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विश्व एड्स दिवस पर निबंध 2018 – World Aids Day Essay in Hindi & English Pdf Download

World aids day 2018: लोगों को एड्स के प्रति जागरूक करने व इस गंभीर बीमारी से बचने के लिए हर साल 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है | इस दिन लोगों को जागरूक किया जाता है वो इस बीमारी से बचने के लिए उसके बारे में ज्यादा से ज्यादा जान सकें की इस बीमारी के क्या लक्षण होते हैं, इससे बचाव किस प्रकार किया जा सकता है और इस बीमारी के क्या-क्या कारण होते हैं | इन्ही सब जानकारियों के लिए अलग-अलग अभियान भी चलाये जाते हैं, जिससे एचआइवी से पीड़ित लोगों की सहायता की जा सके |

विश्व एड्स दिवस – निबंध

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हर साल एक दिसंबर को विश्‍व एड्स दिवस मनाया जाता है। जिसका उद्देश्य लोगों को एड्स के प्रति जागरूक करना है। जागरूकता के तहत लोगों को एड्स के लक्षण, इससे बचाव, उपचार, कारण इत्यादि के बारे में जानकारी दी जाती है और कई अभियान चलाए जाते हैं जिससे इस महामारी को जड़ से खत्म करने के प्रयास किए जा सकें। साथ ही एचआईवी एड्स से ग्रसित लोगों की मदद की जा सकें। 1 दिसंबर 2011 में विश्‍व एड्स दिवस की थीम ‘गैटिंग जीरों’ पर केंद्रित है। जिसके तहत कैंपेन, इंट्रैक्टिव एक्टिविटीज की जाती है जिससे लोगों को एड्स के बारे में अधिक से अधिक जानकारी दी जा सकें।

दरअसल, ‘गैटिंग टू जीरों’ का उद्देश्य है कि कोई भी एचआईवी एड्स से नया व्यक्ति ना तो पीडि़त हो और ना ही एड्स के कारण किसी की मृत्यु हो। यानी एचआईवी संक्रमण की दर को रोकते हुए शून्‍य स्‍तर तक लाना। ‘गैटिंग टू जीरों’ की थीम को 2015 तक चलाने के लिए कारगार कदम उठाएं जा रहे हैं। भारत में भी एड्स अपने पैर पसारे हुए है लेकिन देश में इसका इलाज होना बहुत मुश्किल होता है। इसके पीछे कई कारण हैं जैसे- एचआईवी पॉजीटिव लोगों के साथ भेदभाव करना, लोगों में जागरूकता की कमी होना, लोगों के मन में एड्स को लेकर तरह-तरह के भ्रम होना, लोगों का असुरक्षित यौन संबंध बनाना इत्‍यादि।

भारत जैसे घने आबादी वाले देश में एड्स ग्रसित मरीजों की अधिक संख्या का कारण है लोगों का लापरवाही युक्त व्यवहार। यानी लोग सबकुछ जानते हुए भी या तो अंजान बनते हैं या फिर असुरक्षित यौन संबंधों को बढ़ावा देते हैं जो कि एड्स का एक महत्वपूर्ण कारक है। जरूरी नहीं कि सिर्फ असरुक्षित यौन संबंध बल्कि किसी संक्रमित रोग से ग्रसित होने के कारण भी ऐसा होता है और संक्रमण के कारण भी एड्स का खतरा बरकरार रहता है। हालांकि नए आंकड़ों के मुताबिक, एड्स पीडि़तों में कमी आई है। यदि आप एड्स जैसी महामारी से बचना चाहते हैं तो इसके लिए जरूरी है कि आप सावधानियां बरतें और एड्स से बचाव के उपायों को अपनाएं। सेक्स संबंध बनाते हुए सुरक्षित सेक्स को प्राथमिकता दें ताकि भविष्य में होने वाले खतरे को टाल सकें।

गौरतलब है कि विश्व एड्स दिवस की शुरूआत 1 दिसंबर 1988 को हुई थी जिसका मकसद, एचआईवी एड्स से ग्रसित लोगों की मदद करने के लिए धन जुटाना, लोगों में एड्स को रोकने के लिए जागरूकता फैलाना और एड्स से जुड़े मिथ को दूर करते हुए लोगों को शिक्षित करना था। दरअसल, विश्‍व एड्स दिवस आपको याद कराता है कि ये बीमारी अभी भी हमारे-आपके बीच है और इसे लगातार खत्म की कोशिशों में आपको भी आगे आना होगा।

