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Women’s Equality Day Speech in Hindi & English Pdf Download – 26 August महिला समानता दिवस भाषण

Women’s Equality Day 2018: महिला समानता दिवस एक बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है जो की भारत में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा देता है| आज के समय में भारत में महिलाओ की समानता एक बहुत ही बड़ा मुद्दा है| महिला आज के समय में पूरी तरह से सशक्त हो गई है| पहले के समय में महिलाओ को अपने हक़ की जानकारी नहीं थी| पर आज की महिलाए अपना हक़ माँगना जानती है| हर साला महिला समानता दिवस 26 अगस्त को पूरे विश्व में मनाया जाता है| इस दिन पर जगह जगह महिलाओ की समानता के प्रति जागरूकता फैलाई जाती है| आइये अब हम आपको how to celebrate women’s equality day, women’s equality day celebration ideas, women’s equality day 2018 theme, women’s equality day 2017, women’s equality day speech, women’s equality day history, women’s equality day 2017 theme, national women’s equality day 2018, आदि की जानकारी देंगे| ये स्पीच कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए दिए गए है|

महिला समानता दिवस स्पीच

महिला समानता दिवस एक बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है जो की हर साल 1920 से 26 अगस्त को मनाया जाता है| इस दिन पर विश्व भर में लोगो को महिला समानता के बारे में जान्ने में आसानी होगी| अक्सर class 1, class 2, class 3, class 4, class 5, class 6, class 7, class 8, class 9, class 10, class 11, class 12 के बच्चो को कहा जाता है महिला समानता पर स्पीच लिखें| आइये जाने world women equility day 2018 theme, महिला सक्षमीकरण निबंध, महिला समानता दिवस पर नारे, महिला समानता दिवस पर भाषण आदि | इन महिला समानता दिवस पर हिंदी भाषण हिंदी में 100 words, 150 words, 200 words, 400 words जिसे आप किसी भी भाषा जैसे Hindi, हिंदी फॉण्ट, मराठी, गुजराती, Urdu, उर्दू, English, sanskrit, Tamil, Telugu, Marathi, Punjabi, Gujarati, Malayalam, Nepali, Kannada के Language Font में साल 2007, 2008, 2009, 2010, 2011, 2012, 2013, 2014, 2015, 2016, 2017 का full collection pdf download भी कर सकते हैं| साथ ही आप Malala Yousafzai quotes in hindi भी देख सकते हैं|

महिला समानता दिवस (Women’s Equality Day) प्रत्येक वर्ष ’26 अगस्त’ को मनाया जाता है। न्यूजीलैंड विश्व का पहला देश है, जिसने 1893 में महिला समानता की शुरुआत की। भारत में आज़ादी के बाद से ही महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्राप्त तो था, लेकिन पंचायतों तथा नगर निकायों में चुनाव लड़ने का क़ानूनी अधिकार 73वे संविधान संशोधन के माध्यम से स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के प्रयास से मिला। इसी का परिणाम है की आज भारत की पंचायतों में महिलाओं की 50 प्रतिशत से अधिक भागीदारी है।

26 अगस्त ही क्यों
न्यूजीलैंड दुनिया का पहला देश है, जिसने 1893 में ‘महिला समानता’ की शुरुवात की। अमरीका में ’26 अगस्त’, 1920 को 19वें संविधान संशोधन के माध्यम से पहली बार महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। इसके पहले वहाँ महिलाओं को द्वितीय श्रेणी नागरिक का दर्जा प्राप्त था। महिलाओं को समानता का दर्जा दिलाने के लिए लगातार संघर्ष करने वाली एक महिला वकील बेल्ला अब्ज़ुग के प्रयास से1971 से 26 अगस्त को ‘महिला समानता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा। भारत ने महिलाओं को आज़ादी के बाद से ही मतदान का अधिकार पुरुषों के बराबर दिया, परन्तु यदि वास्तविक समानता की बात करें तो भारत में आज़ादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी महिलाओं की स्थिति गौर करने के लायक है। यहाँ वे सभी महिलाएं नज़र आती हैं, जो सभी प्रकार के भेदभाव के बावजूद प्रत्येक क्षेत्र में एक मुकाम हासिल कर चुकी हैं और सभी उन पर गर्व भी महसूस करते हैं। परन्तु इस कतार में उन सभी महिलाओं को भी शामिल करने की ज़रूरत है, जो हर दिन अपने घर में और समाज में महिला होने के कारण असमानता को झेलने के लिए विवश है। चाहे वह घर में बेटी, पत्नी, माँ या बहन होने के नाते हो या समाज में एक लड़की होने के नाते हो। आये दिनसमाचार पत्रों में लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी खबरों को पढ़ा जा सकता है, परन्तु इन सभी के बीच वे महिलाएं जो अपने ही घर में सिर्फ इसीलिए प्रताड़ित हो रही हैं, क्योंकि वह एक औरत है।देश में प्रधानमंत्री के पद पर इंदिरा गाँधी और राष्ट्रपति के पद पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल रह चुकी हैं।

दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस कीशीला दीक्षित, तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक अध्यक्ष जयललिता, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी और ‘बहुजन समाज पार्टी’ की अध्यक्ष मायावती ने अच्छा नाम अर्जित किया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को तो विश्व की ताकतवर महिलाओं में शुमार किया ही जा चुका है। यदि देश की संसद में देखें तो सुषमा स्वराज और मीरा कुमार भी भारतीय राजनीति में प्रसिद्ध हैं। कॉरपोरेट सेक्टर, बैंकिंग सेक्टर जैसे क्षेत्रों में इंदिरा नूई और चंदा कोचर जैसी महिलाओं ने भी अपना लोहा मनवाया है। इन कुछ उपलब्धियों के बाद भी देखें तो आज भी महिलाओं की कामयाबी आधी-अधूरी समानता के कारण कम ही है। हर साल 26 अगस्त को ‘महिला समानता दिवस’ तो मनाया जाता है, लेकिन दूसरी ओर महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार आज भी जारी है। हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और प्रतिशत कम है।

साक्षरता दर में महिलाएं आज भी पुरुषों से पीछे हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार महिलाओं की साक्षरता दर में 12 प्रतिशत की वृद्धि जरूर हुई है, लेकिन केरल में जहाँ महिला साक्षरता दर 92 प्रतिशत है, वहीं बिहार में महिला साक्षरता दर अभी भी 53.3 प्रतिशत है। आज भी समाज की मानसिकता पूरी तरह नही बदली नहीं है। काफ़ी हद तक इसके लिए लड़कियां भी जिम्मेदार हैं। प्रगति और विकास के मामले में दक्षिण अफ्रीका, नेपाल, बांग्लादेश एवं श्रीलंका भले ही भारत से पीछे हों, परंतु स्त्रियों और पुरुषों के बीच सामनता की सूची में इनकी स्थिति भारत से बेहतर है। स्वतंत्रता के छह दशक बाद भी ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों में महिलाओं को दोयम दर्जे की मार से जूझना पड़ रहा है। देश की चंद महिलाओं की उपलब्धियों पर अपनी पीठ थपथपाने की बजाय हमें इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि हमारे देश में महिलाएं न केवल दफ्तर में भेदभाव का शिकार होती हैं, बल्कि कई बार उन्हें यौन शोषण का भी शिकार होना पड़ता है। सार्वजनिक जगहों पर यौन हिंसा के मामले आए दिन सुर्खियों में आते रहते हैं।यूनीसेफ की रिपोर्ट यह बाताती है कि महिलाएं नागरिक प्रशासन में भागीदारी निभाने में सक्षम हैं। यही नहीं, महिलाओं के प्रतिनिधित्व के बगैर किसी भी क्षेत्र में काम ठीक से और पूर्णता के साथ संपादित नहीं हो सकता।

Women’s Equality Day Speech in Hindi

Women's Equality Day Speech in English

प्रत्येक वर्ष ’26 अगस्त’ को मनाया जाता है। न्यूजीलैंड विश्व का पहला देश है, जिसने 1893 में महिला समानता की शुरुआत की। भारत में आज़ादी के बाद से ही महिलाओं को वोट देने का अधिकार प्राप्त तो था, लेकिन पंचायतों तथा नगर निकायों में चुनाव लड़ने का क़ानूनी अधिकार 73वे संविधान संशोधन के माध्यम से स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के प्रयास से मिला। इसी का परिणाम है कि आज भारत की पंचायतों में महिलाओं की 50 प्रतिशत से अधिक भागीदारी है।

