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गणेश चतुर्थी की कहानी – गणेश चतुर्थी व्रत कथा व पूजन विधि

गणेश चतुर्थी व्रत विधि

गणेश चतुर्थी का दिन भगवान शिव और देवी पार्वती के पुत्र भगवान गणेश के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है । गणेश चतुर्थी को विनायक चतुर्थी के रूप में भी जाना जाता है| इस त्यौहार की अवधि स्थान और परंपरा के आधार पर 1 दिन से 11 दिनों तक भिन्न होती है। लोग भगवान गणेश की मूर्तियों को अपने घरों में लाते हैं और पूजा करते हैं। भगवान गणेश ज्ञान, समृद्धि और अच्छे भाग्य का प्रतीक है। गणेश चतुर्थी हिंदू महीने भद्रा के शुक्ला चतुर्थी पर मनाया जाता है| यह समूचे भारत भर में एक महान भक्ति के साथ मनाए जाने वाले महत्वपूर्ण हिंदू त्यौहारों में से एक है। आज के इस पोस्ट में हम आपको गणेश चतुर्थी व्रत कथा, गणेश चतुर्थी पूजा विधि, आदि की जानकारी देंगे|

गणेश चतुर्थी की कहानी

एक बार माता पार्वती ने स्नान करने से पहले अपने मैल से से एक बालक को उत्पन्न किया एवं उन्हें स्नानघर के द्वार की रक्षा करने को कहा| उन्होंने बालक को किसी को भी अंदर ना आने की ज़िम्मेदारी दी| उसके बाद महादेव धीव ने अंदर जाने का प्रयास किया पर बालक ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया| इससे क्रोधित होकर शिव ने उस बालक से यूद्ध किया जिसके कारण उन्होंने उस बालक का धड़ अपने त्रिशूल से सर से अलग कर दिया| माता पार्वती यह देख क्रेडिट हुई और प्रलह लाने का निर्णय लिया| उनके क्रोध से बचने के लिए सभी देव शिव जी से मदद की गुहार करने लगे| तभी शिव जी की सलाह पर विष्णु देव ने उत्तर दिशा में मिले एक हाथी के बच्चे के सर को वहा लाए| शिव ने बालक के धड़ पर उस नन्हे हाथी का सर लगाकर उस बालक के शरीर में वापस जान ले आए| माता पार्वती ने उस बालक को अपने हृद्या से लगा लिया| सभी देवो ने उस बालक को आशीर्वाद दिया| शिव जी ने उन्हें कहा गिरिजानन्दन! विघ्न नाश करने में तेरा नाम सर्वोपरि होगा|

गणेश चतुर्थी व्रत कथा इन हिंदी

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कथा के अनुसार एक बार भगवान शंकर और माता पार्वती नर्मदा नदी के निकट बैठे थें. वहां देवी पार्वती ने भगवान भोलेनाथ से समय व्यतीत करने के लिये चौपड खेलने को कहा. भगवान शंकर चौपड खेलने के लिये तो तैयार हो गये. परन्तु इस खेल मे हार-जीत का फैसला कौन करेगा? इसका प्रश्न उठा, इसके जवाब में भगवान भोलेनाथ ने कुछ तिनके एकत्रित कर उसका पुतला बना, उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठा कर दी. और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते है. परन्तु हमारी हार-जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिये तुम बताना की हम मे से कौन हारा और कौन जीता.

यह कहने के बाद चौपड का खेल शुरु हो गया. खेल तीन बार खेला गया, और संयोग से तीनों बार पार्वती जी जीत गई. खेल के समाप्त होने पर बालक से हार-जीत का फैसला करने के लिये कहा गया, तो बालक ने महादेव को विजयी बताया. यह सुनकर माता पार्वती क्रोधित हो गई. और उन्होंने क्रोध में आकर बालक को लंगडा होने व किचड में पडे रहने का श्राप दे दिया. बालक ने माता से माफी मांगी और कहा की मुझसे अज्ञानता वश ऎसा हुआ, मैनें किसी द्वेष में ऎसा नहीं किया. बालक के क्षमा मांगने पर माता ने कहा की, यहां गणेश पूजन के लिये नाग कन्याएं आयेंगी, उनके कहे अनुसार तुम गणेश व्रत करो, ऎसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगें, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई.