यूएनएड्स के मुताबिक, कि अब तक 34 मिलियन लोग एड्स से ग्रसित हैं और 2010 तक 2.7 मिलियन लोग इस इंफेक्शन के संपर्क में आए हैं, जिसमें से 3 लाख 90 हजार बच्चे भी इसकी चपेट में आएं। इतना ही नहीं पिछले पांच सालों में यानी 2010 तक एड्स से ग्रसित लगभग 1.8 मिलियन लोगों की मौत हो चुकी है।

आमतौर पर देखा गया है कि एड्स अधिकतर उन देशों में है जहां लोगों की आय बहुत कम है या जो लोग मध्यवर्गीय परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। बहरहाल, एचआईवी एड्स आज दुनिया भर के सभी महाद्वीपों में महामारी की तरह फैला हुआ है जो कि पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के जीवन के लिए एक बड़ा खतरा है और जिसे मिटाने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।

Essay on world aids day in hindi

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विश्व एड्स दिवस की पहली बार कल्पना 1987 में अगस्त के महीने में थॉमस नेट्टर और जेम्स डब्ल्यू बन्न द्वारा की गई थी। थॉमस नेट्टर और जेम्स डब्ल्यू बन्न दोनों डब्ल्यू.एच.ओ.(विश्व स्वास्थ्य संगठन) जिनेवा, स्विट्जरलैंड के एड्स ग्लोबल कार्यक्रम के लिए सार्वजनिक सूचना अधिकारी थे। उन्होंने एड्स दिवस का अपना विचार डॉ. जॉननाथन मन्न (एड्स ग्लोबल कार्यक्रम के निदेशक) के साथ साझा किया, जिन्होंने इस विचार को स्वीकृति दे दी और वर्ष 1988 में 1 दिसंबर को विश्व एड्स दिवस के रुप में मनाना शुरु कर दिया। उनके द्वारा हर साल 1 दिसम्बर को सही रुप में विश्व एड्स दिवस के रुप में मनाने का निर्णय लिया गया। उन्होंने इसे चुनाव के समय, क्रिसमस की छुट्टियों या अन्य अवकाश से दूर मनाने का निर्णय लिया। ये उस समय के दौरान मनाया जाना चाहिए जब लोग, समाचार और मीडिया प्रसारण में अधिक रुचि और ध्यान दें सकें।

एचआईवी/एड्स पर संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम, जो यूएन एड्स के रूप में भी जाना जाता है, वर्ष 1996 में प्रभाव में आया और दुनिया भर में इसे बढ़ावा देना शुरू कर दिया गया। एक दिन मनाये जाने के बजाय, पूरे वर्ष बेहतर संचार, बीमारी की रोकथाम और रोग के प्रति जागरूकता के लिये विश्व एड्स अभियान ने एड्स कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए वर्ष 1997 में यूएन एड्स शुरु किया।

शुरु के सालों में, विश्व एड्स दिवस के विषयों का ध्यान बच्चों के साथ साथ युवाओं पर केन्द्रित था, जो बाद में एक परिवार के रोग के रूप में पहचाना गया, जिसमें किसी भी आयु वर्ग का कोई भी व्यक्ति एचआईवी से संक्रमित हो सकता है। 2007 के बाद से विश्व एड्स दिवस को व्हाइट हाउस द्वारा एड्स रिबन का एक प्रतिष्ठित प्रतीक देकर शुरू किया गया था।

