Swami Vivekananda Essay in Hindi | स्वामी विवेकानंद पर निबंध – Swami Vivekananda Jayanti

Swami Vivekananda Essay in Hindi

Swami Vivekananda जी एक धार्मिक व्यक्ति थे जो संसार के लिए एक प्रेरणा हैं | जीवन में आगे बढ़ने व सफलता हासिल करने की सीख देने वाले स्वामी विवेकानंद जी बहुत लोगों के लिए एक प्रेरणा रहे हैं, स्वामी जी साहित्य, दर्शन व इतिहास के प्रकांड विद्वान् थे और इनका जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकता में हुआ था | स्वामी विवेकानंद जी द्वारा ही राजयोग, योग व ज्ञानयोग जैसे ग्रंथों की रचना की गयी थी |

स्वामी जी ने शिकागो में एक बहुत ही चर्चित भाषण दिया था | स्वामी जी द्वारा लिखे गए ग्रंथों ने युवा जगत को नई राह दिखाई है | आइये अब हम आपको स्वामी विवेकानंद जी के संदर्भ में लिखे गए कुछ निबंधों के बारे में जानकारी प्रदान कराएंगे|

Swami Vivekananda essay in English

इस दिन स्वामी विवेकानंद पर भाषण या निबंध प्रतियोगिता भी होती है जिसे में विवेकानंद जी के विचार या उनके भारत के लिए योगदान की जानकारी दी जाती है|

Swami Vivekananda was born in the Shimla Pally in Calcutta on 12th of January in 1863 and died on 4th of July in 1902. He was the chief follower of Sri Ramakrishna Paramahansa. His birth name was Narendranath Datta who later became the founder of Ramakrishna Mission. He was the person of Indian origin who became successful in introducing the Hindu philosophies of Vedanta and Yoga in the Europe and America. He revived Hinduism in the modern India. His inspiring speech is still followed among the youths of the country. He had also introduced the Hinduism at Parliament of the World’s Religions at Chicago in 1893.

His father name was Vishwanath Datta, an attorney of Calcutta High Court, and mother name was Bhuvaneshwari Devi. Swami Vivekananda was influenced by the rational mind of his father and religious temperament of his mother. He learned self-control from his mother and later became an expert in meditation. His self control was really amazing using which he could easily enter to the state of samadhi. He developed a remarkable leadership quality in his young age. He came in contact with the Sri Ramakrishna after visiting to the Brahmo Samaj when he was youth. He stayed with his monk-brothers at the Boranagar Monastfery. In his later life, he decided for touring India and started wandering from place to place and reached Trivandum where he decided to attend the Parliament of Religions at Chicago.

He became very popular all around the world after delivering effective speeches and lectures at many places. He returned to India and founded Ramakrishna Maths and Mission in 1897, Advaita Ashrama in Mayavati (near Almora) in 1899. The Ashrama was a branch of the Ramakrishna Math. The famous arati song, Khandana Bhava Bandhana is composed by him. Once he meditated for three hours at Belur Math. It is considered that once he went to meditate in his room. He asked not to be disturbed and died while meditating.

Essay in Marathi

स्वामी विवेकानंद, जगभरातील एक लोकप्रिय साधू, 12 जानेवारी 1863 रोजी कलकत्ता येथे त्यांचा जन्म झाला. त्यांना लहानपणापासून नरेंद्र नाथ दत्ता असे संबोधले गेले. भारतातील राष्ट्रीय युवा दिवस म्हणून दरवर्षी त्यांचे जयंती साजरे केले जाते. कलकत्ता उच्च न्यायालयात व भुवनेश्वरी देवीच्या वकील विश्वनाथ दत्ता यांचे ते आठ बंधू होते. ते एक उज्ज्वल विद्यार्थी होते परंतु त्यांचे शिक्षण अनियमित होते. संस्कृतच्या ज्ञानासाठी ते अतिशय धार्मिक आणि अध्यात्मिक होते. तो एक सत्य वक्ता, चांगला विद्वान आणि एक खेळाडू होता. बालपणापासूनच तो अतिशय धार्मिक होता आणि तो देवाला कुठे मिळवू शकला याबद्दल गोंधळलेला होता. एके दिवशी श्री रामकृष्णांच्या आध्यात्मिक प्रभावामुळे ते श्री रामकृष्ण (दक्षिणेश्वर काली मंदिर येथे पुजारी) भेटले. रामकृष्ण यांना त्यांचा आध्यात्मिक गुरु म्हणून स्वीकारल्यावर त्यांना स्वामी विवेकानंद म्हणून ओळखले गेले.

