Rani Rudrama Devi in Hindi

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रुद्रमादेवी का जन्म 1259 चन्दुपटला में हुआ था । वह वारंगल की रानी थी और उनके वंश का नाम काकतीय वंश था। उनके पिता का नाम गणपति देव था, जो राज्य के राजा थे। क्योंकि रुद्रमादेवी का कोई भाई नहीं था, उन्हें 1261-12 से अपने पिता के साथ राज्य संभालना पड़ा था। कुछ समय बाद उनके पिता का निधन हो गया और 1263 वर्ष के बाद से, उन्हें पूरी तरह से राज्य पर शासन करना पड़ा।

उन्होंने 14वर्ष से ही शासन किया और फिर उन्होंने पूर्वी चालुक्य के राजकुमार राजा वीरभद्र से विवाह किया।शादी के बाद उन्हें दो बेटियाँ हुई।उन्होंने 1259 से लेकर 1289 तक शासन किया। 1289 में रुद्रमा देवी अंबादेव से लड़ते हुए घायल हुई और उनकी मृत्यु हो गई।जबकि कुछ सूत्रों से पता चला है की रानी 1295 तक जीवित थी रही थी।

उन्होंने अपने युद्ध के लिए कम वर्ग के योद्धाओं को परिपूर्ण किया और योद्धाओ के रूप में चुना जिसके बदले उन्होंने योद्धाओं को भूमि कर राजस्व के अधिकार प्रदान किया।

फिर उन्होंने उत्तराधिकारी और बाद में विजयनगर साम्राज्य अपनाया।

रानी रुद्रमादेवी कौन थी ?

रुद्र्मा देवी काकतीय वंश से आती थी और वहां की वे एक महिला शासक थीं। भारत देश के इतिहास को देख जाए तो महिला शासकों की सूची में उनका भी एक नाम आता है। रानी रुद्रमा देवी sirf 14 साल की थी जब उन्होने राज्य का भार अपने कंधो पर ले लिया था, ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उनके पिता का देहांत हो गया था| उन्होंने पूर्वी गंग राजवंश से विभिन्न प्रकार की कठिनाइयों का सामना किया और उनको पराजित भी किया।

1270 में उन्होंने यादवो से संघर्ष किया लेकिन असफल हुई।

वह 1273 में राज्य प्रमुख बने जाने के बाद केस्थ मुखिया अंबेडेव से भी संघर्ष किया और असफल रही। अंबादेव ने काकतियों के दक्षिण-पूर्वी आंध्र के बहुत से हिस्से पर अपना नियंत्रण कर लिया ।

उन्हें वारंगल किले का पूर्ण निर्माण करना ,तेलंगाना में सिंचाई टैंक प्रणाली शुरू करना ,अस्पतालों का निर्माण करना और सैनिकों के लिए प्रशिक्षणशिव तांडवम (Perini Shiva Tandavam) नृत्य कला निर्मित करना आदि को शुरू करवाया।

रुद्रमादेवी की कहानी

रुद्रमादेवी का वैवाहिक जीवन

उन्होंने पूर्वी चालुक्य के राजकुमार राजा वीरभद्र से विवाह किया ।उन्होंने अपना रूप एक लड़के के सामान बनाया और उन्होंने युद्ध से सम्बंधित सभी चीज़ो को सीखा, राज्य के प्रशासन के लिए कई प्रकार के पहलुओं को सीखा,क्योकि हर के राजा इस प्रकार के प्रशिक्षण लेकर अपने आप को परिपूर्ण करता है।

काकतीय साम्राज्य पर आक्रमण-

यादव राजा महादेव ने काकतीय राज्य पर1268-70 में हमला किया। सन 1280 में रुद्रमादेवी के पोते को युवराज घोषित किया। पंजियों, यादवों और होसैलों ने एकजुट होकर सन 1285 में काकतीय साम्राज्य पर कब्जा करने की कोशिश की, परन्तु युवराज ने प्रतापरुदादेव, को सफलता पूर्वक उसका हल निकाल लिया था |

रुद्रमादेवी की मूर्ति का स्पष्टीकरण

  • पहले शिलालेख में रानी रुद्रमा देवी का शाही व्यक्तित्व साफ़ देखा जा सकता है |
  • उसमे घोड़े पर रानी सवार है और उनके दाहिने हाथ में तलवार पकड़ा है और बायीं तरफ तलवार लटकी हुई है।
  • उनके एक राजसी प्रतीक को भी चिन्हित(Marked) किया गया है
  • उन्होंने पुरुष जैसे योद्धा के कपडे पहने हुए हैं
  • घोड़े के शरीर के आसपास एक पट्टा(Lease) बँधा हुआ है।
  • दूसरे शिलालेख में थकी हुई देवी को बनाया गया है।
  • उसके दाएँ हाथ में तलवार है और उसके बाएँ हाथ में लगाम है। लेकिन आश्चर्य की बात है कि इस स्थिति में भी घोड़े खड़े हुए हैं।
  • दूसरे शिलालेख में चिन्हित(Marked) नहीं है ,क्योकि उस वक़्त रानी की पराजय हो गई थी।

काकतीय वंश के शासक

  • यर्रय्या या बेतराज प्रथम (इ.स. 1000 से 1050)
  • प्रोलराज प्रथम (इ.स. 1050 से 1080)
  • बेतराज द्वितीय (इ.स. 1080 से 1115 )
  • प्रोलराज द्वितीय (इ.स. 1115 से 1158)
  • रुद्रदेव या प्रतापरुद्र प्रथम (इ.स. 1158 से 1197)
  • महादेव (इ.स. 1197)
  • गणपति (इ.स. 1198 से 1261)
  • रुद्रम्मा (इ.स. 1261 से 1296)
  • प्रतापरुद्र द्वितीय (इ.स. 1296 to 1326)

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