Essay on world aids day

एक्वायर्ड इम्युनो डेफिशियेन्सी सिन्ड्रोम (एड्स) के बारे में आज शायद ही कोई अनभिज्ञ हो। एड्स किस वजह से होता है इसके बारे में अभिनेत्री शबाना आजमी ने विज्ञापन द्वारा जितनी सहजता व खूबसूरती से समझाया है उससे जागरूकता आई है। सरकार और समाजसेवी संस्थाओं द्वारा समय-समय पर विभिन्न तरीकों से एड्स के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाता है पर विडंबना यह है कि लोग जानकर भी अनजान बने हुए हैं। हर साल की तरह आज भी वर्ल्ड एड्स डे मनाया जाएगा। जिसके तहत विभिन्न स्थानों पर समारोह में लोगों को जागरूक किया जाएगा। पर एक सच यह भी है कि आज भी हमारे देश में, हमारे शहर में एड्स के चक्रवात में फँसे लोगों की स्थिति बेहतर नहीं है। आखिर इसकी क्या वजह है, स्थिति में कितना सुधार है, किन संस्थाओं द्वारा इस क्षेत्र में कार्य किया जा रहा है इसी पर आधारित रिपोर्ट।

हमारे देश में आज भी जिन्हें एड्स है वे यह बात स्वीकारने से कतराते हैं। इसकी वजह है घर में, समाज में होने वाला भेदभाव। कहीं न कहीं आज भी एचआईवी पॉजीटिव व्यक्तियों के प्रति भेदभाव की भावना रखी जाती है। यदि उनके प्रति समानता का व्यवहार किया जाए तो स्थिति और भी सुधर सकती है।

Essay on world aids day

बात अगर जागरूकता की करें तो लोग जागरूक जरूर हुए हैं इसलिए आज इसके प्रति काउंसलिंग करवाने वालों की संख्या बढ़ी है। पर यह संख्या शहरी क्षेत्र के और मध्यम व उच्च आय वर्ग के लोगों तक ही सीमित है। निम्न वर्ग के लोगों में अभी भी जानकारी का अभाव है। इसलिए भी इस वर्ग में एचआईवी पॉजीटिव लोगों की संख्या अधिक है। जबकि बहुत सी संस्थाएँ निम्न आय वर्ग के लोगों में इस बात के प्रति जागरूकता अभियान चला रही हैं। लोग कारण को जानने के बाद भी सावधानियाँ नहीं बरतते। जिन कारणों से एड्स होता है उससे बचने के बजाए अनदेखा कर जाते हैं। इसमें अधिकांश लोग असुरक्षित यौन संबंध और संक्रमित रक्त के कारण एड्स की चपेट में आते हैं।

एड्स के खिलाफ आज शहर में अनेक समाज सेवी और सरकारी संस्थाएँ कार्य कर रही हैं। इनका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना, एड्स के साथ जी रहे लोगों को समाज में उचित स्थान दिलाना, उनका उपचार कराना आदि है। इन संस्थाओं में से कुछ हैं फेमेली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया, विश्वास, भारतीय ग्रामीण महिला संघ, मध्यप्रदेश वॉलेन्ट्री हेल्थ एसोसिएशन, जिला स्तरीय नेटवर्क, वर्ल्ड विजन आदि। इसके अलावा एमवाय अस्पताल, जिला अस्पताल, लाल अस्पताल में एड्स की काउंसलिंग, टेस्ट और पोस्ट काउंसलिंग की जाती है।

फेमेली प्लानिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया, इंदौर शाखा सेक्सुअलिटी एजुकेशन, काउंसलिंग, रिसर्च, ट्रेनिंग/थैरेपी (एसईसीआरटी) परियोजना के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का कार्य कर रही है। संस्था किशोर बालक-बालिकाओं एवं युवाओं को किशोरावस्था, एड्स आदि के बारे में जानकारी देकर जागरूक बनाने का कार्य कर रही है। कार्यक्रम अधिकारी राजेन्द्र व्यास ने बताया कि संस्था को बने 50 वर्ष हो चुके हैं और एड्स के लिए करीब 10 सालों से कार्य किया जा रहा है। जागरूकता अभियान के तहत स्कूल-कॉलेज तो चुने ही जाते हैं पर जो लोग स्कूल-कॉलेज नहीं जाते उनके लिए कम्युनिटी प्रोग्राम या नुक्कड़ नाटक कर समझाया जाता है। ब्रांच मैनेजर प्रतूल जैन बताते हैं एड्स की रोकथाम के लिए किए जा रहे प्रयास तब ही सफल होंगे जब सरकार, जनता और समाजसेवी संस्थाएँ मिलकर प्रयास करें।