ठिक एक वर्ष बाद उस स्थान पर नाग कन्याएं आईं. नाग कन्याओं से श्री गणेश के व्रत की विधि मालुम करने पर उस बालक ने 21 दिन लगातार गणेश जी का व्रत किया. उसकी श्रद्वा देखकर गणेश जी प्रसन्न हो गए. और श्री गणेश ने बालक को मनोवांछित फल मांगने के लिये कहा. बालक ने कहा की है विनायक मुझमें इतनी शक्ति दीजिए, कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के साथ कैलाश पर्वत पर पहुंच सकूं और वो यह देख प्रसन्न हों.

यह व्रत विधि भगवन शंकर ने माता पार्वती को बताई. यह सुन माता पार्वती के मन में भी अपने पुत्र कार्तिकेय से मिलने की इच्छा जाग्रत हुई. माता ने भी 21 दिन तक श्री गणेश व्रत किया और दुर्वा, पुष्प और लड्डूओं से श्री गणेश जी का पूजन किया. व्रत के 21 वें दिन कार्तिकेय स्वयं पार्वती जी से आ मिलें. उस दिन से श्री गणेश चतुर्थी का व्रत मनोकामना पूरी करने वाला व्रत माना जाता है.

गणेश चतुर्थी पूजन विधि

गणेश चतुर्थी व्रत कथा इन हिंदी

  • गणेश चतुर्थी की पूजा के प्रारंभ में आपको हथेली में जल, अक्षत एवं पुष्प लेकर स्वास्तिक बनाकर गणेश भगवान् एवं अन्य देवताओ को स्मरण करना होगा|
  • इसके बाद पुष्प एवं अक्षत को चौकी पर समर्पित करना होगा|
  • उसके पश्चात एक सुपारी में मौली लपेटकर चौकी पर स्थापित करें.
  • इसके बाद गणेश भगवान् का आह्वाहन करे एवं कलस स्थापना करे|
  • स्मरण रहे की कलश उत्तर-पूर्व दिशा अथवा चौकी की बाईं ओर स्थापित किया जाए|
  • उसके पश्चात डीप प्रज्वलित करे|
  • उसके बाद पंचोपचार के अनुसार गणेश पूजन करें. जिसकी विधि इस प्रकार है|
  1. सबसे पूर्व आह्वान प्रक्रिया सम्पन्न करे|
  2. इसके बाद स्थान ग्रहण करे|
  3. हथेली में जल लेकर मंत्र पढ़ते हुए गणेश भगवान् के चरणों में अर्पित करे|
  4. चन्द्रमा को मंत्र पढ़ते हुए 3 बार जल चढ़ाएं.
  5. पान के पत्ते के द्वारा पानी लेकर छींटें मारें.
  6. सिलेसिलाए वस्त्र, एवं कलावा चढ़ाएं.
  7. मालाएं, पगड़ी, जनेऊ, हार, आदि अर्पण करे|
  8. फूल, धूप, दीप, पान के पत्ते पर फल, मिठाई, मेवे आदि अर्पित करे|

गणेश चतुर्थी व्रत विधि

पर्व के दिन प्रातकाल सुबह उठकर स्नान करने के पूर्व भगवान् गणेश की पूजा करने के हेतु उनकी मूर्ती उत्तर दिशा में एक चौकी में स्थापित करे| इसके बाद आसान ग्रहण करके गणेश भगवान् की पूजा करे| पूजा के पूर्व भगवान् गणेश को फूल, फल, रोली, पंचामृत, आदि अर्पण करे| जीप एवं धुप के साथ भगवान् गणेश की पूजा करे| भगवान् गणेश की मूर्ती या चित्र को मोदक या लड्डू का भोग लगाए| इसके बाद ऊं सिद्ध बुद्धि महागणपति नमः का जाप करे| शाम के समय व्रत पूजा करने के पूर्व आपको संकष्टी व्रत कथा का पाठ करना होगा| संकष्टी व्रत कथा का पाठ शुभ मूहर्त में करना शुभ माना जाता है| गणेश चतुर्थी के दिन यह मूहर्त 4 बजकर 53 मिनट से शुरु होकर चन्द्रमा के अर्घ्य देने के बाद आप व्रत समाप्त कर सकते है|

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