आपल्या गुरूच्या निधनानंतर, 1893 मध्ये शिकागो येथील संसदेच्या संसदेत त्यांनी अनेक अडचणींना सामोरे जावे लागले. न्यूयॉर्कमधील वृत्तपत्रांपैकी एकाने त्यांना संसदच्या संसदेत सर्वात महान आकृती म्हणून स्थान दिले. स्वामी विवेकानंद देशभरातून दारिद्र्य निर्मूलन करण्याचा प्रयत्न करणारे देशभरातील एक महान देशभक्त आणि महान आध्यात्मिक आकृती होते. त्यांनी 1997 मध्ये 1997 रोजी रामकृष्ण मिशन नावाची एक संस्था स्थापन केली होती जी प्रॅक्टिकल वेदांत आणि सामाजिक सेवांची विविधता पसरविण्यामध्ये समाविष्ट आहे. 4 जून 1902 रोजी 39 रोजी त्यांचा मृत्यू झाला.

Essay in Gujarati

સ્વામી વિવેકાનંદ 12 જાન્યુઆરી, 1863 ના રોજ કલકત્તામાં નરેન્દ્ર દત્તના રૂપમાં જન્મ્યા હતા. તેમના માતાપિતા ભુવનેશ્વરવી દેવી (ધાર્મિક ગૃહ નિર્માતા) અને વિશ્વનાથ દત્ત (કલકત્તા હાઈકોર્ટના વકીલ) હતા. તે ભારતના સૌથી જાણીતા હિન્દુ સાધુ અને દેશભક્ત સંત હતા. તેમની ઉપદેશો અને મૂલ્યવાન વિચારો ભારતની સૌથી મહાન દાર્શનિક સંપત્તિ છે. તેમણે બેલુર મઠ અને રામકૃષ્ણ મિશનની સ્થાપના કરી. પુષ્પ કૃષ્ણ પૂજાની પૂર્ણિમા પછી દર વર્ષે સપ્તમી ઉજવાય છે.

1985 થી, ભારત સરકારે દર વર્ષે 12 જાન્યુઆરીના રોજ રાષ્ટ્રીય યુવા દિવસ તરીકે સ્વામી વિવેકાનંદની જન્મ જયંતિની જાહેરાત કરી છે. આ દિવસની ઉજવણીનો ઉદ્દેશ યુવા પેઢીને પ્રેરણા આપવા તેમજ ભવિષ્યની પેઢીઓમાં તેમના સંપૂર્ણ આદર્શો વિકસાવવા માટે હતો. આ દિવસે લોકો સ્વામી વિવેકાનંદ અને દેશમાં તેમના યોગદાનને યાદ કરે છે. રામકૃષ્ણ મઠના કેન્દ્રો અને રામકૃષ્ણ મિશનના કેન્દ્રો સહિતના રામકૃષ્ણ મિશનના મુખ્ય મથકમાં આદરપૂર્વક ઉજવણી થાય છે. આ દિવસે ઘણી પ્રવૃત્તિઓ, જેમ કે હવન, ધ્યાન, મંગલ આરતી, ભક્તિ ગીતો ધાર્મિક પ્રવચન, સાંજે આર્ટિ, વગેરે દ્વારા ઉજવવામાં આવે છે.

स्वामी विवेकानंद एस्से

वर्तमान में भारत के युवा जि‍स महापुरुष के विचारों को आदर्श मानकर उससे प्रेरित होते हैं, युवाओं के वे मार्गदर्शक और भारतीय गौरव हैं स्वामी विवेकानंद।भारत की गरिमा को वैश्विक स्तर पर सम्मान के साथ बरकरार रखने के लिए स्वामी विवेकानंद के कई उदाहरण इतिहास में मिलते हैं।

स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहां उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ।

सन्‌ 1884 में श्री विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।

रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु परमहंसजी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ।

स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूक, रक्त, कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे।

एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए।

गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा।

25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की।

सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए।

फिर तो अमेरिका में उनका बहुत स्वागत हुआ। वहां इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे।

