कित्तूर रानी चेन्नम्मा का जीवन परिचय – Life introduction of Kittur Rani Chennamma

रानी चेन्नम्मा का जीवन परिचय
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रानी चेन्नम्मा  कर्नाटक शहर की कित्तूर राज्य की रहने वाली थी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में 33 वर्ष भारत के उन्होंने भारत में अंग्रेजों से लड़ाई की की थी तथा संग्रहण पर भव्य बिग वीरगति प्राप्त की थी भारत में उन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया था और सबसे पहले उसको में उनका नाम लिया गया था रानी चंपा के साथ सविता कारण देश में विविध खासकर कर्नाटक का विशेष सम्मान मिला है उनका नाम आदर के साथ लिया जाता है झांसी की रानी लक्ष्मीबाई संघर्ष के पहले से भी रानी चेन्नम्मा ने युद्ध अंग्रेजों से करना शुरू कर दिया था हालांकि उन्हें युद्ध में कामयाबी नहीं मिल पाई थी उन्हें कैद कर लिया गया था अंग्रेजों ने उनको कैद कर लिया था रानी चंपा का निधन हो गया था |

 रानी चेन्नम्मा का जीवन परिचय

भारत में कर्नाटक राज्य में बैलीगावी जेल में छोटे से गांव में किसके टिक्की हुआ था कर्नाटक में बेल गांव के पास उनका उनका गांव था इनके पति का निधन हो गया था कुछ साल बाद एक क्लॉथ पुत्र भी निधन हो गया था वह अपनी मां को अंग्रेजों से लड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया था बचपन में घुड़सवारी तलवारबाजी ट्रेन जता तीरंदाजी में विशेष रुचि रखने में दिलचस्पी थी उनकी इनकी रानी चंद्रमा की शादी कित्तूर राजघराने से हुई थी राजा मला सरिता रानी के पुत्र की मौत के बाद सपा को अपना उत्तराधिकारी बना दिया गया था अंग्रेजों ने रानी को इस कदम स्वीकार कर लिया नहीं किया था सिंह को पद से हटा दिया गया था यह उनका अंग्रेजों से टकराव शुरू हो गया था और उन्होंने अंग्रेजों से आया इसे स्वीकार करने से इंकार कर दिया था |

जीवनी

इनकी लड़ाई अंग्रेजों से नजरे से छोटे परंतु संपत राज के दौर में बहुत दिनों से हुई थी अब सर मिलते हुए उन्होंने गोद लिए गए पुत्र को उधार अधिकारी मानने से इनकार कर दिया था राज्य के हर पल में योजना बनाने लगे आधार राज्य में लालच देकर उन्होंने राज्य के कुछ देशद्रोही को भी अपना और मिला लिया था पर रानी चंद्रमा ने उत्तर दिया कि उधार अधिकारी मामला और हमारा अपना मामला है अंग्रेजों ने इससे कोई लेना-देना नहीं है साथ ही में उन्होंने जनता से कहा कि जब तक तुम्हारी रानी नसों से मैं रक्त एक बूंद है किंतु कोई नहीं ले सकता और कोई इस राज्य पर आज नहीं कर सकता रानी का उत्तर पागल के कलेक्टर के सिपाहियों को 23 सितंबर को , 1824पर बंद कर दिया था  किले के फाटक बंद थे। थैकरे ने दस मिनट के अंदर आत्मसमर्पण करने की चेतावनी दी।इतने में लेकर फाटक खुल गए हजार देशभक्तों ने अपनी सेना के साथ रानी चंदा अंग्रेजों की सेना टूट पड़ी थे कर भाग गया लेकिन देशद्रोही ने तलवार तलवार के मौत के घाट उतार दिया अंग्रेजों ने मुंबई से मांग कर 3 दिसंबर को देशभक्तों के सामने पीछे हटना पड़ा 2 दिन बाद फिर छोटे से राज्य के लोग काफी बलिदान कर चुके थे |