‘विश्वास’ पवित्र आत्मा सेविका संघ की मानवीय पहल है। इसका उद्देश्य है एचआईवी मुक्त समाज। 2003 में बनी यह संस्था न केवल एड्स के साथ जी रहे लोगों के स्वास्थ्य लिए कार्य करती है वरन्‌ उनके आर्थिक स्वावलंबन, काउंसलिंग के अलावा समाज या परिवार की मुख्यधारा में जोड़ने व संगठित करने का कार्य भी करती है। विश्वास संस्था की निदेशक सिस्टर जैसा एंथोनी ने बताया कि समय-समय पर इसमें नए प्रोजेक्ट के साथ इसी विषय पर कार्य किया गया। प्रोग्राम को-ऑर्डिनेटर ज्योति शिपणकर बताती हैं कि 2008 में विश्वास कम्युनिटी केयर सेंटर शुरू हुआ जो एड्स के इलाज के अलावा संबंधित व्यक्ति व उसके परिवार को रोजगार भी दिलाता है और उसके बच्चों को शिक्षा का अधिकार भी देता है।

Essay on world aids day in hindi

‘एड्‌स’ एक जानलेवा बीमारी है जो धीरे-धीरे समूचे विश्व को अपनी गिरफ्त में लेती जा रही है । दुनियाभर के चिकित्सक व वैज्ञानिक वर्षों से इसकी रोकथाम के लिए औषधि की खोज में लगे हैं परंतु अभी तक उन्हें सफलता नहीं मिल सकी है । पूरे विश्व में ‘एड्‌स’ को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ हैं । सभी बेसब्री से उस दिन की प्रतीक्षा कर रहे हैं जब वैज्ञानिक इसकी औषधि की खोज में सफल हो सकेंगे । एड्‌स का पूरा नाम ‘ऐक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिन्ड्रोम’ है ।

वैज्ञानिक सन् 1977 ई॰ में ही इसके प्रति सचेत हो गए थे जब विश्व भर के 200 से भी अधिक वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन अमेरिका में हुआ था । परंतु वास्तविक रूप में इसे मान्यता सन् 1988 में मिली । तभी से 1 दिसंबर को हम ‘एड्‌स विरोधी दिवस’ के रूप में जानते हैं । वे सभी व्यक्ति जो एड्‌स से ग्रसित हैं उनमें एच॰ आई॰ वी॰ वायरस अर्थात् विषाणु पाए जाते हैं । आज विश्वभर में एड्‌स से प्रभावित लोगों की संख्या चार करोड़ से भी ऊपर पहुँच गई है । अकेले दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया में ही लगभग एक करोड़ लोग एच॰ आई॰ वी॰ से संक्रमित हैं ।

अकेले थाईलैंड में ही हर वर्ष लगभग 3 से 4 हजार लोग एड्‌स के कारण काल का ग्रास बन रहे हैं । अधिक गहन अवलोकन करें तो हम पाते हैं कि विश्व भर में प्रति मिनट लगभग 25 लोग एड्‌स के कारण मरते हैं ।

एड्‌स प्रमुखत: निम्नलिखित कारणों से फैलता है:

1. किसी स्त्री या पुरुष द्‌वारा एच॰ आई॰ वी॰ संक्रमित स्त्री या पुरुष के साथ संभोग से ।

2. दूषित सुई के प्रयोग से ।

3. दूषित रक्त संचरण से ।

4. एच॰ आई॰ वी॰ संक्रमित महिला के गर्भ से ।

उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त किसी भी अन्य कारण से एड्‌स नहीं फैलता है । जो व्यक्ति एड्‌स से पीड़ित हो गए हैं उनके अंदर धीरे-धीरे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता समाप्त होती चली जाती है । एड्‌स हाथ मिलाने अथवा छूने से नहीं फैलता है । एड्‌स से ग्रसित लोग हमारी तरह सामान्य जीवन व्यतीत कर सकते हैं । अत: हमें उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करना चाहिए ।