‘अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा’ यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं स्थापित कीं। अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया।

4 जुलाई सन्‌ 1902 को उन्होंने देह त्याग किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।

स्वामी विवेकानंद पर लेख

स्वामी विवेकानंद की गिनती भारत के महापुरुषों में होती है । उस समय जबकि भारत अंग्रेजी दासता में अपने को दीन-हीन पा रहा था, भारत माता ने एक ऐसे लाल को जन्म दिया जिसने भारत के लोगों का ही नहीं, पूरी मानवता का गौरव बढ़ाया । उन्होंने विश्व के लोगों को भारत के अध्यात्म का रसास्वादन कराया । इस महापुरुष पर संपूर्ण भारत को गर्व है ।

इस महापुरुष का जन्म 12 जनवरी, 1863 ई. में कोलकाता के एक क्षत्रिय परिवार में श्री विश्वनाथ दत्त के यहाँ हुआ था । विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाई कोर्ट के नामी वकील थे । माता-पिता ने बालक का नाम नरेन्द्र रखा । नरेन्द्र बचपन से ही मेधावी थे । उन्होंने 1889 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण कर कोलकाता के ‘ जनरल असेम्बली ’ नामक कॉलेज में प्रवेश लिया । यहाँ उन्होंने इतिहास, दर्शन, साहित्य आदि विषयों का अध्ययन किया । नरेन्द्र ने बी.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की ।

नरेन्द्र ईश्वरीय सत्ता और धर्म को शंका की दृष्टि से देखते थे । लेकिन वे जिज्ञासु प्रवृत्ति के थे । वे अपनी जिज्ञासा शांत करने के लिए ब्रह्मसमाज में गए । यहाँ उनके मन को संतुष्टि नहीं मिली । फिर नरेन्द्र सत्रह वर्ष की आयु में दक्षिणेश्वर के संत रामकृष्ण परमहंस के संपर्क में आए । परमहंस जी का नरेन्द्र पर गहरा प्रभाव पड़ा । नरेन्द्र ने उन्हें अपना गुरु बना लिया ।
इन्ही दिनों नरेन्द्र के पिता का देहांत हो गया । नरेन्द्र पर परिवार की जिम्मेदारी आ गई । परंतु अच्छी नौकरी न मिलने के कारण उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा । नरेन्द्र गुरु रामकृष्ण की शरण में गए । गुरु ने उन्हें माँ काली से आर्थिक संकट दूर करने का वरदान माँगने को कहा । नरेन्द्र माँ काली के पास गए परंतु धन की बात भूलकर बुद्धि और भक्ति की याचना की । एक दिन गुरु ने उन्हें अपनी साधना का तेज देकर नरेन्द्र से विवेकानन्द बना दिया ।

रामकृष्ण परमहंस की मृत्यु के बाद विवेकानन्द कोलकाता छोड़ वरादनगर के आश्रम में रहने लगे । यहाँ उन्होंने शास्त्रों और धर्मग्रंथों का अध्ययन किया । इसके बाद वे भारत की यात्रा पर निकल पड़े । वे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, जूनागढ़, सोमनाथ, पोरबंदर, बड़ौदा, पूना, मैसूर होते हुए दक्षिण भारत पहुँचे । वहाँ से वे पांडिचेरी और मद्रास पहुँचे ।

सन् 1893 में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्व धर्म-सम्मेलन हो रहा था । शिष्यों ने स्वामी विवेकानन्द से उसमें भाग लेकर हिन्दू धर्म का पक्ष रखने का आग्रह किया । स्वामी जी कठिनाइयों को झेलते हुए शिकागो पहुँचे । उन्हें सबसे अंत में बोलने के लिए बुलाया गया । परंतु उनका भाषण सुनते ही श्रोता गद्‌गद् हो उठे । उनसे कई बार भाषण कराए गए । दुनिया में उनके नाम की धूम मच गई । इसके बाद उन्होंने अमेरिका तथा यूरोपीय देशों का भ्रमण किया । अमेरिका के बहुत से लोग उनके शिष्य बन गए ।

