हजारी प्रसाद द्विवेदी का निबंध – Hazari Prasad Dwivedi Essays in Hindi – Hazari Prasad Dwivedi Ke Nibandh

Hazari Prasad Dwivedi Essays in Hindi

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी भारत के हिंदी साहित्य के जाने माने निबंध लेखक माने जाते थे| उनका नाम भारत के जाने माने हिंदी साहित्य के वरिष्ठ निबंधकार में आता है| उन्होंने अपने जीवनकाल में बहुत से हिंदी एवं संस्कृत की रचनाए की थी| उनका जन्म भारत के उत्तर प्रदेश के बलिया जिले में आरत दुबे का छपरा नामक गांव में हुआ था| उनकी रचनाओं को आज के समय में भी बहुत सराहना जाता है| आज के इस पोस्ट में हम आपको hazari prasad dwivedi poems in hindi, hazari prasad dwivedi ki kahaniya, hazari prasad dwivedi images, hazari prasad dwivedi ashok ke phool, hazari prasad dwiwedi, alok parva hazari prasad dwivedi, essay on hazari prasad dwivedi in english, dr hajari prasad dwivedi, अशोक के फूल हजारी प्रसाद द्विवेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी का बचपन का नाम, हजारी प्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि, हजारी प्रसाद द्विवेदी jivan parichay,इन मराठी, हिंदी, इंग्लिश, बांग्ला, गुजराती, तमिल, तेलगु, आदि की जानकारी देंगे जिसे आप अपने स्कूल के निबंध प्रतियोगिता, कार्यक्रम या भाषण प्रतियोगिता में प्रयोग कर सकते है| ये निबंध खासकर कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए दिए गए है|

Hazari Prasad Dwivedi ke Nibandh

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कहते हैं, पर्वत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या ! पूर्व और अपर समुद्र-महोदधि और रत्नाकर-दोनों का दोनों भुजाओं से थाहता हुआ हिमालय ‘पृथ्वी का मानदण्ड’ कहा जाय तो गलत क्या है ? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद-देश में यह जो श्रृंखला दूर तक लोटी हुई है, लोग इस ‘शिवालिक’ श्रृंखला कहते हैं। ‘शिवालिक’ का क्या अर्थ है, ‘शिवालक’ या शिव के जटाजूट का निचला हिस्सा तो नहीं है ? लगता तो ऐसा ही है। ‘सपाद-लक्ष’ या सवा लाख की मालगुजारी वाला इलाका तो वह लगता नहीं। शिव की लटियाई जटा ही इतनी सूखी, नीरस और कठोर हो सकती है। वैसे, अलकनंदा का स्रोत्र यहाँ से काफी दूर पर है, लेकिन शिव का अलक तो दूर-दूर तक छितराया ही रहता होगा। सम्पूर्ण हिमालय को देखकर ही किसी के मन में समाधिस्थ महादेव की मूर्ति स्पष्ट हुई होगी। उसी समाधिस्थ महादेव के अलकाजल के निचले हिस्से का प्रतिनिधित्व यह गिरि-श्रृंखला कर रही होगी। कहीं-कहीं अज्ञात-नाम-गोत्र झाड़-झंखाड़ और बेहया-से पेड़ दिख अवश्य जाते हैं, पर कोई हरियाली नहीं। दूब तक तो सूख गई है। काली-काली चट्टानें और बीच-बीच में शुष्कता की अंतर्निरुद्ध सत्ता का इजहार करने वाली रक्ताभ रेती ! रस कहाँ है ? ये तो ठिगने-से लेकिन शानदार दरख्त गर्मी की भयंकर मार खा-खाकर और भूख-प्यास की निरन्तर चोट सह-सहकर भी जी रहे हैं। बेहया हैं, क्या ? या मस्तमौला हैं ? कभी-कभी जो ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़े काफी गहरे पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गह्नर में अपना भोग्य खींच लाते हैं।

शिवालिक की सूखी नीरस पहाड़ियों पर मुस्कराते हुये ये वृक्ष द्वन्द्वातीत हैं, अलमस्त हैं। मैं किसी का नाम नहीं जानता, कुल नहीं जानता, शील नहीं जानता पर लगता है, ये जैसे अनादि काल से जानते हैं। इन्हीं में एक छोटा-सा-बहुत ही ठिगना-पेड़ है। पत्ते चौड़े भी हैं, बड़े भी हैं। फूलों से तो ऐसा लदा है कि कुछ पूछिए नहीं। अजीब-सी अदा है, मुस्कराता जान पड़ता है। लगता है, पूछ रहा है कि क्या तुम मुझे भी नहीं पहचानते ? पहचानता तो हूँ, अवश्य पहचानता हूँ। लगता है, बहुत बार देख चुका हूँ। पहचानता हूँ। उजाड़ के साथी, तुम्हें अच्छी तरह पहचानता हूँ। नाम भूल रहा हूँ। प्राय: भूल जाता हूँ। रूप देखकर प्राय: पहचान जाता हूँ, नाम नहीं याद आता। पर नाम ऐसा है कि जब तक रूप के पहले ही हाजिर न हो जाय, तब तक रूप की पहचान अधूरी रह जाती है। भारतीय पण्डितों का सैकड़ों बार का कचरा-निचड़ा प्रश्न सामने आ गया- रूप मुख्य है या नाम ? नाम बड़ा है या रूप ?

