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दशहरा पर कविता 2018 – Dussehra Poems in Hindi & English for Kids & Students – Dasara Kavita

दशहरा २०१८: दशहरा का पर्व भारत में मनाये जाने वाला एक धार्मिक पर्व है जो की महा नवमी के अगले दिन आता है| यह पर्व बुराई पर अच्छे की जीत का दिन है| इस दिन को विजयदशमी भी कहा जाता है| इस दिन का महत्व इसलिए भी है क्योकि इसी दिन मर्यादा पुरोषत्तम श्री राम ने लंका नरेश रावण का वद्ध किया था| इसलिए इस दिन बुरटाई पर अच्छाई की जीत हुई थी| इस दिन पूरे भारत में अलग अलग जगह रावण के पुतले बनाकर उनका दहन किया जाता है| ये कविता खासकर कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए दिए गए है|

दशहरे पर कविता

दशहरा कौन सी तारीख का है: दशहरा का पर्व महा नवमी के बाद आता है| इस वर्ष यह दिन 19 अक्टूबर को है| आइये अब हम आपको diamond poem on dussehra, poem on dussehra, दशहरा पर पोएम, दशहरा पर निबंध, दशहरा पोयम्स इन हिंदी, dussehra festival poems hindi, dussehra short poem in hindi, acrostic poem on dussehra in english, acrostic poem of dussehra, hindi poem on dussehra for class 4, आदि की जानकारी class 1, class 2, class 3, class 4, class 5, class 6, class 7, class 8, class 9, class 10, class 11, class 12 के बच्चे इन्हे अपने स्कूल फंक्शन celebration व प्रोग्राम में सुना सकते हैं| आप सभी को दशहरा की शुभकामनाएं

दशहरा का तात्पर्य, सदा सत्य की जीत।
गढ़ टूटेगा झूठ का, करें सत्य से प्रीत॥

सच्चाई की राह पर, लाख बिछे हों शूल।
बिना रुके चलते रहें, शूल बनेंगे फूल॥

क्रोध, कपट, कटुता, कलह, चुगली अत्याचार
दगा, द्वेष, अन्याय, छल, रावण का परिवार॥
राम चिरंतन चेतना, राम सनातन सत्य।
रावण वैर-विकार है, रावण है दुष्कृत्य॥

वर्तमान का दशानन, यानी भ्रष्टाचार।
दशहरा पर करें, हम इसका संहार॥

Dussehra poem in hindi

आ गया पावन दशहरा
फिर हमे सन्देश देने
आ गया पावन दशहरा।
तुम संकटों का हो घनेरा
हो न आकुल मन ये तेरा
संकटो के तम छटेंगे
होगा फिर सुन्दर सवेरा
धैर्य का तू ले सहारा।
द्वेष कितना भी हो गहरा
हो न कलुषित मन ये तेरा
फिर ये टूटे दिल मिलेंगे
होगा जब प्रेमी चितेरा
बन शमी का पात प्यारा।
सत्य हो कितना प्रताड़ित
पर न हो सकता पराजित
रूप उसका और निखरे
जानता है विश्व सारा
बन विजय “स्वर्णिम सितारा”

Hindi poem on dussehra

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Hindi poem on dussehra

है सुतिथि सिर धारी विजय दशमी।
है विजय सहचरी विजय दशमी।1।
कान्त कल कंठता दिखाती है।
है कलित किन्नरी विजय दशमी।2।
सामने ला कला बहुत सुन्दर।
है बनी सुन्दरी विजय दशमी।3।
पूत जातीय भाव पादप की।
है विकच बल्लरी विजय दशमी।4।
एक अवतार प्रीति पूता हो।
है धरा अवतरी विजय दशमी।5।
मंजु जातीयमान हिम कर की।
है शरद शर्वरी विजय दशमी।6।
दूर कर बहु अभाव भारत का।
भाव में है भरी विजय दशमी।7।
पा जिसे दुख उदधि उतर पाये।
है रुचिर वह तरी विजय दशमी।8।
जो असुर-भाव में भरे से हैं।
है उन्हें सुरसरी विजय दशमी।9।
जाति हित में शिथिल हुए जन की।
है शिथिलता हरी विजय दशमी।10।
बहु पतन शील प्राणियों की भी।
है परम हितकरी विजय दशमी।11।

