शिव पर कविता | Shivaratri poems in hindi | महाशिवरात्रि पर कविता

शिव_इमेज_3

शिवरात्रि हिन्दू का पवित्र त्योहार है । इस दिन भगवान शिव की पूजा,अर्चना की जाती हैं, उनके लिए व्रत भी रखा जाता है ओर मान्यता है की इस दिन मांगी हुई इच्छा अवश्य पूर्ण होती है। इस दिन लोग एक दूसरे को बधाई देकर भी त्योहार हो अच्छे से मनाते है यही सब ध्यान में रखते हुए हम आपके लिए लेकर आए हैं, mahadev kavita in hindi, shiv kavita in hindi, shiv par kavita, poem on lord shiva in english, mahadev poem in hindi, Shiv arti जिनको आप अपने friends, colleagues,य किसी अन्य को भेजकर mahashivratri ki shubhkamnaye दे सकते हो।इसके अलावा आपको नीचे दी गई पंक्तियों में शिव पर कविता,भोले पर कविता,महादेव पर कविता,शिव महिमा कविता, पोयम, भगवान शिव पर कविता, शिव कवित्त, शिव चालीसा आदि मिलेंगे।

हे शिव जब सब ही तेरा हैं

हे शिव जब सब ही तेरा हैं
फिर जन जंग तेरा मेरा क्यो
हर शासे हर धड़कन तेरी
ब्ररहमाण्ड का हैं कन कन तू
हर इक मे है तेरी शक्ती
फिर मैं कर्ता मन भजता क्यू
हे शिव जब सब ही तेरा हैं

सुख भी तेरा दुख भी तेरा
रात और प्रभात भी तेरी
जीवन मिले या काल घिरे हो
बढे इशारे पा कर तेरी
फिर काहे भरमाए सुख मन
दुख से आखिर डरता क्यो
हे शिव जब सब ही तेरा हैं

तूने रचा हर एक बनाया
गोरा काला रूप करूप
काटें पुष्प कमल और कीचड़
सागर लहरे छाया और धूप
फिर काहे करे एक प्रेम
दूजे से घ्रिणा मन करता क्यो
हे शिव जब सब ही तेरा हैं

शिव_इमेज_1

 

शिव के साथ चलता रहूंगा

शिव के साथ चलता रहूंगा
प्रेम बांटता रहूंगा
ज्ञान पाता रहूंगा
पवित्र बनने की कोशिश करूंगा

अगर न कर पाया कोई भी कार्य
तो करता रहूंगा एक ही कार्य
शिव भक्ति फ़ैलाने का कार्य
शिव को सबका बनाने का कार्य

जब अंत समय निकट आएगा
शिव का दिव्य विमान नज़र आएगा
जाऊँगा शिव धाम की ओर
शिव के हाथो में है मेरी डोर

पाऊंगा शिव चरणों में स्थान
महादेव है सबसे महान
लुटा दू उनपे ये सारा जहाँ
वो है मेरा अभिमान

अंत में मोक्ष पा जाऊँगा
फिर लौट कर इस दुनिया में नहीं आऊंगा
अगर आना ही पड़ा इस दुनिया में
तो शिव को साथ लेकर ही आऊंगा

महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं

माघ की महारात

अद्भुत सौगात
शिव से शिव का संवाद
अनहद नाद
पिंड से ब्रह्माण्ड तक
ब्रह्माण्ड से पिंड तक
विष का शमन
ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन

महा शिव रात्रि
कोई त्यौहार नहीं है
केवल किसी उपासना का
आधार नहीं है

इस विज्ञान से भी बड़ा महा विज्ञान है
पिंड में जीवन का एक मात्र संज्ञान है

शिव की शक्ति
शक्ति का शिव
किसी की भक्ति
किसी का इव
सृजन का आधार
संस्कृति का आभार
प्रकृति का उद्धार
अप्रकृति का संहार

यह मृत्यु का जीवन है,
अमृत का सागर है
निशानिमन्त्रण है,
आत्म नियंत्रण है
विष है, सुधा है
तृप्ति है, क्षुधा है
आग्रह है, अबीर है
सुख है, पीर है
कुछ अंत है, कहीं अनंत है
वही शिव है, वही संत है।

अबकी फिर आयी है
शिव की रात
मन से देखें
प्रकृति की बारात
इस माघ की महानिशा
बदलेगी दिशा
उर्ध्वगामी ऊर्जा का प्रवाह
संभावनाएं अथाह