26 अगस्त ही क्यों
न्यूजीलैंड दुनिया का पहला देश है, जिसने 1893 में ‘महिला समानता’ की शुरुवात की। अमरीका में ’26 अगस्त’, 1920 को 19वें संविधान संशोधन के माध्यम से पहली बार महिलाओं को मतदान का अधिकार मिला। इसके पहले वहाँ महिलाओं को द्वितीय श्रेणी नागरिक का दर्जा प्राप्त था। महिलाओं को समानता का दर्जा दिलाने के लिए लगातार संघर्ष करने वाली एक महिला वकील बेल्ला अब्ज़ुग[1] के प्रयास से 1971 से 26 अगस्त को ‘महिला समानता दिवस’ के रूप में मनाया जाने लगा।

भारत में महिलाओं की स्थिति
भारत ने महिलाओं को आज़ादी के बाद से ही मतदान का अधिकार पुरुषों के बराबर दिया, परन्तु यदि वास्तविक समानता की बात करें तो भारत में आज़ादी के इतने वर्ष बीत जाने के बाद भी महिलाओं की स्थिति गौर करने के लायक है। यहाँ वे सभी महिलाएं नज़र आती हैं, जो सभी प्रकार के भेदभाव के बावजूद प्रत्येक क्षेत्र में एक मुकाम हासिल कर चुकी हैं और सभी उन पर गर्व भी महसूस करते हैं। परन्तु इस कतार में उन सभी महिलाओं को भी शामिल करने की ज़रूरत है, जो हर दिन अपने घर में और समाज में महिला होने के कारण असमानता को झेलने के लिए विवश है। चाहे वह घर में बेटी, पत्नी, माँ या बहन होने के नाते हो या समाज में एक लड़की होने के नाते हो। आये दिन समाचार पत्रों में लड़कियों के साथ होने वाली छेड़छाड़ और बलात्कार जैसी खबरों को पढ़ा जा सकता है, परन्तु इन सभी के बीच वे महिलाएं जो अपने ही घर में सिर्फ इसीलिए प्रताड़ित हो रही हैं, क्योंकि वह एक औरत है।

देश में प्रधानमंत्री के पद पर इंदिरा गाँधी और राष्ट्रपति के पद पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल रह चुकी हैं। दिल्ली की सत्ता पर कांग्रेस की शीला दीक्षित, तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक अध्यक्ष जयललिता, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी और ‘बहुजन समाज पार्टी’ की अध्यक्ष मायावती ने अच्छा नाम अर्जित किया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को तो विश्व की ताकतवर महिलाओं में शुमार किया ही जा चुका है। यदि देश की संसद में देखें तो सुषमा स्वराज और मीरा कुमार भी भारतीय राजनीति में प्रसिद्ध हैं। कॉरपोरेट सेक्टर, बैंकिंग सेक्टर जैसे क्षेत्रों में इंदिरा नूई और चंदा कोचर जैसी महिलाओं ने भी अपना लोहा मनवाया है।

इन कुछ उपलब्धियों के बाद भी देखें तो आज भी महिलाओं की कामयाबी आधी-अधूरी समानता के कारण कम ही है। हर साल 26 अगस्त को ‘महिला समानता दिवस’ तो मनाया जाता है, लेकिन दूसरी ओर महिलाओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार आज भी जारी है। हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी और प्रतिशत कम है।

महिला साक्षरता
साक्षरता दर में महिलाएं आज भी पुरुषों से पीछे हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार महिलाओं की साक्षरता दर में 12 प्रतिशत की वृद्धि ज़रूर हुई है, लेकिन केरल में जहाँ महिला साक्षरता दर 92 प्रतिशत है, वहीं बिहार में महिला साक्षरता दर अभी भी 53.3 प्रतिशत है।

