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गरीबी पर कविता – Poem On Poverty in Hindi – Garibi Par Kavita

Poem On Poverty in Hindi

गरीबी से आशय ऐसी स्थिति से है जिसमें व्यक्ति जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित रह जाता है। इसके अलावा, व्यक्ति के पास भोजन, आश्रय और कपड़े की अपर्याप्त आपूर्ति नहीं होती है। भारत में, अधिकांश लोग जो गरीबी से पीड़ित हैं, वे एक दिन में एक भोजन का भुगतान नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा, वे सड़क के किनारे सोते हैं; गंदे पुराने कपड़े पहनना। इसके अलावा, उन्हें उचित स्वस्थ और पौष्टिक भोजन नहीं मिलता है, न तो दवा और न ही कोई अन्य आवश्यक चीज।

Poverty poem in Hindi

देश के हालात (कविता का शीर्षक)

देखा था मैंने एक ऐसे भारत का ख्वाब ,
जिसे हो अपने अहिंसा और एकता पर रुवाब ।

सच्चाई और अच्छाई ने छोड़ा साथ ,
बदलने लगे मेरे उस भारत के हालात ।

बेटियों के साथ हो रहा अत्याचार ,
देश मे मच रहा है हाहाकार ।

सत्ता की लड़ाई में मचता हुआ होड़ ,
देश के अर्थव्यवस्था को दिया तोड़ ।

देश में दिख रही बढ़ती बेरोज़गारी ,
गरीबों के फटे जेब और मुख पर लाचारी ।

ऐसे हालातों में जी रहे हैं मेरे देश वासी ,
कोई खा रहा ज़हर , कोई लगा रहा फ़ासी ।

सुधारनी होगी हमें देश की स्थिति ,
वरना नहीं होगी अपने देश की वृत्ति ।

उठाने होंगे हमे मिल कर कदम ,
क्योंकि इस देश के यूवाओं में है दम ।

अभिनव उपाध्याय (कवि)

गरीबी इंसान को लाचार बना देती है….
जो दिन ना देखे वो सब दिखाती है
हालात के हालात बदल देती है
उसको एक मजबूर बना देती है
आओ आंखों देखा हाल बताता हूँ
ग़रीबी की दास्तां सुनाता हूँ

२)लोग देख कर भी कर देते है अनदेखा
ऐ इंसान! तूने नही देखा तो भगवान ने नही देखा
करते चलो भला जिसको ज़रूरत है
साहब! भगवान अँधा नही उसने सब देखा
अजीब सी कहानी बताता हूं
गरीबी की दास्ताँ सुनाता हूँ

३)ना जाने किसकी “हाय” बर्बाद कर दे
ना जाने कितनों की सवर जाए
ये गरीब जरूर मगर बेईमान नही है साहब
आपकी कुछ मदद से शायद दो वक्त की रोटी मिल जाए
अजीब सी दास्ताँ…………

४)दो वक्त की रोटी के लिए इधर उधर भागते है
हम शादियों में खाना बुरी तरह फेंकते है
अरे उतना ही लो जितना खाते बने
क्युकी उतना ही खाने के लिए गरीब तरसते है
एक अजीब सी दासता………

५)दो वक्त की रोटी के लिए कुछ भी बेचते है
हमे उनके लिए कुछ करना चाहिए
ना चाहते हुए भी हमे कुछ न कुछ खरीदना चाहिए
हमे समझनी चाहिए उनकी बेकरी
पता नही कौन कब बन जाए राजा से भिखारी।
आंखों देखा हाल……….

६)क्या रोना क्या धोना
उसी फुटपाथ पे है सोना
दो वक्त की रोटी मिले तो खाना
वरना खाली पेट है सोना।
अजीब सी लाचारी बताता हूं
गरीबी की दास्तां…….