सुख की मात्रा
महादेव की महायात्रा
सती की आह
गंगा का प्रवाह
बिल्वपत्र से पलाश तक
धरती से कैलाश तक
ज्योतिर्पीठों के लिंग
हिमग्राम का आत्मलिंग

परमाणु से परमाणु तक
महकाया से विषाणु तक
संध्या से प्रभा तक
क्लांति से आभा तक

अर्चना
आराधना
उपासना
साधना
पूजा
वंदना
स्तुति
अर्घ्य
हवन
और आरती
अद्भुत है भारती

पृश्नि ब्रह्माण्ड में
जम्बू द्वीप में
आर्यावर्त की
यही तो शक्ति है
संहार से पूर्व
सृजन
पोषण और संवेदना में
जो समायी है
यही शिवभक्ति है।

शिव_इमेज_5

Shiv Mahima

अंत:शक्ति, शिव सबका संयोग।
शिव को जो जपता रहे, सहे न कभी वियोग।
शिव सद्गुण विकसित करें, जाग्रत मन-मस्तिष्क
शिव की पूजन से बने, जीवन सुखद सुयोग।

आत्मज्ञान और मुक्ति का, शिव हैं आत्मस्वरूप।
शिव समान दाता नहीं, भक्ति-भोग अनुरूप।

शिव के बिन तन शव रहे, मिले न मुक्ति मार्ग।
शिव देवों के देव हैं, शिव शक्ति प्रतिरूप।

शिव अभिषेक अमोघ है, हर्ता दुर्धर पाप।
शिव पूजन मन से हरे, कोटि जन्म संताप।
पुण्य संपदा और धन, शिव स्तुति परिणाम।
बिल्वपत्र हरता सदा, दैहिक दैविक ताप।
गुरुओं के भी हैं गुरु, शिव हैं मूलाधार।
मन वांछित पूरित करें, शिव की शक्ति अपार।
शिव आत्मा के अधीश्वर, शिव ऊर्जा के मूल।
शिव परात्पर ब्रह्म हैं, शिव हैं जगत आधार।

श्रावण माह में शिव कृपा, बरसे मेह समान।
सोमवार का व्रत रखो, शिव को अपना मान।
श्रावण में अभिषेक से, मिलते पुण्य हजार।
जीवन को प्रगति मिले, मिलता सुख-सम्मान।

हर वर्ष अनेक भक्त shivratri का बेसब्री से इंतज़ार करते हैं और आप शिवरात्रि पर शायरी के द्वारा अपनी भक्ति को व्यक्त कर सकते हैं।

Shiv Bhakti 

नमन तुम्हे शिव! जिसकी महिमा
अपरम्पार, अम्बर सा जो
पारदर्शी है, गुण सब जिस में
सृष्टि सृजन के,
पालन और भंग करने के
विश्व अनेकों! काश भक्ति,
तीव्र भक्ति मेरे जीवन की
मिल जाए उस से, उस शिव से,
स्वामी सबका हो कर भी जो परे स्वयं से .

जो शाश्वत स्वामी है सबका,
जो सारे भ्रम का है हर्ता,
जिसका सबसे उत्कृष्ट प्रेम, प्रकट है,
सब नामों में बढकर नाम.
“महादेव” जो सबका धाम!

पावन आलिंगन में जिसके प्रेम बरसता ,
दर्शाता अपने अंतर में कि शक्ति ये
क्षीण मात्र और परिवर्तनीय.

निहित जहाँ अंधड़ अतीत के,
संस्कार उद्वेलित शक्ति
तीव्र ,जल जैसे उमढाता लहरें;
जिसमे ‘मैं’ ‘तू’ द्वन्द उपजता
बढ़ता, पलता; उसे नमन,
शिव में स्थित, शांति प्रगाढ़!

जहाँ बोध जनक-जन्यों का,
शुचि विचार, असीमित रूप,
समाहित होते सत्य में; मिट जाता
बोध अन्तः-बाह्य का-
प्राण वायु हो जाती शांत-
पूजूँ मैं उस ‘हर’ को हरता जो
मन की गतिविधियाँ शिव का स्वागत!

हर क्लेश और तम का नाशक,
अभ्रक ज्योति, श्वेत व सुन्दर
श्वेत कमल के खिलने जैसा,
अट्टहास से ज्ञान बिखेरे;
जो निरत रहे आत्मध्यान में,
दर्शन देता ह्रदय कमल में,
राजहंस जो शांत झील का
मेरे मन की, रक्षक मेरा, नमन है उसे!