चार वर्षों में विदेशों में धर्म-प्रचार के बाद विवेकानन्द भारत लौटे । भारत में उनकी ख्याति पहले ही पहुंच चुकी थी । उनका भव्य स्वागत किया गया । स्वामी जी ने लोगों से कहा – ” वास्तविक शिव की पूजा निर्धन और दरिद्र की पूजा में है, रोगी और दुर्बल की सेवा में है । ” भारतीय अध्यात्मवाद के प्रचार और प्रसार के लिए उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की । मिशन की सफलता के लिए उन्होंने लगातार श्रम किया, जिससे उनका स्वास्थ्य बिगड़ गया । 4 जुलाई, 1902 ई. को रात्रि के नौ बजे, 39 वर्ष की अल्पायु में ‘ ॐ ‘ ध्वनि के उच्चारण के साथ उनके प्राण-पखेरू उड़ गए । परंतु उनका संदेश कि ‘ उठो जागो और तब तक चैन की साँस न लो जब तक भारत समृद्ध न हो जाय ‘ – हमारा मार्गदर्शन करता रहेगा ।

स्वामी विवेकानंद जयंती पर निबंध

‘उठो, जागो और अपने लक्ष्य की प्राप्ति से पूर्व मत रुको ।’

यह दिव्य उपदेश स्वामी विवेकानंद द्‌वारा दिया गया था । स्वामी विवेकानंद महामानव के रूप में अवतरित हुए । विश्व के समक्ष हिंदू धर्म और भारतीयता की जो अनुपम छवि स्वामी जी ने प्रस्तुत की वह अद्‌वितीय थी ।

मानव सेवा का लक्ष्य रखते हुए स्वामी जी ने धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए जो कार्य किए उसके लिए मानव समाज सदैव उनका ऋणी रहेगा । भारतीय इतिहास में हिंदू धर्म के महान प्रवर्तकों में उनका नाम सदा अग्रणी रहेगा ।

स्वामी विवेकानंद का बचपन का नाम नरेंद्रनाथ था । उनका जन्म सन् 1863 ई॰ में कोलकाता में हुआ था । वे बचपन से अत्यंत चंचल स्वभाव के थे । अध्ययन में अधिक रुचि न होने के कारण उनका अधिकांश समय खेलकूद में ही बीतता था । उनकी माता धार्मिक आचार-विचार की थीं । नरेंद्रनाथ पर अपनी माता के धार्मिक विचारों का गहरा प्रभाव पड़ा जिसके फलस्वरूप वे धीरे-धीरे धार्मिक प्रवृत्ति में स्वयं को ढालते चले गए ।

ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति के लिए उनकी इच्छा बढ़ती गई । इसके लिए उन्होंने तत्कालीन संत रामकृष्ण परमहंस की शरण ली । इनकी ओजस्विता को गुरु ने पहचाना और शिक्षा देना प्रांरभ कर दिया । गुरु रामकृष्ण परमहंस जी से उन्हें मानव जाति के कल्याण व उत्थान के लिए कार्य हेतु प्रेरणा मिली ।

वे धीरे-धीरे स्वामी परमहंस के परम शिष्य व उनके अनुयायी बन गए । उन्होंने स्वामी जी के सत्संग में रहकर यह समझा कि संन्यास का वास्तविक अर्थ संसार और स्वयं से विरक्ति नहीं है अपितु इसका उद्‌देश्य मानव कल्याण के लिए कार्य करना है ।

स्वामी परमहंस के देहावसान के उपरांत उन्होंने वेदों और शास्त्रों का गहन अध्ययन किया । सन् 1881 ई॰ में विधिवत् संन्यास के उपरांत वे स्वामी विवेकानंद कहलाए। उसके पश्चात् वे जीवन पर्यंत धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कृत संकल्पित हो गए ।

सन् 1883 ई॰ में अमेरिका के शिकागो शहर में विश्वधर्म सम्मेलन का आयोजन हुआ जहाँ विश्व के सभी धर्मो के जनप्रतिनिधि एकत्रित हुए । स्वामी विवेकानंद भी हिंदू धर्म के प्रतिनिधि के रूप मैं वहीं गए । सम्मेलन में जब उनकी बारी आई तो वे मंच पर पहुँचे तथा पूर्णत: अद्‌वितीय तरीके से उन्होंने अपना संबोधन ‘अमेरिकावासियो भाइयो और बहनो’ से प्रारंभ किया तो वहाँ बैठे सभी श्रोतागण हर्ष से परिपूरित तथा और भी अधिक एकाग्र हो गए । इसके पश्चात् उन्होंने हिंदू धर्म की महानता और विशालता तथा मानव धर्म के प्रति जो ओजस्वी भाषण दिया उसने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।

