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गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस – Guru Tegh Bahadur’s Martyrdom Day

गुरु तेग बहादुर शहीदी दिवस 2018: इस बार 24 नवंबर को गुरु तेग बहादुर की पुण्यतिथि मनाई जाएगी | गुरु तेग बहादुर सिख समुदाय के लोगों के नौवे गुरु थे | इन्होने धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे | गुरु तेग बहादुर का जन्म 18 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था | उनकी शहादत के लिए गुरु तेग बहादुर की पुण्यतिथि को शहीदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है | इस्लाम कबूल न करने पर चांदनी चौक में मुग़ल बादशाह औरंगजेब ने उनका सिर कटवा दिया था | आज उसी जगह पर शीषगंज नाम से गुरुद्वारा बना हुआ है | उनके त्याग और बलिदान के लिए उन्हें “हिन्द दी चादर” भी कहा जाता है |

Guru teg bahadur in hindi

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गुरु तेग बहादुर का जन्म पंजाब के अमृतसर में हुआ था | उनका बचपन का नाम त्याग मल था | वह सिख समुदाय के नवे गुरु थे जो एक सदाचारी व्यक्ति थे | इनका जन्म मुगलों के शाशन काल में हुआ था | इन्होने धर्म और मानवता के लिए अपने प्राण त्याग दिए थे | इन्ही के बलिदान से हिन्दू धर्म की रक्षा हुई थी | जब वह 14 वर्ष के थे तब अपने पिता के साथ मुग़लों के विरूद्ध युद्ध में वीरता का परिचय दिया जिसके बाद से उनके पिता हरगोविंद ने उनका नाम तेग बहादुर रख दिया | जब मुग़ल शाशक औरंजेब ने जबरदस्ती इन्हे इस्लाम धर्म को अपनाने के लिए कहा तो इन्होने इंकार कर दिया, तब क्रोधित होकर उसने चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर का सिर कटवा दिया , इस प्रकार उन्होंने धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे | गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके ‘शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’ है।

Guru tegh bahadur history in hindi

गुरु तेग बहादुर जीवनी

गुरु तेग बहादुर का जन्म 18 अप्रैल 1621 में अमृतसर में हुआ था | इनके पिता का नाम गुरु हरगोबिंद और माता का नाम नानकी देवी था | वह बचपन से ही ध्यान मग्न रहते थे | वह छोटी आयु में ही घर से निकल गए थे जिसके बाद उन्होंने कई जगह ब्रह्मण किया और सिख धर्म का प्रचार भी किया फिर वह पटना आगए और पटना में माता और पत्नी को छोड़ कर वह पंजाब चले गए जिसके मध्य उनके पत्नी के संतान हो गयी और फिर उन्होंने अपनी माता पत्नी और पुत्र को भी पंजाब बुला लिया था | वहीं इन्होने कश्मीरी पंडितों द्वारा की औरंगजेब द्वारा बलपूर्वक इस्लाम धर्म अपनाने की बात सुनी | कुछ दिन बाद जब कश्मीरी पंडित उनकी शरण में आये तो उनके पुत्र ने अपना बलिदान देकर उनकी रक्षा की बात अपने पिता से कही और इस बात पर उन्होंने औरंगजेब को सन्देश भिजवाया की सबसे पहले वो उन्हें इस्लाम धार अपनाने को राजी करे फिर पंडितों को, जो की सम्भव नहीं था | जब औरंगजेब उनसे मिला और जबरदस्ती उन्हें इस्लाम धर्म को अपनाने के लिए कहा तो इन्होने इंकार कर दिया, तब क्रोधित होकर उसने चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर का सिर कटवा दिया , इस प्रकार उन्होंने धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए |

Guru tegh bahadur history in hindi

पंजाब के अमृतसर में गुरु तेग बहादुर का जन्म हुआ था | इनके पिता का गुरु हरगोबिंद और माता नानकी देवी थे | वह बहुत छोटी आयु से ध्यानमग्न और एकांत विचारात्मक थे | वह अपने भाइयों के परिवार द्वारा बनाये गए षड्यंत्रों से परेशान होकर व संसार से विरक्त होकर गए सिख धर्म का प्रचार करने निकल गए गए थे | फिर वह पटना आगए और पटना में माता और पत्नी को छोड़ कर वह पंजाब चले गए जिसके मध्य उनके पत्नी के एक सुनार पुत्र हुआ और फिर उन्होंने अपनी माता व पत्नी और पुत्र को भी पंजाब बुला लिया था | वहीं इन्होने कश्मीरी पंडितों द्वारा की औरंगजेब द्वारा बलपूर्वक इस्लाम धर्म अपनाने की बात सुनी और जब कश्मीरी पंडित उनकी शरण में आये तो उनके पुत्र ने अपना बलिदान देकर उनकी रक्षा की बात अपने पिता से कही और इस बात पर उन्होंने औरंगजेब को सन्देश भिजवाया की सबसे पहले वो उन्हें इस्लाम धार अपनाने को राजी करे फिर पंडितों को, जो की सम्भव नहीं था | जब औरंगजेब उनसे मिला और जबरदस्ती उन्हें इस्लाम धर्म को अपनाने के लिए कहा तो इन्होने इंकार कर दिया, तब क्रोधित होकर उसने चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर का सिर कटवा दिया , इस प्रकार उन्होंने धर्म की रक्षा करते हुए अपने प्राण त्याग दिए | गुरु तेगबहादुरजी की याद में उनके ‘शहीदी स्थल’ पर गुरुद्वारा बना है, जिसका नाम गुरुद्वारा ‘शीश गंज साहिब’ है।