पद पहले है या पदार्थ सामने हैं, पद नहीं सूझ रहा है। मन व्याकुल हो गया, स्मृतियों के पंख फैलाकर सुदूर अतीत के कोनों में झाँकता रहा। सोचता हूँ इसमें व्याकुल होने की क्या बात है ? नाम में क्या रखा है- ह्वाट्स देयर इन ए नेम ! नाम की जरूरत ही हो तो सौ दिए जा सकते हैं। सुस्मिता, गिरिकांता, वनप्रभा, शुभ्रकिरीटिनी, मदोद्धता, विजितातपा, अलकावतंसा, बहुत से नाम हैं। या फिर पौरुष-व्यंजक नाम भी दिये जा सकते हैं- अकुतोभय, गिरिगौरव, कुटोल्लास, अपराजित, धरती धकेल, पहाड़फोड़, पातालभेद ! पर मन नहीं मानता। नाम इसलिए बड़ा नहीं है कि वह नाम है। वह इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है। रूप व्यक्ति सत्य है, नाम समाज-सत्य है। नाम उस पद को कहते हैं कि, जिस पर समाज की मुहर लगी होती है, आधुनिक शिक्षित लोग उसे ‘सोशल सैक्शन’ कहा करते हैं। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृति, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्टि-मानव की चित्त-गंगा में स्नान !

इस गिरिकूट-बिहारी का नाम क्या है। मन दूर-दूर तक उड़ रहा है- देश में और काल में- मनोरथानामगतिर्न विद्यते ! अचानक याद आया- अरे, यह तो कुटज है ! संस्कृत साहित्य का बहुत परिचित किन्तु कवियों द्वारा अवमानित यह छोटा-सा शानदार वृक्ष ‘कुटज’ है। ‘कुटज’ कहा गया होता तो कदाचित् ज्यादा अच्छा होता। पर उसका नाम चाहे कुटुज ही हो, विरुद तो निस्संदेह ‘कुटज’ होगा। गिरिकूट पर उत्पन्न होने वाले इस वृक्ष को ‘कुटज’ कहने में विशेष आनन्द मिलता है। बहरहाल यह कूटज-कुटज है, मनोहर कुसुम-स्तवकों से ‘आषाढस्य प्रथमदिवसे’ रामगिरि पर यक्ष को जब मेघ की अभ्यर्थना के लिए नियोजित किया तो कम्बख्त तो ताजे कुटज पुष्पों की अंजलि देकर ही सन्तोष करना पड़ा- चंपक नहीं, बकुल नहीं, नीलोत्पल नहीं, मल्लिका नहीं, अरविन्द जुलाई का का पहला दिन है। मगर फर्क भी कितना है। बार-बार मन विश्वास करने ‘शापेनास्तंगमितामहिमा’ (शाप से जिनकी महिमा अस्त हो गई हो) होकर रमागिरि पहुँचे थे, अपने ही हाथों से इस कुटज पुष्प का अर्घ्द देकर उन्होंने मेघ की अभ्यर्थना की थी। शिवालिक की इस अनत्युच्च पर्वत-श्रृंखला की भाँति रामगिरि पर भी उस समय और कोई फूल नहीं मिला होगा। कुटज ने उसके संतप्त चित्त को सहारा दिया था- बड़भागी फूल है यह। धन्य कुटज, ‘तुम गाढ़े के साथी’ हो। उत्तर की ओर से सिर उठाकर देखता हूँ, सुदूर तक ऊँची काली पर्वत-श्रृंखला छाई हुई है और एकाथ सफेद बाल के बच्चे उससे लिपटे खेल रहे हैं। मैं भी इन पुष्पों का अर्घ्य उन्हें पढ़ा दूँ ? पर काहे वास्ते ? लेकिन बुरा भी क्या है ?