धर्म की इतनी सुंदर और सुदृढ़ व्याख्या इससे पूर्व किसी ने नहीं की थी । वहाँ के लोकप्रिय समाचार-पत्र द न्यूयार्क हेराल्ड ने उनके बारे में टिप्पणी की, ”इस धर्म सम्मेलन में विवेकानंद सबसे महान हस्ती हैं । जो देश धर्म ज्ञान में इतना श्रेष्ठ है वहाँ ईसाई-धर्म प्रचारकों को भेजना बहुत ही मूर्खतापूर्ण है । ”

धीरे-धीरे स्वामी जी की ख्याति चारों ओर फैलती गई । अनगिनत लोग उनके अनुयायी बन गए । उसके पश्चात् सभी धर्म सम्मेलनों में उन्हें सादर आमंत्रित किया जाने लगा। वे निरंतर बिना रुके धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य करते रहे ।

अमेरिका और इंग्लैंड के अलावा वे अन्य यूरोपीय देशों में भी गए जहाँ अनेक युवक-युवतियाँ उनके शिष्य बन गए । भारत आकर उन्होंने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की । कार्य के प्रति उनका समर्पण बढ़ता ही चला गया । अंतत: उनका यही परिश्रम उनकी अस्वस्थता का कारण बना और 1921 ई॰ में वे चिरनिद्रा में लीन हो गए ।

स्वामी विवेकानंद महामानव के रूप में अवतरित हुए । उन्होंने धर्म के प्रचार-प्रसार में जो भूमिका प्रस्तुत की वह अतुलनीय है । वे भारत माँ के सच्चे सपूत थे । इन्होंने भारत का गौरव बढ़ाया और विश्व के समक्ष भारत की अनुपम तस्वीर प्रस्तुत की । उनके कार्य आज भी आदर्श और प्रेरणा के स्रोत हैं ।

Essay in Hindi 500 words

विश्वभर में ख्याति प्राप्त साधु, स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हुआ था। वह बचपन में नरेन्द्र नाथ दत्त के नाम से जाने जाते थे। इनकी जयंती को भारत में प्रत्येक वर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रुप में मनाया जाता है। वह विश्वनाथ दत्त, कलकत्ता उच्च न्यायालय के वकील, और भुवनेश्वरी देवी के आठ बच्चों में से एक थे। वह होशियार विद्यार्थी थे, हालांकि, उनकी शिक्षा बहुत अनियमित थी। वह बहुत धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्ति थे और अपने संस्कृत के ज्ञान के लिए लोकप्रिय थे। वह सच बोलने वाले, अच्छे विद्वान, और खिलाड़ी थे। वह बचपन से ही धार्मिक प्रकृति वाले थे और परमेश्वर की प्राप्ति के लिए काफी परेशान थे। एक दिन वह श्री रामकृष्ण (दक्षिणेश्वर काली मंदिर के पुजारी) से मिले, तब उनके अंदर श्री रामकृष्ण के आध्यात्मिक प्रभाव के कारण बदलाव आया। श्री रामकृष्ण को अपना आध्यात्मिक गुरु मानने के बाद वह स्वामी विवेकानंद कहे जाने लगे।

अपने गुरु की मौत के बाद उन्होंने 1893 में विश्व धर्म संसद शिकागो में भाग लिया, जहाँ उन्हें कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्हें न्यूयार्क के एक अखबार ने धर्म संसद में, सबसे महान व्यक्ति के रुप में स्थान दिया। स्वामी विवेकानंद महान देशभक्त थे और पूरे देश में सबसे महान आध्यात्मिक हस्ती थे, जिन्होंने भारत को गरीबी से मुक्त करने का प्रयास किया था। उन्होंने 1 मई 1897 को, रामकृष्ण मिशन के नाम से एक संगठन की स्थापना की, जो व्यावहारिक वेदांत और सामाजिक सेवाओं के विभिन्न प्रकार के प्रचार में शामिल है। उनकी मृत्यु 39 की अवस्था में जून 1902 को हुई।

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