे धर्म की प्रशंसा सहन नहीं थी।

औरंगज़ेब ने सबको इस्लाम धर्म अपनाने का आदेश दे दिया और संबंधित अधिकारी को यह कार्य सौंप दिया। औरंगज़ेब ने कहा -‘सबसे कह दो या तो इस्लाम धर्म कबूल करें या मौत को गले लगा लें।’ इस प्रकार की ज़बर्दस्ती शुरू हो जाने से अन्य धर्म के लोगों का जीवन कठिन हो गया।

जुल्म से ग्रस्त कश्मीर के पंडित गुरु तेगबहादुर के पास आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार इस्लाम को स्वीकार करने के लिए अत्याचार किया जा रहा है, यातनाएँ दी जा रही हैं। हमें मारा जा रहा है। कृपया आप हमारे धर्म को बचाइए। गुरु तेगबहादुर जब लोगों की व्यथा सुन रहे थे, उनके 9 वर्षीय पुत्र बाला प्रीतम (गुरु गोविंदसिंह) वहाँ आए और उन्होंने पिताजी से पूछा-

‘पिताजी, ये सब इतने उदास क्यों हैं? आप क्या सोच रहे हैं?’

गुरु तेगबहादुर ने कश्मीरी पंडितों की सारी समस्याएं बाला प्रीतम को बताईं तो उन्होंने पूछा- ‘इसका हल कैसे होगा?’

गुरु साहिब ने कहा- ‘इसके लिए बलिदान देना होगा।’

बाला प्रीतम ने कहा-‘ आपसे महान पुरुष कोई नहीं है। बलिदान देकर आप इन सबके धर्म को बचाइए।’

उस बच्चे की बातें सुनकर वहाँ उपस्थित लोगों ने पूछा- ‘यदि आपके पिता बलिदान देंगे तो आप यतीम हो जाएँगे। आपकी माँ विधवा हो जाएगीं।’

बाला प्रीतम ने उत्तर दिया- ‘यदि मेरे अकेले के यतीम होने से लाखों बच्चे यतीम होने से बच सकते हैं या अकेले मेरी माता के विधवा होने जाने से लाखों माताएँ विधवा होने से बच सकती है तो मुझे यह स्वीकार है।’

तत्पश्चात गुरु तेगबहादुर जी ने पंडितों से कहा कि आप जाकर औरंगज़ेब से कह दें कि यदि गुरु तेगबहादुर ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके बाद हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और यदि आप गुरु तेगबहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा पाए तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे’। औरंगज़ेब ने यह स्वीकार कर लिया।

गुरु तेगबहादुर दिल्ली में औरंगज़ेब के दरबार में स्वयं गए। औरंगज़ेब ने उन्हें बहुत से लालच दिए, पर गुरु तेगबहादुर जी नहीं माने तो उन पर ज़ुल्म किए गये, उन्हें कैद कर लिया गया, दो शिष्यों को मारकर गुरु तेगबहादुर जी को ड़राने की कोशिश की गयी, पर वे नहीं माने। उन्होंने औरंगजेब से कहा- ‘यदि तुम ज़बर्दस्ती लोगों से इस्लाम धर्म ग्रहण करवाओगे तो तुम सच्चे मुसलमान नहीं हो क्योंकि इस्लाम धर्म यह शिक्षा नहीं देता कि किसी पर जुल्म करके मुस्लिम बनाया जाए।’

गुरुद्वारा शीश गंज साहिब – औरंगजेब यह सुनकर आगबबूला हो गया। उसने दिल्ली के चाँदनी चौक पर गुरु तेगबहादुर जी का शीश काटने का हुक्म ज़ारी कर दिया और गुरु जी ने हँसते-हँसते बलिदान दे दिया। गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके ‘शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’ है।

Guru teg bahadur ji essay in english

Guru Teg Bahadur Sahib was the ninth guru of the Sikhs. One of the tenets of Sikhism is the universal brotherhood of man which was espoused by the founder if the Sikh religion, Guru Nanak Dev Ji. His was a vision that transcended all barriers of caste, creed, race, religion and gender to bring all humanity under a single umbrella of common brotherhood. All successive Sikh Gurus practiced, preached and protected this moral ideal.

Guru Tegh Bahadur was a pious man whose life was a living example of humility, piety and compassion and whose sublime poetry embodies worldly detachment and is incorporated in the Sikh holy scripture, The Guru Granth Sahib. Guruji is often referred to as Hind Ki Chadar, meaning The Shielder of the Hindus.