Guru tegh bahadur ji history in punjabi

ਗੁਰੂ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਸਿੱਖ ਧਰਮ ਦੇ ਧਰਮ ਦੇ ਦਸ ਗੁਰੂਆਂ ਵਿੱਚੋਂ ਨੌਵਾਂ ਸਨ. ਛੇਵੇਂ ਸਿੱਖ ਗੁਰੂ, ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਦੇ ਪੰਜ ਪੁੱਤਰਾਂ ਵਿਚੋਂ ਸਭ ਤੋਂ ਛੋਟੇ, ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਤਲਵਾਰਾਂ ਦੀ ਮਾਰਸ਼ਲ ਆਰਟ ਅਤੇ ਛੋਟੀ ਉਮਰ ਤੋਂ ਘੋੜੇ ਦੀ ਸਿਖਲਾਈ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋਈ. ਉਸਨੇ ਬਾਬਾ ਬੁੱਢਾ ਅਤੇ ਭਾਈ ਗੁਰਦਾਸ ਤੋਂ ਧਾਰਮਿਕ ਸਿਖਲਾਈ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀ. ਉਹ ਇਕ ਬਹਾਦਰ ਨੌਜਵਾਨ ਬਣ ਗਿਆ ਅਤੇ ਆਪਣੇ ਪਿਤਾ ਅਤੇ ਹੋਰ ਸਿੱਖਾਂ ਨਾਲ ਉਹਨਾਂ ਦੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਵਿਚ ਆ ਗਏ ਅਤੇ ਮੁਗ਼ਲ ਫ਼ੌਜੀਆਂ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਜੰਗਾਂ ਵਿਚ ਬਹਾਦਰੀ ਦਿਖਾਈ. ਹਾਲਾਂਕਿ, ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਵਿਖੇ 1634 ਵਿਚ ਇਕ ਖਾਸ ਤੌਰ ‘ਤੇ ਖੂਨੀ ਲੜਾਈ ਦੇ ਬਾਅਦ, ਉਹ ਸੰਨਿਆਸ ਅਤੇ ਧਿਆਨ ਦੇ ਰਾਹ ਵੱਲ ਮੁੜਿਆ. ਇਸ ਦੌਰਾਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਪਿਤਾ ਹਰਰਾਇ ਨੇ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੇ ਕੁਦਰਤੀ ਉੱਤਰਾਧਿਕਾਰੀ ਵਜੋਂ ਚੁਣਿਆ, ਜੋ ਸਿੱਖਾਂ ਦੇ ਸੱਤਵੇਂ ਗੁਰੂ ਬਣੇ. ਹਰ ਰਾਏ ਖੁਦ ਦੇ ਪੁੱਤਰ ਹਰ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣ ਦੁਆਰਾ ਸਫ਼ਲ ਹੋ ਗਿਆ ਸੀ. ਮਾਰਚ 1664 ਵਿਚ ਗੁਰੂ ਹਰ ਕ੍ਰਿਸ਼ਣ ਨੇ ਚੇਚਕ ਨੂੰ ਠੇਸ ਪਹੁੰਚਾਈ ਅਤੇ ਆਪਣੀ ਮੌਤ ਤੋਂ ਥੋੜ੍ਹੀ ਦੇਰ ਪਹਿਲਾਂ ਉਸ ਨੇ ਅਨੁਯਾਈਆਂ ਨੂੰ ਦੱਸਿਆ ਕਿ ਉਸ ਦਾ ਉੱਤਰਾਧਿਕਾਰੀ Bakala ਵਿਚ ਮਿਲੇਗਾ. ਕੁਝ ਰਹੱਸਵਾਦੀ ਘਟਨਾਵਾਂ ਤੋਂ ਬਾਅਦ ਤੇਗ ਬਹਾਦੁਰ ਨੂੰ ਉੱਤਰਾਧਿਕਾਰੀ ਵਜੋਂ ਮਾਨਤਾ ਦਿੱਤੀ ਗਈ ਅਤੇ ਸਿੱਖ ਗੁਰੂ ਨੂੰ ਨਿਯੁਕਤ ਕੀਤਾ ਗਿਆ ਗੁਰੂ ਹੋਣ ਦੇ ਨਾਤੇ ਉਹ ਭਾਰਤ ਦੇ ਕਈ ਹਿੱਸਿਆਂ ਦਾ ਦੌਰਾ ਕੀਤਾ ਅਤੇ ਕਈ ਭਜਨ ਰਚ ਗਏ. ਉਹ ਸਾਰਿਆਂ ਲਈ ਧਾਰਮਿਕ ਆਜ਼ਾਦੀ ਵਿਚ ਵਿਸ਼ਵਾਸ ਰੱਖਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਇਸਨੇ ਮੁਗਲ ਸਮਰਾਟ ਔਰੰਗਜੇਬ ਨਾਲ ਲੜਾਈ ਵਿਚ ਇਸ ਨੂੰ ਲੈ ਆਂਦਾ ਜਿਸ ਨੇ ਹੁਕਮ ਦਿੱਤਾ ਕਿ ਗੁਰੂ ਨੂੰ ਬੇਰਹਿਮੀ ਨਾਲ ਕਤਲ ਕੀਤਾ ਜਾਵੇ.

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