७)महलो में रहने वालों से अच्छी है जिंदगी
दो वक्त की साथ मे खाते हैं
झोपड़े की नींद उनसे अच्छी है
जो पैसे को छुपाकर रात भर जगते है
एक कहानी सुनाता हूं
गरीबी की दासता……

८) कारो में बैठकर बहुत रौब झाड़ते है
कुछ माँगने पर दूर भगाते है
उतने रुपये गरीबो के लिए नही निकलते
जितना रेस्टोरेंट में टिप दे जाते है……
गरीबो से पैसे कम कराते है
10 की जगह 5 में सलटाते है
दुकानों में अपने स्वार्थ में जीते है
औऱ वहां 2000 में 2000 देखे आते है
*प्रीतम बाबू* आँखो देखा सारा हाल सुनाते है
गरीबी और उनकी लाचारी सुनाते है

Poverty poems by famous poets

Dekha tha maine ek aise Bharat ka khwab (I had dreamed about India)
Jise ho apne ahimsa aur ekta par ruwab (Who held pride in its non-violence and unity)

Sachai aur acchai ne choda sath (Truth and goodwill have left us)
Badalne lage mere us Bharat ke halaat (The scenario of my country started changing)

Betiyo ke sath ho raha atyachar (Our daughters are suffering due to crimes)
Desh mein mach raha hai hahakar (Our country has a rising crime rate)

Satta ki ladai mein machta hua hod (There is an increasing competition in national politics)
Desh ki arthvyavastha ko diya tod (We have destabilized our economy)

Desh mein dikh rahi badhti berozgari (Increasing unemployment is evident in our country)
Garibo ke fatey jeb aur mukh par lachari (The poor have empty pockets and helpless faces)

Aise halaato mein ji rahe hain mere desh wasi (My countrymen are living in such testing circumstances)
Koi kha raha zehar, koi laga raha fansi (Some are eating poison and others are hanging themselves to death)

Sudharni hogi hamein desh ki sthiti (We need to improve our country’s situation)
Varna nahi hogi apne desh ki vritti (Else we cannot expect growth of our country)

Uthane honge hamein mil kar kadam (We need to work together united)
Kyonki is deshke yuvaon mein hai dum (Because the youth of this country have great strength)

अभिनव उपाध्याय (कवि)

गरीबी पर छोटी कविता

मुझे ऐ दिल बता दे आज तू बेचैन सा क्यूँ है?
सजन की बाट कोई जोहती सी नैन सा क्यूँ है?
पढ़ा होगा वो ख़त उसने अगर उड़ती नज़र से भी,
तो पत्थर भी पिघल जायेगा, चलती ट्रेन सा क्यूँ है?

गरीबों का अगर जीवन नहीं देखा तो क्या देखा,
कोई उजड़ा हुआ गुलशन नहीं देखा तो क्या देखा,
हक़ीक़त रूबरू होकर तुम्हें अनुभव दिलाएगी,
बिना घर का कोई आँगन नहीं देखा तो क्या देखा।

हाय ! ये लाचारी क्यों बच्चो के सर आयी
न तन पर है कपडे, न पैरो में चप्पल
सर्दी की है रातें न टोपी न कम्बल

बापू की बीमारी, माँ की लाचारी
बेरहम हो गयी दुनिया सारी
रोटी के खातिर बचपन गवांयां
अश्रु से अपने जीवन भिगोया

पपड़ी पड़ें होठ
मुरझाये चेहरे
चुन रहे थे
कुछ कागज के टुकड़े

उनकी ये दसा भूख की
कहानी कह रहे थे
स्कूल जातें बच्चो को वे
टक टकी लगा देख रहें थे

बेरहम दुनिया निष्ठुर ये समाज है
मानवता के नाम पर न लोक है न लाज है

गरीबी पर कविताएं

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वाह गरीबी

क्या पायेगी तू

एक गरीब के घर जन्म लेकर

दो वक्त की रोटी जिसे

खुद भी गंवारा नही

क्या तुझे वो सुख देगा

जो तेरे हैं ठाठ-बाठ

क्या तुझे वो दे पायेगा

फिर क्यों तू

आती है ऐसे

जैसे सजधज नार नवेली

देकर चंद खुशियां तू

छिन लेती जीने का सहारा

आँखों में बसने वाली

आशाओं का वो तारा

टिमटिमाकर बुझ जायेगा

उनका आशा रूपी वह तारा।

देखा हैं मैंने बच्चो के मुख पर मुस्कान नहीं हैं,

फुटपाथों पर सोते रहने को उन्हें मकान नहीं हैं||

पाँव के छाले बोलते लहु छलकना लिखा नसीब में,

रोटी मिले सुकून से ऐसा कोई विधान नहीं हैं||

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