‘दिल्ली महिला आयोग’ की सदस्य रूपिन्दर कौर कहती हैं कि “बदलाव तो अब काफ़ी दिख रहा है। पहले जहाँ महिलाएं घरों से नहीं निकलती थीं, वहीं अब वे अपने हक की बात कर रही हैं। उन्हें अपने अधिकार पता हैं और इसके लिए वे लड़ाई भी लड़ रही हैं।” दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘दौलत राम कॉलेज’ में सहायक प्रोफेसर डॉ. मधुरेश पाठक मिश्र कहती हैं कि “कॉलेजों में लड़कियों की संख्या देखकर लगता है कि अब उन्हें अधिकार मिल रहे हैं। लेकिन एक शिक्षिका के तौर पर जब मैंने लड़कियों में खासकर छोटे शहर की लड़कियों में सिर्फ विवाह के लिए ही पढ़ाई करने की प्रवृत्ति देखी तो यह मेरे लिए काफ़ी चौंकाने वाला रहा। आज भी समाज की मानसिकता पूरी तरह नही बदली नहीं है। काफ़ी हद तक इसके लिए लड़कियां भी जिम्मेदार हैं।

Women’s Equality Day Speech in English

I’m very pleased to have the opportunity to speak with you today on this occasion of Women’s Equality Day. This is an opportunity to honor one of the most significant events in the history of our nation – women receiving the right to vote. Women’s suffrage was a huge step in the movement for women’s equality.

In the words of Maureen Reagan, daughter of president Ronald Reagan, “I will feel equality has arrived when we can elect to office women who are as incompetent as some of the men who are already there.” Women’s Equality Day commemorates the passage of the 19th Amendment in 1920. Before that, it’s hard to imagine, but women could not participate in one of the most basic freedoms we have. It’s the right to make your voice heard. Half of the people in our nation were silenced and not allowed to participate in making decisions for our democracy. It’s truly shocking to imagine today.

Before we get into that, I want to make it a little more realistic for all of us sitting here. I want to go back to the beginnings of our nation and review who was allowed to vote historically. Do you think you were included? Many of us, I would even say most of us, would not have been allowed to vote in the early days when we were a young nation still figuring out how we would build our democracy. If you will, I ask you to play along with me for a few minutes as we explore who would have been allowed to vote.

Everyone please put your hands up. Go ahead and put them up high so we can see. We’re going to pretend the people here today are going to elect the next president, and the only ones allowed to vote are the people who could have voted in early America. Let’s get started.

If you are younger than twenty one, please put your hand down. You would not be able to vote.

If you are a woman, please put your hand down. You would not have been allowed to vote.

If you are of any other racial background other than white, please put down your hand. You would not be allowed to vote.

If you do not own the land your home stands on, and I don’t mean if the bank owns it! If you personally do not own land, please put your hand down. You would not be allowed to vote.

Finally, if you have ever been judged criminally insane, you can put your hand down. (PAUSE FOR LAUGHTER) You would not be allowed to vote.

Thank you, you can all put your hands down. Only the people with their hands up until the end could have voted if we were in early America – Only white, wealthy males over 21. In fact, in the first election at Jamestown, only six percent of the people were allowed to vote! Imagine if that was still the case in America today – if six percent of the population decided our fate and ninety four percent of the citizens were excluded from voting. We would have a very different country.

Thank goodness that’s not the case. America has gotten greater with time as we have extended the vote to more people and recognized that freedom and inclusion are part of our strength. But women’s right to vote didn’t come easily, just like drastic social change never comes easily. The women’s suffrage movement had its formal beginnings in the first women’s rights convention in 1848 at Seneca Falls, New York. Anyone who has read about the women’s rights movement knows the names of Susan B Anthony, Elizabeth Cady Stanton and Sojourner Truth, but we must remember that while a movement may be led by a few, it is made up of many.

Social change comes like a great rising wave on the ocean – powerful, unyielding, sweeping history along in its path. Great social change comes about because of a vast movement of many, courageous people, both men and women, who refused to back down. Many of their names are lost to history, but we will never forget their actions. They were the people who marched day after day. Despite the fear of violence or verbal attacks, they returned again and again to continue fighting. They were women who were arrested and went to prison willingly to stand up for what they believed in, and once there, went on hunger strikes and endured beatings and forced feedings. They were the men who were mocked and laughed at when they spoke to other men of the need for women’s equality. They were the women who fought for their daughters’ right to vote and to be treated like an equal citizen.

All of these people are responsible for the changes to women’s rights that made our country stronger, greater, and gave more meaning to the words “one nation undivided”. It is in moments like that, when we as a nation were challenged by change when we become truly great. We chose to embrace the change and grow as a people because it reflected our true values of respect for equality and the right for everyone’s voice to be heard.

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