During the time of Guru Teg Bahadur Sahib, India was ruled by the Mughals under the fanatic and cruel Emperor Aurangzeb. He with single minded determination headed a relentless campaign of forcible conversions of Hindus to Islam, starting in North India, in Kashmir and Punjab. His sole motive was to turn India into an Islamic state.

Susequently, Guru Teg Bahadur Sahib was arrested and presented before Aurangzeb. On Guruji’s refusal to accept Islam as well as his refusal to perform miracles to prove his divinity, Guruji and his followers who had accompanied him were subjected to various types of physical torture for 5 days.

When Teg Bahadur Sahib still did not relent, he was beheaded in public, in broad daylight in the middle of a public square, in Chandni Chowk, Delhi on November 11, 1675. Guruji was charged with being a stumbling block in the spread of Islam

oday, Gurudwara Sis Ganj stands at the spot where Guru Teg Bahadur Sahib was executed and Gurudwara Rakab Ganj, stands at the site where Lakhi Shah performed Guruji’s last rites by burning down his house.

Guruji’s Martyrdom day is celebrated every year all over the country and is known as Shahidi Diwas.

Shri guru teg bahadur essay in punjabi

ਨੌਵੇਂ ਗੁਰੂ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਦੀ ਵਰ੍ਹੇਗੰਢ ਸ਼ਹੀਦ ਦਿਵਸ ਵਜੋਂ ਮਨਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ 24 ਨਵੰਬਰ, 1675 ਨੂੰ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋਏ ਸਨ. ਕੁਝ ਇਤਿਹਾਸਕਾਰਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ 11 ਨਵੰਬਰ, 1675 ਨੂੰ ਸ਼ਹੀਦ ਹੋਏ ਸਨ. ਮੁਗਲ ਸਮਰਾਟ ਔਰੰਗਜ਼ੇਬ ਨੇ ਆਪਣਾ ਸਿਰ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨੂੰ ਕੱਟ ਦਿੱਤਾ ਸੀ ਔਰੰਗਜ਼ੇਬ ਸਿੱਖ ਗੁਰੂ ਇਸਲਾਮ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਨਾ ਚਾਹੁੰਦਾ ਸੀ ਪਰ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨੇ ਇਸ ਤੋਂ ਇਨਕਾਰ ਕਰ ਦਿੱਤਾ. ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਦੇ ਬਲੀਦਾਨ ਅਤੇ ਬਲੀਦਾਨ ਲਈ, ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ “ਹਿੰਦ ਦੀ ਸ਼ੀਟ” ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ. ਜਿੱਥੇ ਜਗ੍ਹਾ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਦੀ ਮੌਤ ਹੋ ਗਈ ਸੀ ਤੇ ਮੁਗਲ ਸਮਰਾਟ ਦੇ ਸਿਰ ਦਿੱਲੀ ਵਿੱਚ ਉਸੇ ਹੀ ਜਗ੍ਹਾ ‘ਤੇ ਅੱਜ Sishganj ਗੁਰਦੁਆਰਾ ਹੈ. ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਦਾ ਜਨਮ 18 ਅਪ੍ਰੈਲ 1621 ਨੂੰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਖੇ ਹੋਇਆ ਸੀ. ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਦਾ ਅਸਲ ਨਾਂ ਤਰੰਗ ਮੱਲ ਸੀ. ਉਹ ਤੇਗ ਬਹਾਦਰ ਜੰਗ ਵਿਚ ਮੁਗ਼ਲ ਫੌਜ ਦੇ ਖਿਲਾਫ ਸ਼ਾਨਦਾਰ ਤਾਕਤ ਦੀ ਦਿਖਾ, “” ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਦੇ ਬਾਅਦ ਰੱਖਿਆ ਮਿਲ ਗਿਆ. 16 ਅਪ੍ਰੈਲ 1664 ਨੂੰ ਉਹ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਨੌਵਾਂ ਗੁਰੂ ਬਣੇ.