Very short poem on dussehra in hindi

तेजमान हो जाय तेजहत पल-पल पाकर तेज अपार;
अंधीभूत अवनि पर होवे ज्योति-पुंज का प्रबल प्रसार।
महिमा-हीन बने महिमामय, मिले लोक का विभव महान;
होकर सबल अबल बन जाये प्रबल प्रभंजन-तनय-समान।
मिले लोक-बल जन कर पावे पार परम-दुख-पारावार;
रोके पंथ चूर हो जावे पर्वत सहकर प्रबल प्रहार।
सेतु आपदा-सरि का होवे कल कौशल घन पटल समीर;
बने बीर रिपु वन दावानल कूटनीति पावकता नीर।
हो न सभीत पुरंदर-पवि से, कंपित कर पावे न पिनाक;
विचलित हो न समर में कोई महाकाल की भी सुन हाँक।
जीवनमय जनता-जीवन हो, कर्म योगमय हो सब योग;
किसी पियूष-पाणि से होवे दूर जाति-जर्जर-तन-रोग।
सब के उर में भाव जगे वह, जो हो कार्य-सिध्दि का यंत्र;
हो स्वतंत्रताओं का साधान, सधे साधाने से जो मंत्र।
भरत-सुअन-उर में भर जाये अभयंकरी अतुल अनुभूति;
भूतिमान भारत बन जाये ले विजया से विजय-विभूति।

Poem on dussehra in hindi

परम – गौरव – गरिमा – आगार,
लोक-अभिनंदन, ललित-चरित्र;
लाभदायक, लीला-आधार,
सुर-सरित-सलिल-समान पवित्र।

बहु-मधुर-विविध-वाद्य-अवलंब,
सुधामय-सरस राग-आवास;
कलित – लोकोत्तर – कला-निकेत,
सुविलसित बहु स्वर्गीय विलास।

जाति- जीवन- आलय-आलोक,
कीर्ति-विटपावलि-वर उद्यान;
मनोरम- चरित-मयूर-पयोद,
भाव-मूलक भव-सिध्दि-विधान।

मनुज-कुल- मूर्तिमान-उत्साह,
भरत-भू- समारोह-सिरमौर;
मंजु-उत्सव- समूह-सर्वस्व,
भावना-भाल भव्यतम खौर।

उमंगित पुलकित लसित अपार,
मंजु मुखरित सुरभित रस-धाम;
अलंकृत अंकित अमित विनोद,
विपुल आलोकित लोक-ललाम।

शरद कमनीय कलाधार कान्त,
विकच सरसीरुह-सम सविकास;
कौन है यह रंजित नव राग,
अलौकिक विजय-विभूति-निवास।

Dussehra poem in english

Today is the day when we burn all our sins,
And promise to begin all over again,
Flames come and take all the darkness away,
Light shines and makes it own way,
Because this is the festival where truth wins,

We make our way towards a bright future
And with our heads high and up chins,
Take a vow to do all this together,
As we burn the ravana inside us
Which is kept like a false heather!
Happy dusherra!

Dussehra poem in marathi – Dasara kavita marathi

परम – प्राइड – गरिमा – ठेव,
सार्वजनिक अभिनंदन, सूक्ष्म पात्र;
फायदेशीर, लीला-बेस,
पवित्र

मल्टी-मल्टी-मल्टी-मल्टी-म्युझिकल-रिसॉर्ट,
सुधायम-सरस राग-हाऊसिंग;
कुट – विरूपण – कला,
वैविध्यपूर्ण विलासितापूर्ण विलासिता

जात-जीवन- अलाअल-आलोक,
किर्ती-विटापावली-अप गार्डन;
निवडण्यायोग्य – Charit-Peacock-Poyod,
भावनात्मकता

मनुज-कुल-मूर्तिमन-उत्साह,
भारत-भौगोलिक उत्सव- सिरमौर;
मंजूव-उत्सव – गट-सर्व,
भावनिक पोट

पंकित लशित अमारा,
मंजू आधा अर्भा रस-धाम;
सजावटीचा चेहरा अमित विनोद,
प्रा. आलोकित लोकलम

शरद कमणी कलाधर कंट,
वेचकिक सरशीरू-सम रिवाकस;
हे कोरियोग्राफ न्यु-ताल कोण आहे,
सुपरहमान विजय-विभूती-निवास

Acrostic poem about dussehra

उषा क्यों बहु अनुरंजित हुई
पहनकर अभिनंदन का साज;
प्रकृति के भव्य भाल का बिंदु
बना क्यों बाल-विभाकर आज।

किसलिए पारदमय हो गया
विमल नभतल का नील निचोल;
विहँसकर देख रही है किसे
दिग्वधू अपना घूँघट खोल।

खिल गये किसका बदन बिलोक
सरों में विलसे बहु अरबिंद;
बरसता है क्यों सुमन-समूह
प्रफुल्लित नाना पादप-वृन्द।

रत्नमय तारक-मिष क्यों हुआ
विधुमुखी रजनी-शिर का ताज;
बिछ गयी क्षिति पर चादर धुली
किसलिए कलित कौमुदी-व्याज।

वितरता फिरता है क्यों मोद
मंद-चल सुरभित सरस समीर;
मोहता है क्यों बज सब ओर
किसी मंजुल पग का मंजीर।

हँस रहे हैं सज्जित धवज लिये
आगमन से किसके आवास;
विपुल विकसित है जनता बनी
किस बिजयिनी का देख विकास।

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