कुटज के ये सुन्दर फूल बहुत बुरे तो नहीं। जो कालिदास के काम आया हो, उसे ज्यादा इज्जत मिलनी चाहिए। मिली कम है। पर इज्जत तो नसीब की बात है। रहीम को मैं बड़े आदर के साथ स्मरण करता हूँ। दरियादिल आदमी थे, पाया सो लुटाया। लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है छिलका और गुठली फेंक देती है। सुना है, रस चूस लेने के बाद रहीम को भी फेंक दिया गया। एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने फेंक दिया ! हुआ ही करता है। इससे रहीम का मोल घट नहीं जाता। उनकी फक्कड़ाना मस्ती कहीं गई नहीं। अच्छे भले कद्रदान थे। लेकिन बड़े लोगों पर भी कभी-कभी ऐसी वितृष्णा सवार होती है कि गलती कर बैठते हैं। मन खराब रहा होगा, लोगों की बेरुखी और बेकद्रदानी से मुरझा गए होंगे- ऐसे ही मन: स्थिति में उन्होंने बिचारे कुटज को भी एक चपत लगा दी। झुँझलाये थे, कह दिया-

वे रहीम अब बिरछ कहँ, जिनकर छाँह गम्भीर।
बागन बिच-बिच देखियत, सेंहुड़, कुटज करीर।।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ललित निबंध

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Hazari Prasad Dwivedi Ke Nibandh

हिंदी साहित्य के पुरोधा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का हिन्दी साहित्य में योगदान कभी नकारा नहीं जा सकता और कबीर जैसे महान संत को दुनिया से परिचित कराने का श्रेय भी उनको ही जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. सुधीश पचौरी ने एक मुलाकात में कहा था कि रचनात्मक मेधा के धनी द्विवेदीजी रामचंद्र शुक्ल के बाद बहुत बड़े साहित्यकार हुए। उनके ललित निबंध अद्भुत हैं।

साहित्यकार हरीश नवल कहते हैं कि रामचंद्र शुक्ल पहली परंपरा के आलोचक रहे जबकि द्विवेदी जी दूसरी परंपरा के आलोचक थे। उनका यह भी मानना है कि द्विवेद्वी जी आलोचक के साथ बहुत बड़े रचनाकार भी थे। पचौरी और नवल दोनों का कहना है कि आज कबीर द्विवेदी की वजह से ही दुनिया के सामने हैं। नवल कहते हैं कि द्विवेदी जी ने ही जनमानस को कबीर से परिचित कराया। पचौरी ने कहा कि द्विवेदीजी ने गद्य को विश्लेषणात्मक से रचनात्मक रूप प्रदान किया। उनकी वर्णनात्मकता अद्भुत थी और चरित्र पर अद्भुत पकड़ थी। उन्होंने कहा कि उनकी अद्भुत कृति वाणभट्ट की आत्मकथा में मिथ, यथार्थ और इतिहास का बेजोड़ मिलन है। नवल कहते हैं कि द्विवेदीजी ने हिंदी साहित्य का इतिहास नये ढंग से लिखा जो परंपरा और आधुनिकता का द्योतक है।

उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के दुबे−का−छपरा गांव में 19 अगस्त, 1907 को जन्मे द्विवेदी जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में ग्रहण की। सन 1930 में इंटरमीडिएट करने के बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष की परीक्षा पास की। उन्हें आचार्य की उपाधि मिली। द्विवेदी जी अध्यापन के लिए शांतिनिकेतन चले गए। वहां 1940 से 1950 के बीच वह विश्वभारत में हिंदी भवन के निदेशक रहे। रवींद्रनाथ टैगोर, क्षितिमोहन सेन, विधुशेखर भट्टाचार्य और बनारसी दास चतुर्वेदी के प्रभाव से उनमें साहित्यिक गतिविधियों में दिलचस्पी बढ़ी। उन्हें संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, गुजरात, पंजाबी आदि कई भाषाओं का गहरा ज्ञान था। बाद में द्विवेदी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय एवं पजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर बने। वह बतौर ‘रेक्टर’ भी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े।

सन 1957 में द्विवेद्वी जी को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें उनके निबंध संग्रह ‘आलोक पर्व’ के लिए 1973 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पचौरी कहते हैं कि द्विवेदी जी का जीवन संघर्षपूर्ण रहा लेकिन उन्होंने किसी से शिकायत नहीं की। विचार प्रवाह, अशोक के फुल, कल्पलता (सारे निबंध संग्रह), वाणभट्ट की आत्मकथा, चारूचंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा (उपन्यास), सूर साहित्य, कबीर, कालिदास की लालित्य योजना, हिंदी साहित्य (उद्भव और विकास), हिंदी साहित्य का आदिकाल आदि उनकी श्रेष्ठ और अद्भुत साहित्यिक कृतियां हैं। द्विवेदी जी का 19 मई, 1979 को निधन हो गया। जब उनका निधन हुआ तब वह उत्तर प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष थे।