ਗੁਰੂ Tegh ਬਹਾਦੁਰ ਦੇ ਮੁਗਲ ਸਮਰਾਟ ਔਰੰਗਜ਼ੇਬ ਨੇ ਕਸ਼ਮੀਰੀ ਪੰਡਤਾਂ ਦੇ ਨਾਲ ਜੰਗ ਸ਼ੁਰੂ ਕੀਤੀ. ਕਸ਼ਮੀਰੀ ਪੰਡਤ ਮੁਗਲ ਰਾਜ ਨੂੰ ਜ਼ਬਰਦਸਤੀ ਮੁਸਲਮਾਨ ਬਣਾਉਣ ਦਾ ਵਿਰੋਧ ਕਰ ਰਿਹਾ ਸੀ. ਉਸਨੇ ਆਪਣੇ ਆਪ ਨੂੰ ਬਚਾਉਣ ਲਈ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨਾਲ ਬੇਨਤੀ ਕੀਤੀ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨੇ ਉਸਨੂੰ ਆਪਣੇ ਕਾਬੂ ਹੇਠ ਲੈ ਆਂਦਾ ਮੁਗਲ ਸਮਰਾਟ ਇਸ ਤੋਂ ਬਹੁਤ ਗੁੱਸੇ ਹੋ ਗਿਆ ਜੁਲਾਈ 1675 ਵਿਚ, ਗੁਰੂ ਤੇਗ਼ ਬਹਾਦੁਰ ਆਪਣੇ ਤਿੰਨ ਹੋਰ ਚੇਲਿਆਂ ਨਾਲ ਅਨੰਦਪੁਰ ਲਈ ਦਿੱਲੀ ਚਲੇ ਗਏ. ਇਤਿਹਾਸਕਾਰਾਂ ਅਨੁਸਾਰ, ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨੂੰ ਜੁਲਾਈ 1875 ਵਿਚ ਮੁਗ਼ਲ ਫ਼ੌਜ ਦੁਆਰਾ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ. ਕਰੀਬ ਬਾਅਦ ਪਿੰਜਰੇ ਨੂੰ ਬੰਦ ਚਾਰ ਮਹੀਨੇ ਦਿੱਲੀ ਲਿਆਇਆ ਗਿਆ ਸੀ ਲਈ ਹੋਰ ਤਿੰਨ-ਨੂੰ ਕੈਦ ਮੁਗਲ ਸਾਮਰਾਜ ਦੀ ਰਾਜਧਾਨੀ ਸੀ.

ਇਹ ਮੰਨਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨੂੰ 4 ਨਵੰਬਰ 1675 ਨੂੰ ਦਿੱਲੀ ਲਿਆਂਦਾ ਗਿਆ ਸੀ. ਮੁਗ਼ਲ ਸਮਰਾਟ ਨੇ ਗੁਰੂ ਤੇਗ਼ ਬਹਾਦਰ ਜੀ ਨੂੰ ਇਸਲਾਮ ਦੇ ਵਿਚਕਾਰ ਮੌਤ ਦੀ ਚੋਣ ਜਾਂ ਸਵੀਕਾਰ ਕਰਨ ਲਈ ਕਿਹਾ. ਉਹਨਾਂ ਨੂੰ ਡਰਾਉਣ ਲਈ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਤਿੰਨ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਜਿਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਉਹਨਾਂ ਨਾਲ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ, ਕੱਟ ਗਏ, ਪਰ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਤੋਂ ਡਰਦੇ ਨਹੀਂ ਸਨ. ਸ੍ਰੀਮਤੀ ਜੀ ਦੇ ਸਰੀਰ ਦੇ ਦੋ ਟੁਕੜੇ ‘ਤੇ ਉਸ ਦੇ ਭਰਾ ਨਾਲ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਸੀ, ਭਾਈ ਦਯਾਲ ਦਾਸ ਕੇ ਤੇਲ ਅਤੇ ਭਰਾ ਦੇ cauldrons ਵਿੱਚ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ ਹੈ ਜਿੰਦਾ ਸਤੀ ਦਾਸ ਦੀ ਕਾਰਵਾਈ’ ਚ ਲਾਪਤਾ ਹੋ ਗਿਆ ਹੈ. ਜਦੋਂ ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨੇ ਇਸਲਾਮ ਨੂੰ ਸਵੀਕਾਰ ਨਹੀਂ ਕੀਤਾ ਤਾਂ ਔਰੰਗਜੇਬ ਨੇ ਉਸ ਨੂੰ ਮਾਰ ਵੀ ਦਿੱਤਾ. ਆਪਣੀ ਸ਼ਹਾਦਤ ਤੋਂ ਪਹਿਲਾਂ, ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨੇ 8 ਜੁਲਾਈ, 1 9 75 ਨੂੰ ਗੁਰੂ ਗੋਬਿੰਦ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਸਿਖਾਂ ਦੇ ਦਸਵੇਂ ਗੁਰੂ ਦੇ ਤੌਰ ਤੇ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਸੀ.

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