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मेरी उड़ान मेरी पहचान पर कविता – Meri Udaan Meri Pahchan Kavita in Hindi

हर किसी के अलग-अलग ख्वाब होते हैं कोई पैसा कमाना चाहता है तो कोई अपना नाम बनाना चाहता है की पूरी दुनिया उसे जान सके | कुछ लोग अपनी एक अलग ही पहचान बनाना चाहते हैं, जिसमे कभी-कभी वो सफल भी हो जाते और लोगों के लिए एक प्रेणना बन जाते हैं और कुछ असफल भी हो जाते हैं | अगर हम किसी अच्छे मकसद के लिए कुछ करना चाहते हैं तो उसके लिए हमे निरंतर प्रयास करते रहना चाहिए और सब्र के साथ उस पर ही ध्यान देना चाहिए |  ये कविता खासकर कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए दिए गए है|

मेरी उड़ान मेरी पहचान कविता

आप इन कविता को class 1, class 2, class 3, class 4, class 5, class 6, class 7, class 8, class 9, class 10, class 11, class 12 के बच्चे इन्हे अपने स्कूल फंक्शन celebration व प्रोग्राम में सुना सकते हैं| साथ ही आप चाहें इन्हे किसी भी भाषा जैसे Hindi, हिंदी फॉण्ट, मराठी, गुजराती, Urdu, उर्दू, English, sanskrit, Tamil, Telugu, Marathi, Punjabi, Gujarati, Malayalam, Nepali, Kannada के Language व Font में साल 2007, 2008, 2009, 2010, 2011, 2012, 2013, 2014, 2015, 2016, 2017 का full collection जिसे आप अपने स्कूल व सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे whatsapp, facebook (fb) व instagram पर share कर सकते हैं| साथ ही बालिका दिवस पर कविता देखें

मैं उस पंतग कि तरह हू, जिसकी डोर मालूम नहीं।
उड़ती हुई आसमां को छू जाती हू,
जैसे किसी की खबर नहीं।
अपनी ही राग खोई हुई, एक नई मंजिल बनाने निकली हूँ।
ज़्यादा बड़ी तो नहीं हाँ बस,अपने सपने बुनने निकली हूँ।
उन हवाओं को भी चीर जाती हूँ
जो सरदी मैं बरफ सी,और गर्मी मैं आग सी लगती।
उन चट्टानों से भी टकरा जाती,
जो कभी हिलने का नाम भी नहीं लेती।
हाँ बस इसलिए,
कि मैं खुले आसमान में उड़ने का ज़ज्बा रखती हूँ
मैं उस पतंग कि तरह हू…………..।
गर होते पर मेरे, तो पता नहीं कहा उड़ जाती।
बिना पर के हि तो सारा आसमां घूम कर आती।
टूट कर तो वो बिखरते हैं, जिनके धागे कमजोर होते हैं।
हम तो वो किड़े हैं, जो रेशम के धागे खुद बुनते हैं।
दिल में हौसला बुलंद लिए बैठी हूं
हर एक हार के लिये जबाब लिए बैठी हूं।
हो सके तो मुझे हौसला दे ईश्वर
वरना हिम्मत तो, मैं अपने साथ लिए बैठी हूँ।

Meri Udaan Meri Pahchan Kavita

Meri udaan meri pahchan poem in Hindi

gumanaam hu duniya mai abhi, par mujhe kuch naam kamana hai,
is khoi hui shakshiyat ko ek pehchaan dilana hai.

bhag rahi hu duniya ki is bheed ke sath mai bhi,
par mere kadmo ko is bheed se aage pahuchna hai
is khoi hui shakshiyat ko ek pehchaan dilana hai.

jis asmaan ko is dharti se nihara karti hu mai,
us asmaan ki unchaai tak apni udaan banana hai,
is khoi hui shakshiyat ko ek pehchaan dilana hai.

tute huye hoslo se aage badh rahi hu mai,
usi hoslo se is duniya ko hilana hai,
is khoi hui shakshiyat ko ek pehchaan dilana hai.

kuch kar dikhaungi mai, mujhe vishwas hai,
bus is duniya ko ek pramaan dikhana hai
is khoi hui shakshiyat ko ek pehchaan dilana hai.

gumanaam hu duniya mai abhi, par mujhe kuch naam kamana hai
is khoi hui shakshiyat ko ek pehchaan dilana hai.

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