हजारी प्रसाद द्विवेदी पर निबंध

It is said that the mountains are Shobha-Niketan. Then the Himalayas say what! What is wrong with the Himalayas ‘Paramat of the Earth’, assuming both the East and the Upper Sea-Mahadhi and Ratnakar? Kalidas had said the same. This series is farthest in the foothills of this region, people are called this ‘Shivalik’ series. What is the meaning of ‘Shivalik’, is not the lower part of the ‘Shivalka’ or Shiva Jatazoot? It seems like that only It does not seem to be a landlocked area of ​​’Sadh-lakshan’ or Rs. 1.2 million. Shiva’s Latika can be so dry, dull and rigid. By the way, the source of the Alaknanda is far away from here but Shiva’s saliva will be scattered far and wide. Seeing the entire Himalayas, the idol of Samadhiastha Mahadev can be clearly seen in somebody’s mind. Representing the lower part of Alkajal of the same Sampradhastha Mahadev, this Giri-series will be doing. Somewhere, the unknown-named-cattle trees and trees seem to be seen, but no greenery. It has dried up till dawn. Bloody sand expressing black-black cliffs and the interdependent power of dryness between the middle! Where’s the juice? They are also living with the help of stomach-but severely heavy heat-stricken food and hunger and thirst. What is wrong? Or are the mastooma? Sometimes the ones who look bleak out of the way, their roots remain very deep. They do not even tear their chest in stone and pull their breath away.

Smiling at Shivalik’s dry monotonous hills, these trees are ambivalent, they are completely restless. I do not know anyone’s name, I do not know the totality, I do not know the word, but it seems like they have known from time immemorial. There is a small patch-tree in them. The cards are also wide, too big. Flowers are so fierce that do not ask anything. It is strange to have to pay, smiles. Looks like you do not even recognize me? I know, I know, I know. Looks like I’ve seen it many times. I recognize. Desert companions, you know very well I’m forgetting the name. I often forget. By looking at the form, I often get recognized, I do not remember the name. But the name is such that until the form is already present, the identity of the form remains incomplete. Hundreds of garbage-free questions of Indian Pandits came out – the form is main or name? Name is big or form?

The post is the first or the matter is in front, the post is not being understood. The mind became distraught, spreading the wings of memories, spreading in the corners of the remote past. I wonder what is there to be distraught? What’s in the name – What’s there in a name! If the name is needed, then hundred can be given. Susmita, Girikanta, Vanaprabha, Shubhakiritini, Madodhita, Vigitapada, Alkavatansa, many names are there. Or the names of the verbal expressions can also be given – Unkathobhai, Girigaurav, Koutolas, Aparajit, Dharri Dhakel, Mahabandhod, Panhalvad! But my mind does not agree. The name is not so big that it’s the name. It is so large that it has got social acceptance. The form is true, name is society-truth. The name is called that post, on which the seal of society is taken, modern educated people call it ‘social section’. My mind is distraught for the name, acceptance by society, certified by history, bath in the mind of the collective-human.

What is the name of this Girikot-Bihari? The mind is flying far and wide – in the country and in the time – the mythanaginturna! Suddenly I remember- Hey, it’s a cottage! It is very familiar with Sanskrit literature, but this small tree, which is deprived of poets, is ‘cottage’. It would have been better if ‘kutaj’ had been said. But if his name is the same as the family, then Vinod will definitely have ‘cottage’. This tree, which is produced on Girikot, enjoys special joy in saying ‘Kutaj’. However, it is a cottage-cottage, when Manojar Kusum-Stavkas ‘eishadshya first day’ Ramakrishi was employed for the demand of the cloud, then the humble had to satisfy itself by offering angered fresh cottage flowers – not Champak, not Bakul, not neelpot. No Mallika, Arvind is the first day of July. But how much is the difference. To repeatedly believe in the mind, ‘Shapneastangmittamahima’ (whose glory has passed) came to Ramagiri, by ordering this cottage flower with his own hands, he had the desire of the cloud. There is no other flower at that time, like Ramgiri, like the Shivalik’s last mountain range. Cutz had supported his enraged mind; it is a parting flower, this is it. Blessed cottage, you’re a friend of thickness. Raising the head from the north, I see, the high black mountain range is stretched far and the children of the eighth white hair are wrapped in it. Can I even read them of these flowers? But why? But what’s worse?

These beautiful flowers of cottage are not very bad. The work that Kalidas has done should get more respect. Got less. But respect is a matter of luck. I remember Rahim with great respect. The generous men were found, looted sleeping. But the world is meant by that means, the juice sucks, throws peel and kernels. Listen, Rahim was thrown after taking juice. A king called with respect, the other threw away! It does happen. This does not reduce the value of Rahim. Their stupidity has not gone anywhere. There were good shades of good But on the big people, sometimes such distractions are ridden that they make a mistake. The mind would have been bad, people would be disconnected from the people’s helplessness and unkindness.

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