वह जो पूर्ण अमंगल हर्त्ता,
निष्कलंक करता युग युग को;
दक्ष सुता ने दिया जिसे कर;
जो है श्वेत कमलिनी सा मधु,
सुन्दर; सदा रहे तत्पर जो
प्राण त्यागने परहित प्रतिपल, दृष्टि
निहित दुर्बल दरिद्र पर; कंठ नील है
विष धारण से;
उसे है नमन!

आदिगुरु

आदिगुरु
पर्वत पर बैठे उस वैरागी
से दूर रहते थे तपस्वी भी
पर उन सातों ने किया सब कुछ सहन
और उनसे नहीं फेर सके शिव अपने नयन
उन सातों की प्रचंड तीव्रता
ने तोड़ दिया उनका हठ व धृष्टता
दिव्यलोक के वे सप्त-ऋषि
नहीं ढूंढ रहे थे स्वर्ग की आड़
तलाश रहे थे वे हर मानव के लिए एक राह
जो पहुंचा सके स्वर्ग और नर्क के पार
अपनी प्रजाति के लिए
न छोड़ी मेहनत में कोई कमी
शिव रोक न सके कृपा अपनी
शिव मुड़े दक्षिण की ओर
देखने लगे मानवता की ओर
न सिर्फ वे हुए दर्शन विभोर
उनकी कृपा की बारिश में
भीगा उनका पोर-पोर
अनादि देव के कृपा प्रवाह में
वो सातों उमडऩे लगे ज्ञान में
बनाया एक सेतु
विश्व को सख्त कैद से
मुक्त करने हेतु
बरस रहा है आज भी यह पावन ज्ञान
हम नहीं रुकेंगे तब तक
जब तक हर कीड़े तक
न पहुंच जाए यह विज्ञान

शिव_इमेज_4

शिव के भक्तों को अघोरी भी बोलते हैं अगर आप सच में एक सच्चे शिव भक्त है तो आपको ये तो पता होगा की शिव तांडव की रचना रावण ने की थी इसलिए उसको शिव का महान भक्त भी कहा जाता हैं। Schools or colleges में shivratri nibandh लिखवाए जाते हैं।

शिव से सुंदर है ये जीवन

शिव से सुंदर है ये मन
ब्रह्मा और विष्णु में कौन है बड़ा

ऐसा दोनों में युद्ध छिड़ा
शिव ने प्रकट किया लिंग रूप
दोनों ने देखा उनका विराट स्वरुप

आदेश दिया गया दोनों को
देख कर आओ आदि अंत को
ब्रह्मा ने की चालाकी
कहा देख कर आ गए अंत आदि

शिव को आया बड़ा गुस्सा
ब्रह्मा ने कहा ये झूठ कैसा
कि निषेध उनकी पूजा विशेष
पर यज्ञ में दिया पद विशेष

विष्णु थे बड़े सच्चे
शिव ने दिए पद अच्छे
परमपूजनीय का दिया वरदान
क्योकि गुरु का किया सम्मान

शिव की परमभक्त माँ उमा
शिव भक्ति में पावन था समां
पाया शिव को पति रूप में
चली गयी रहने कैलाश में

दक्ष ने किया उमापति का अपमान
उमा ने अग्नि को दिया देह दान
शिव ने किया तांडव भारी
त्रहिमान करने लगी प्रजा सारी

काटा दक्ष का मस्तक
लगा दिया बकरे का मस्तक
अंत में बने बावन शक्ति धाम
खास लोगो को भी करते है जो आम

ये कथा थी बड़ी विचित्र
बड़े भयानक होंगे इसके चित्र
आगे है माँ पार्वती की कथा प्यारी
जो थी परम पवित्र नारी

माँ पार्वती का हुआ जन्म
शिव भक्ति में रही वो रम
जैसे जैसे हुई वो बड़ी
शिव भक्ति की उमंग बड़ी

नारद ने दिया ॐ नमः शिवाय मंत्र
चढ़ाती गयी वो शिवलिंग पर बेलपत्र
कठिन तपस्या करती गयी
अंत में शिव को पा गयी

गणेश का काटा शिव ने शीश
पर दे गया ये गणेश को आशीष
प्रथम पूजनीय की पदवी पायी
दुनिया उन्हें मानती है भाई

कार्तिकेय है उनको प्रिय
जो है परम आदरणीय
दक्षिण चले गए वो शिवप्रिय
बन गए दक्षिण में सर्वप्रिय