भारत में भी यह रोग अपने पैर जमा चुका है । हम सब की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि हम पूरी सावधानी बरतें तथा इसके प्रति सभी को जागरूक बनाने का प्रयास करें। भारत सरकार भी इसे काफी प्रमुखता दे रही है ।

दूरदर्शन, समाचार-पत्रों तथा अन्य संचार माध्यमों के द्‌वारा एक साथ अभियान छेड़ा गया है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसके बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सकें । जगह-जगह एड्‌स सलाहकार केंद्र स्थापित किए गए हैं जहाँ से लोग अपने प्रश्नों का उत्तर प्राप्त कर सकते हैं । अस्पतालों में केवल ‘डिस्पोजेबल’ सुई का प्रयोग किया जा रहा है । एड्‌स का फैलाव चूँकि मुख्य रूप से महानगरीय संस्कृति के कारण अधिक हो रहा है, अत: महानगरों में स्वयंसेवी संस्थाओं द्‌वारा और अधिक प्रयासों की आवश्यकता है । देह-व्यापार के केंद्रों पर जाकर काम करना, वहाँ चेतना फैलाना हमारे समाज के उत्थान के लिए तथा इस रोग से बचाव के लिए अपरिहार्य बन गया है ।

आशा है कि शीघ्र ही वैज्ञानिक इस जानलेवा बीमारी का निदान ढूँढ लेंगे जिससे जल्द ही विश्व को एड्‌स मुक्त किया जा सकेगा । हाल ही में भारत की कुछ कंपनियों ने एड्‌स की कुछ ऐसी दवाइयाँ विकसित की हैं जिनसे रोगियों की पीड़ा काफी कम हो सकती हे । भारतीय कंपनियों द्‌वारा निर्मित दवाइयाँ सस्ती और कारगर भी हैं जिन्हें विश्व भर में मान्यता मिल रही है । कुछ भारतीय औषधियों की इसी कारण विश्व में माँग बढ़ती जा रही है । परंतु इस क्षेत्र में अभी बहुत अनुसंधान की आवश्यकता है ।

Short essay on world aids day

एड्‌स ‘ एक्वायर्ड इम्यून डेफिसिएन्सी सिंड्रोम ‘ का संक्षिप्त नाम है । यह एक असाध्य बीमारी है, जिसे पिछली सदी के अस्सी के दशक के पूर्व कोई भी नहीं जानता था । इस बीमारी का आभास सर्वप्रथम 1981 ई. में अमेरिका में हुआ, जब पाँच समलिंगी पुरुषों में इस अनोखी बीमारी के लक्षण पाए गए । यद्‌यपि इसका आरंभ अमेरिका में हुआ, परंतु इसकी जानकारी के लगभग आठ वर्ष पश्चात्, 1989 ई. में ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ की एक गणना के अनुसार 1,40,000 से भी अधिक लोग इस बीमारी के शिकार पाए गए । 1997 ई. में यह संख्या बढ्‌कर 1,5,44,067 हो गई । आज केवल भारत में ही लगभग पचास लाख एच. आई. वी. संक्रमित व्यक्ति निवास कर रहे हैं ।

एड्‌स मूलत: एच. आई. वी. अर्थात् ‘ह्‌यूमन एम्यूनो डेफिसिएन्सी वायरस’ से होती है । आज वास्तविकता यह है कि जिस रफ्तार से इसके जीवाणुओं से विश्वभर में लोग बाधित हो रहे हैं यह निकट भविष्य में मानव सभ्यता के लिए एक बड़ा खतरा बन सकता है । प्रतिदिन लगभग 7000 से भी अधिक लोग इस जीवाणु से ग्रसित हो सकते हैं । एड्‌स वास्तविक रूप में किसी एक बीमारी का नाम नहीं है अपितु यह अनेक प्रकार के रोगों का समूह है जो विशिष्ट जीवाणुओं के द्‌वारा मनुष्य की प्रतिरोधक क्षमता को नष्ट करने से उत्पन्न होती है । यह आवश्यक नहीं है कि ‘एच. आई. वी.’ से ग्रसित सभी मनुष्य एड्‌स के रोगी हैं । इस जीवाणु से ग्रसित लोगों में ‘एड्‌स’ को पूर्णत: विकसित होने में 7 से 10 वर्ष तक लग सकते हैं ।

विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों में ‘एड्‌स’ का रोग जल्दी विकसित होता है क्योंकि इन देशों के नागरिकों का खान-पान व स्वास्थ्य का स्तर अत्यंत निम्न है । केवल आयरलैंड, दक्षिण अफ्रीका, चीन और भारत में विश्व के 80% से भी अधिक ‘एच. आई. वी.’ ग्रसित लोग पाए जाते हैं ।

मनुष्यों में ‘एच. आई. वी.’ अथवा ‘एड्‌स’ कुछ प्रमुख कारणों से ही फैलता है । एच. आई. वी. प्रमुखत: अवैध यौन संबंधों से फैलता है । किसी भी युग्म का एक सदस्य यदि ‘एच. आई. वी.’ बाधित है तो यौन संबंधों द्‌वारा दूसरा सदस्य भी बाधित हो जाता है । स्त्रियों में इस रोग के फैलने की संभावना पुरुषों की अपेक्षा अधिक होती है । इसके अतिरिक्त ‘एच. आई. वी.’ जीवाणुओं से ग्रसित सुई के द्‌वारा अथवा बाधित स्त्रियों के गर्भ से होने वाली संतान में भी इस रोग के लक्षण हो सकते हैं ।

उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त किसी भी अन्य कारण, जैसे- ‘एच. आई. वी.’ अथवा एड्स से ग्रसित व्यक्ति के साथ बैठने, खाने अथवा उसकी देखरेख करने आदि से एड्स नहीं फैलता है । ‘एड्‌स’ अभी तक एक लाइलाज बीमारी है जिससे सामाजिक असंतुलन का नया खतरा उत्पन्न हो गया है । यह प्राय: मनुष्य में उस समय प्रविष्ट होती है जब उसमें सबसे अधिक ऊर्जा होती है । एक बार मनुष्य इस जीवाणु से ग्रसित होता है तब धीरे-धीरे उसकी ऊर्जा व प्रतिरोधक क्षमता विलीन होती जाती है ।

एड्‌स से बचाव ही इसका उपाय है । इसके लिए आवश्यक है कि इस रोग के फैलने के कारणों की जानकारी जन-जन तक पहुँचे । शिक्षा के द्‌वारा समाज में सुरक्षित यौन संबंधों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए । सुरक्षित यौन संबंधों के लिए ‘कंडोम’ अथवा निरोधक रक्तदान अथवा सुरक्षित सुई का प्रयोग कर हम एड्‌स के विस्तार को नियंत्रित कर सकते हैं ।

‘एड्‌स’ जैसे असाध्य रोगों का स्थायी समाधान ढूँढ निकालने के लिए विश्वभर के वैज्ञानिक अनुसंधान कार्य कर रहे हैं । इसे रोकना विश्व के समस्त लोगों, समाज, परिवार, स्वयंसेवी संस्थानों व अन्य वर्गों की जिम्मेदारी है । व्यक्ति को स्वयं अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए कि वह इसके बचाव का हरसंभव उपाय करेगा ।

समाज ‘एच. आई. वी.’ अथवा एड्‌स बाधित व्यक्ति के बाहिष्कार के बजाय उसके प्रति सकारात्मक व सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव रख सकता है । इसके अतिरिक्त सभी पत्र-पत्रिकाएँ व संचार के साधन इसके नियंत्रण में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं ।

‘एड्‌स’ संबंधी जानकारी के लिए भारत सरकार समय-समय पर प्रचार माध्यमों द्‌वारा अनेक कार्यक्रम जारी करती रहती है । इसके अतिरिक्त ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ द्‌वारा किए गए प्रयास सराहनीय हैं । सारांशत: हम कह सकते हैं कि ‘एड्‌स की जानकारी ही इससे बचाव है’ ।

हम स्वयं एड्‌स के बारे में सभी जानकारियाँ ग्रहण करें तथा अन्य लोगों को भी इनसे बचाव हेतु प्रेरित करें । एड्‌स के प्रचार-प्रसार में सही जानकारी का न होना मुख्य कारण रहा है, अत: हमारा सर्वाधिक जोर इस बाधा को दूर करना होना चाहिए ।

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