काशी में है शिव
कैलाश में है शिव
बारह ज्योतिर्लिंगों में है शिव
आदिशक्ति में है शिव

मार्कण्डेय भक्त महान
दीर्घ आयु का मिला वरदान
निषाद था भक्ति से अनजान
मिला शिव से भक्ति वरदान

शिव से है ब्रह्मज्ञान
शिव पुत्र उनसे भी महान
गणेश चतुर्थी पावन त्यौहार
जो करे गणेश भक्ति का गुणगान

शिव भक्ति में खो गया मैं
जो बसे है मेरे मन में
शिव सुनेंगे मेरी पुकार
पुकारता रहूँगा बारम्बार

मुझे इस जीवन में
शिव तत्व जगाना है मन में
जुदा न हो पाऊँ कभी शिव से
हमेशा रहू शिव के मन में

बस यही चाहता हूँ जीवन में
शिव प्रेम में खो जाऊं मै
जब तक जियूं मैं
काशी में रहू मैं

शिव से सच्चा है प्रेम
मिलता है उनसे माँ सा प्रेम
जो है ममतामयी प्रेम
जो है निश्छल प्रेम

पिता का पुत्र के प्रति प्रेम
ऐसा करते है शिव प्रेम
शिव से भक्ति का प्रेम
शिव से अतुलित प्रेम

जो बसे है हर आत्मा में
ऐसे गुण है मेरे परमात्मा में
परमानन्द में परमात्मा शिव
रखना होगी शिव भक्ति की सुदृढ़ नीव

आनंद है शिव भक्ति में
प्रेम है शिव भक्ति में
बंधन से मुक्ति है शिव भक्ति में
स्वतंत्रता है शिव भक्ति में

बांधती नहीं है शिव भक्ति
मुक्त करती है शिव भक्ति
माया से परे है शिव भक्ति
शीतल छाया है शिव भक्ति

मेरा दिल ये हर बार सोचे
मेरे आंसू तो आकर कोई पोछे
पर कोई नहीं है दुनिया वाला
बस शिव है सच्चे दिल वाला

शिव ने मुझे इस तरह देखा
कि मुझे ये जीवन जीना ही होगा
आये शिव इस तरह मेरे जीवन में
मेरे हर पल में हर क्षण में

जाऊँगा वह जंहा से आये हैं शिव
नहीं होऊंगा व्याकुल रटता रहूंगा शिव शिव
इस जीवन में शिव के साथ ही रहूंगा
ॐ नमः शिवाय जपता ही रहूंगा

शिव_इमेज_4

Shiva Glory

Salutation to Shiva! whose glory
Is immeasurable, who resembles sky
In clearness, to whom are attributed
The phenomena of all creation,
The preservation and dissolution
Of the universe! May the devotion,
The burning devotion of this my life
Attach itself to Him, to Shiva, who,
While being Lord of all, transcends Himself.

In whom Lordship is ever established,
Who causes annihilation of delusion,
Whose most surpassing love, made manifest,
Has crowned Him with a name above all names,
The name of “Mahadeva”, the Great God!
Whose warm embrace, of Love personified,
Displays, within man’s heart, that all power
Is but a semblance and a passing show.

In which the tempest of the whole past blows,
Past Samskaras, stirring the energies
With violence, like water lashed to waves;
In which the dual consciousness of “I” and “Thou”
Plays on: I salute that mind unstable,
Centred in Shiva, the abode of calm!

Where the ideas of parent and produced,
Purified thoughts and endless varied forms,
Merge in the Real one; where the existence ends
Of such conceptions as “within”, “without”–
The wind of modification being stilled–
That Hara I worship, the suppression
Of movements of the mind. Shiva I hail!

From whom all gloom and darkness have dispersed;
That radiant Light, white, beautiful
As bloom of lotus white is beautiful;
Whose laughter loud sheds knowledge luminous;
Who, by undivided meditation,
Is realised in the self-controlled heart:
May that Lordly Swan of the limpid lake
Of my mind, guard me, prostrate before Him!

Him, the Master-remover of evil,
Who wipes the dark stain of this Iron Age;
Whom Daksha’s Daughter gave Her coveted hand;
Who, like the charming water-lily white,
Is beautiful; who is ready ever
To part with life for others’ good, whose gaze
Is on the humble fixed; whose neck is blue
With the poison swallowed:
Him, we salute!

शिव_इमेज_2

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *