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World Disability Day Essay 2018 – World Handicapped Day Essay in Hindi & English Pdf Download

World Disability Day 2018: अगर देखा जाए तो विश्व विकलांग दिवस अपने आप में एक अनोखा दिन है | हर साल 3 दिसंबर को विश्व विकलांग दिवस मनाया जाता है | यह दिन संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1992 में विकलांगजनो के लिए बराबरी,रोकथाम ,प्रचार के विषयों पर ध्यान देने के लिए मनाया जाता है | यह दिन उनके अधिकारों के बारे में लोगों को जागरूक करने व उन्हें समाज में समान रूप से देखे जाने के लिए और उनकी आर्थिक और समाजिक स्थिति पर गौर देने के लिए मनाया जाता है | इस दिन को मानाने का मुख्य उद्देश्य विकलांग व्यक्तियों के जीवन के पहलुओं पर ध्यान देने और उन्हें सुधारने का है |

Essay on international day of disabled persons

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विश्व दिव्यांग दिवस 1992 से संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा निशक्त जनों को प्रोत्साहन देने के लिए शुरू किया गया है | इस दिवस से लोग निशक्त लोगो से मिलकर उनके साथ अपना सुख दुःख बाँटते है | World Disability Day दिव्यांग दिवस को न केवल मानसिक रोगियों या शारीरिक विकलांग व्यक्तियों के लिए प्रोत्साहन दिवस है बल्कि ये असाध्य रोगों से पीड़ित रोगियों को भी प्रोत्साहित करने का अवसर है |

नि:शक्त या विकलांग से दिव्यांग तक

अंग्रेजी में नि:शक्त या विकलांग शब्द की व्याख्या की शुरुवात “Handicapped या Disabled” के रूप में की जाती है | आगे चलकर 1980 के दशक में इस परिदृश्य में सकारात्मक बदलाव लाने का प्रयास किया गया | अमेरिका के Democratic National Committee ने विकलांगो के लिए Handicapped की जगह Differently Abled शब्द के इस्तेमाल पर जोर दिया , जो अपने पूर्ववती शब्द Handicapped या Disabled” की तुलना में ज्यादा स्वीकार्य हुआ | नि:शक्तजनों की भावना को समझते हुए उन्हें एक सौम्य और करुणामयी शब्द से नवाजकर इस समिति ने भी अतिरिक्त योग्यता का प्रमाण प्रस्तुत किया |

वर्तमान में भारतीय परिदृश्य पर विचार करे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेडियो पर प्रसारित होने वाले “मन की बात” कार्यक्रम में विकलांगो या नि:शक्तो के लिए “दिव्यांग” शब्द का प्रयोग किये जाने की बात कही | यह शब्द जनमाध्यमो में भी दिखाई सुनाई देने लगा है ऐसे में आमजनों में भी इस शब्द का प्रचलन बढने लगा है तथ जनमानस के बीच इस शब्द की स्वीकार्यता स्थापित होने लगी है | नि:शक्तो और विकलांगो को दिव्यांग कहकर सम्बोधित करना एक विशिष्ट प्रकार का विचार है | दिव्यांग शरीर वाले लोग कुछ मायने में भले शारीरिक तौर पर कमजोर होते है लेकिन ज्ञान ,मेधा और तार्किक शक्ति के लिहाज से अन्य व्यक्तियों से कम नही आंके जा सकते है |

दिव्यांगता और कानून

भारत का सविधान अपने सभी नागरिको के लिए समानता ,स्वतंत्रता ,न्याय एवं गरिमा सुनिश्चित करता है | हाल के वर्षो में विकलांगो के प्रति समाज का नजरिया तेजी से बदला है | यह माना जाता है कि यदि दिव्यांग व्यक्तियों को समान अवसर तथा प्रभावी पुनर्वास की सुविधा मिले तो वे बेहतर गुणवत्तापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते है | दिव्यांगो की बढती योग्यता की पहचान की जा रही है और उन्हें समाज की मुख्य धारा में शामिल किये जाने पर बल दिया जा रहा है | भारत सरकार ने विकलांगो या निशक्तजनों के लिए निम्नलिखित कानूनों को लागू किया है |

  • दिव्यांग व्यक्ति (समान अवसर ,अधिकार सुरक्षा और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम 1995 , जो ऐसे लोगो को शिक्षा ,रोजगार , अवरोधमुक्त वातावरण का निर्माण ,सामजिक सुरक्षा इत्यादि प्रदान करना है |
  • स्वलीनता (Austism) , प्रमस्तिस्क पक्षाघात (cerebral palsy) ,मानसिक मंदबुद्धि एवं बहुविकलांगता के लिए राष्ट्रीय कल्याण अधिनियम 1999 के चारो वर्गो के कानूनी सुरक्षा तथा उनके स्वतंत्र जीवन हेतु सहज रूप से सम्भवत वातावरण निर्माण का प्रावधान है |
  • भारतीय पुनर्वास अधिनियम 1992 पुनर्वास सेवाओ के लिए मानव बल विकास का प्रयास करना है |

संस्थागत प्रयासों की उम्मीद

वर्तमान में कई संस्थाए शारीरिक और मानसिक रूप से निशक्तो या दिव्यांगो के लिए प्रशिक्षण केंद्र , विद्यालय , सामूहिक आवास आदि कुशलता से चला रही है | इसके साथ ही अंतर्राष्ट्रीय संस्थाए भी ऐसे व्यक्तियों के लिए काम करने वाली संस्थाओ को आर्थिक मदद देकर महत्चपूर्ण भूमिका अदा कर रही है | अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में सयुंक्त राष्ट्र संघ द्वारा चलाई जा रही संस्थाए भी है जो इस दिशा में व्यवस्थित रूप से कायक्रमो का संचालन कर रही है |

World Handicapped Day Essay

सयुंक्त राष्ट्र संघ ने इस मान्यता पर बल देने में प्रमुख भूमिका अदा की है कि निशक्तो के लिए चलाए जा रहे कार्यक्रमों में उनकी खुद की भागीदारी मुख्य रूप से होनी चाहिए | इससे न केवल बेहतर काम होगा बल्कि काम करते हुए निशक्त व्यक्तियों को देखकर अन्य नि:शक्तो का भी हौसला बढ़ेगा | यदि इस सिद्धांत पर वास्तविक तौर पर अमल हर देश में होने लगे तो विकलांगो की समस्याए काफी हद तक हल हो सकती है |

निष्कर्ष

केवल नया शब्द गढ़ देने मात्र से मानवीय सोच एवं संवेदनाओ में त्वरित और विशेष तरह का परिवर्तन आ जाएगा ,ऐसा सोचना जल्दबाजी होगी | आज भी निशक्तजनों और दिव्यांगो को वैसा उचित सम्मान नही मिला पाता जिसके वे हकदार है | निशक्त व्यक्तियों को इसके लिए संघठित होकर अपनी शक्ति को पहचानते हुए आगे बढना होगा | साथ ही जरूरत है निशक्त या विकलांग व्यक्तियों के भीतर छुपी किसी भी अतिरिक्त प्रतिभा या गुण को पहचान कर उनके अंदर उपयुक्त कौशल का विकास किया जाए तब जाकर सही मायने में उन्हें बेहतर जीवन हासिल हो पायेगा |

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प्रत्येक वर्ष 3 दिसंबर को संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा विश्व विकलांग दिवस या विकलांग व्यक्तियों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाया जाता है. 1992 के बाद से विश्व विकलांग दिवस विकलांग व्यक्तियों के प्रति करुणा और विकलांगता के मुद्दों की स्वीकृति को बढ़ावा देने और उन्हें आत्म-सम्मान, अधिकार और विकलांग व्यक्तियों के बेहतर जीवन के लिए समर्थन प्रदान करने के लिए एक उद्देश्य के साथ मनाया जा रहा है. इसके पीछे मनाने का मूल उद्देश्य यह भी है कि, विकलांग व्यक्तियों की जागरूकता, राजनीतिक, वित्तीय और सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के हर पहलू में विकलांग व्यक्तियों को लिया जाना शामिल है. इस दिन प्रत्येक वर्ष कुल मिलाकर एक खास मुद्दे पर ध्यान दिया जाता है |

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 1981 को विकलांग व्यक्तियों के लिए अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में अधिसूचित किया गया है. इस अवसर पर विकलांग व्यक्तियों के पुनर्वास और विकलांगता की रोकथाम के समीकरण पर ध्यान देने के साथ-साथ राष्ट्रीय घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कार्यवाही की एक योजना के निर्माण में वृद्धि करने पर भी सहमती हुई है. विश्व विकलांग दिवस के मुख्य विषय के रूप में विकलांग व्यक्तियों के सक्रिय, और समाज के जीवन और विकास में पूरी तरह से भाग लेने के लिए और उन्हें अन्य नागरिकों के बराबर पूरा अधिकार देने के लिए साथ ही मनुष्य के अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है जोकि “पूर्ण भागीदारी और समानता,” और सामाजिक-आर्थिक विकास के विकास से उत्पन्न लाभ में बराबर का हिस्सा आदि से सम्बंधित है |

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1983-1992 को विकलांग व्यक्तियों के लिए संयुक्त राष्ट्र के दशक के रूप में घोषित किया था. ताकि विश्व की प्रत्येक सरकारों और देशों के द्वारा इस संदर्भ में काफी गहराई से ध्यान दिया जा सके. और उनके लाभ से जुड़े अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से उसनके विकास को बढ़ावा दिया जा सके |

यूनाइटेड किंगडम सरकार ने वर्ष 2012 में विकलांग व्यक्तियों के लिए अनिवार्य काम की घोषणा की जोकि सामाजिक सुधार कार्यक्रमों का लाभ उठा रहे हों और उन्हें किसी न किसी माध्यम से सुधार एवं कल्याण का लाभ मिला है |

सुसान आर्चीबाल्ड केंद्र के संस्थापक के अनुसार, विकलांग लोगों के लिए अनिवार्य रोजगार की निति विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के सन्दर्भ में संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन के अनुच्छेद 27/2 का उल्लंघन है |

विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन

यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र संघ की एक मान्यता प्राप्त मानव अधिकार संधि है. जिसके अंतर्गत विकलांग व्यक्तियों के आत्म-सम्मान और अधिकार की रक्षा करने के उद्देश्य समाहित हैं. इस कन्वेंशन के तहत विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों को बढ़ावा देने, रक्षा, और मानव अधिकारों द्वारा सुनिश्चित करने और उन्हें जीवन का पूरा आनंद लेने में मदद करता है और कानून के तहत पूर्ण समानता का आनंद लेने के लिए सक्षम बनाता है. इस कन्वेंशन के बाद से मानव अधिकारों के साथ समाज के पूर्ण और संपूर्ण सदस्यों के रूप में उन्हें (विकलांग) देख-रेख की दिशा में दान, चिकित्सा उपचार और सामाजिक सुरक्षा की वस्तुओं के रूप में विकलांग व्यक्तियों को देखने के सन्दर्भ में वैश्विक आंदोलन में तेजी आई है. यह कन्वेंशन इस दुनिया में मानव अधिकार से जुदा पहला संधि था, और इसके अंतर्गत विकलांग व्यक्तियों के सतत और सौहार्दपूर्ण विकास पर पूरा ध्यान दिया गया है |

13 दिसंबर, 2006 के दौरान, संयुक्त राष्ट्र महासभा नें कुछ तथ्यों की स्थापना की थी जिस पर 30 मार्च, 2007 को हस्ताक्षर किया गया था. यह नियम 3 मई 2008 को लागू किया गया था. इस नियम में 159 हस्ताक्षरकर्ता और 151 दलों शामिल हैं. साथ ही इसमें यूरोपीय संघ (ईयू) भी शामिल है. इस कन्वेंशन पर विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों पर बनी समिति द्वारा नजर रखी जाती है |

विकलांगता भेदभाव अधिनियम

विकलांगता भेदभाव अधिनियम 1995 (डीडीए) यूनाइटेड किंगडम की संसद के द्वारा पारित एक अधिनियम है. लेकिन वर्तमान में इसे समानता अधिनियम 2010 के द्वारा बदल दिया गया है. यह अधिनियम उत्तरी आयरलैंड में छोड़कर विकलांग व्यक्तियों के संबंध में लोगों के खिलाफ भेदभाव को समाप्त करने के सन्दर्भ में एक अधिनियम है और रोजगार, वस्तुओं और सेवाओं, शिक्षा और अन्य सामाजिक गतिविधियों के प्रावधान और भेदभाव को समाप्त करने के सन्दर्भ में अपनी महत्ता रखता है |

World Disability Day Essay

हर साल 3 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकलांग व्यक्तियों का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाने की शुरुआत हुई थी और 1992 से संयुक्त राष्ट्र के द्वारा इसे अंतरराष्ट्रीय रीति-रिवीज़ के रुप में प्रचारित किया जा रहा है। विकलांगों के प्रति सामाजिक कलंक को मिटाने और उनके जीवन के तौर-तरीकों को और बेहतर बनाने के लिये उनके वास्तविक जीवन में बहुत सारी सहायता को लागू करने के द्वारा तथा उनको बढ़ावा देने के लिये साथ ही विकलांग लोगों के बारे में जागरुकता को बढ़ावा देने के लिये इसे सालाना मनाने के लिये इस दिन को खास महत्व दिया जाता है। 1992 से, इसे पूरी दुनिया में ढ़ेर सारी सफलता के साथ इस वर्ष तक हर साल से लगातार मनाया जा रहा है।

समाज में उनके आत्मसम्मान, सेहत और अधिकारों को सुधारने के लिये और उनकी सहायता के लिये एक साथ होने के साथ ही लोगों की विकलांगता के मुद्दे की ओर पूरे विश्वभर की समझ को सुधारने के लिये इस दिन के उत्सव का उद्देश्य बहुत बड़ा है। जीवन के हरेक पहलू में समाज में सभी विकलांग लोगों को शामिल करने के लिये भी इसे देखा जाता है जैसे राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक। इसी वजह से इसे “विश्व विकलांग दिवस” के शीर्षक के द्वारा मनाया जाता है। विश्व विकलांग दिवस का उत्सव हर साल पूरे विश्वभर में विकलांग लोगों के अलग-अलग मुद्दों पर ध्यान केन्द्रित करता है।

विश्व विकलांग दिवस का इतिहास

वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा के द्वारा “विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष” के रुप में वर्ष 1981 को घोषित किया गया था। अंतरराष्ट्रीय, राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर विकलांगजनों के लिये पुनरुद्धार, रोकथाम, प्रचार और बराबरी के मौकों पर जोर देने के लिये योजना बनायी गयी थी।

समाज में उनकी बराबरी के विकास के लिये विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिये, सामान्य नागरिकों की तरह ही उनके सेहत पर भी ध्यान देने के लिये और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिये “पूर्ण सहभागिता और समानता” का थीम विकलांग व्यक्तियों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष के उत्सव के लिये निर्धारित किया गया था।

सरकारी और दूसरे संगठनों के लिये निर्धारित समय-सीमा प्रस्ताव के लिये संयुक्त राष्ट्र आम सभा के द्वारा “विकलांग व्यक्तियों के संयुक्त राष्ट्र दशक” के रुप में वर्ष 1983 से 1992 को घोषित किया गया था जिससे वो सभी अनुशंसित क्रियाकलापों को ठीक ढंग से लागू कर सकें |

विश्व विकलांग दिवस कैसे मनाया जाता है?

उनकी सहायता और नैतिकता को बढ़ाने के लिये साथ ही साथ विकलांगजनों के लिये बराबरी के अधिकारों को सक्रियता से प्रसारित करने के लिये उत्सव के लिये पूरी दुनिया से लोग उत्साहपूर्वक योगदान देते हैं। कला प्रदर्शनी के आयोजन के द्वारा इस महान उत्सव को मनाया जाता है जो उनकी क्षमताओं को दिखाने के लिये विकलांग लोगों के द्वारा बनायी गयी कलाकृतियों को बढ़ावा देता है। समाज में विकलांगजनों की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में जागरुकता को बढ़ाने के साथ ही विकलांग लोगों की कठिनाईयों की ओर लोगों का ध्यान खींचने के लिये विरोध क्रियाओं में सामान्य लोग भी शामिल होते हैं।

विश्व विकलांग दिवस को मनाने का लक्ष्य

  • इस उत्सव को मनाने का महत्वपूर्ण लक्ष्य विकलांगजनों के अक्षमता के मुद्दे की ओर लोगों की जागरुकता और समझ को बढ़ाना है।
  • समाज में उनके आत्म-सम्मान, लोक-कल्याण और सुरक्षा की प्राप्ति के लिये विकलांगजनों की सहायता करना।
  • जीवन के सभी पहलुओं में विकलांगजनों के सभी मुद्दे को बताना।
  • इस बात का विश्लेषण करें कि सरकारी संगठन द्वारा सभी नियम और नियामकों का सही से पालन हो रहा है य नहीं।
  • समाज में उनकी भूमिका को बढ़ावा देना और गरीबी घटाना, बराबरी का मौका प्रदान कराना, उचित पुनर्सुधार के साथ उन्हें सहायता देना।
  • उनके स्वास्थ्य, सेहत, शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा पर ध्यान केन्द्रित करना।

विश्व विकलांग दिवस को मनाना क्यों आवश्यक है

ज्यादातर लोग ये भी नहीं जानते कि उनके घर के आस-पास समाज में कितने लोग विकलांग हैं। समाज में उन्हें बराबर का अधिकार मिल रहा है कि नहीं। अच्छी सेहत और सम्मान पाने के लिये तथा जीवन में आगे बढ़ने के लिये उन्हें सामान्य लोगों से कुछ सहायता की ज़रुरत है, । लेकिन, आमतौर पर समाज में लोग उनकी सभी ज़रुरतों को नहीं जानते हैं। आँकड़ों के अनुसार, ऐसा पाया गया है कि, लगभग पूरी दुनिया के 15% लोग विकलांग हैं।

इसलिये, विकलांगजनों की वास्तविक स्थिति के बारे में लोगों को जागरुक करने के लिये इस उत्सव को मनाना बहुत आवश्यक है। विकलांगजन “विश्व की सबसे बड़ी अल्पसंख्यकों” के तहत आते हैं और उनके लिये उचित संसाधनों और अधिकारों की कमी के कारण जीवन के सभी पहलुओं में ढ़ेर सारी बाधाओं का सामना करते हैं।

World Disability Day Essay in Hindi

विकलांग शरीर प्रकृति या ईश्वर का अभिशाप है, पृथ्वी पर भार है, समाज को चुनौती है, परिवार पर बोझ है। विकलांग व्यक्ति वह होता है जिसके शरीर का कोई अंग या तो जन्म से ही नहीं होता है जैसे किसी के दो की बजाये एक गुर्दा हो या उसका अंग स्वस्थ न होकर दोषपूर्ण हो जैसे अंधों, गूंगे-बहरों, कोढियों, लूले-लंगड़ों को विकलांग कहा जाता है। कुछ विकलांग ऐसे भी होते हैं जिनके शरीर के काम करनेवाले अंग तो सामान्य और स्वस्थ होते हैं, सुचारू ढंग से काम करते हैं परन्तु उनमें मानसिक विकृति होती है, उनका बौद्धिक विकाश अधुरा रहता है; वे पूरी तरह पागल तो नहीं होते पर अर्ध विक्षिप्त होने के कारण सामान्य-स्वस्थ व्यक्तियों की तरह काम नहीं क्र पाते। कुछ बच्चे टेढ़े अंगवाले होते हैं अत: वे उठने-बैठने में असमर्थ होते हैं। कुछ बच्चों के शरीरांग पशु-पक्षियों जैसे होते हैं। इन्हें प्रकृति का क्रूर उपहास कहा जाता है।

विकलांगों का दूसरा वर्ग वह है जिसमें व्यक्ति जन्म से तो स्वस्थ होता है, उसके शरीर में सब अंग सामान्य व्यक्तियों के समान होते हैं पर किसी दुर्घटना के करण वे अपंग हो जाते हैं – किसी की टांग रेल के पहिये के निचे आ जाती है और उसे टांग काटना पड़ता है, किसी का हाथ चारा काटने की मशीन में आ जाता है, किसी की आँख में तेजाब पड़ जाने से वह अन्धा हो जाता है।

विकलांगता का तीसरा कारण है हमारे अंधविश्वास। चेचक निकलने पर उसे माता का प्रकोप मानकर समुचित इलाज नहीं कराया जाता और उसकी आँखें चली जाती हैं। विकलांग व्यक्ति शारीरिक और मानसिक कष्ट भोगता है। अंधा बालक या मनुष्य कमरे की चारदिवारी में अकेला पड़ा रहने को विवश है, कोई काम-काज नहीं, मनोरंजन का साधन नहीं, अपने माता-पिता, भाई-बहन की सूरत तक देखने को तरस जाता है। उसके पास बुद्धि तो है, शरीर के अन्य अवयव भी पुष्ट हैं पर नेत्रों में ज्योति न होने के कारण वह कुछ भी नहीं कर सकता। गूंगा बोल न पाने के कारण, बहरा सुन न पाने के कारण कैसा अनुभव करता होगा, उसे कितनी पीड़ा, कुंठा होती होगी, इसकी कल्पना आप भली-भाँति क्र सकते हैं। फिर यदि परिवार के अन्य सदस्य उसे भर समझ कर उसके प्रति दुर्व्यवहार करें, उसकी उपेक्षा करें, समाज उसे बोझ समझ कर उसका तिरस्कार करे, नासमझ कठोर हृदयवाले व्यक्ति उससे घृणा करें, उसका मजाक उड़ायें, उसको गलियाँ डे तो उसका जीवन नरकतुल्य हो जाता है।

प्राचीन काल में विकलांगता को ईश्वर का कोप या प्रकृति का उपहास समझ क्र उसके प्रति दया का भाव अपनाया जाता था। उसकी स्थिति वैसी ही थी जैसी तुलसी ने विनयपत्रिका के एक पद में भगवान के सामने भक्त की बताई है -तू दयालु दीन हौं तू दानी हौं भिखारी। वह करुणा, दया, सुहानुभूति का पात्र समझा जाता था और उसके साथ वही व्यवहार किया जाता था जो कोई उदार दानी भिखारी के साथ करता था। समाज के ऐसे व्यवहार से वह जीता तो था, परन्तु भावुक, संवेदनशील मन को कितना आघात लगता होगा, इसकी कल्पना आज के मनोविज्ञान के युग में सहज ही की जा सकती है।

आज के युग में व्यक्ति में अस्मिता का, आत्म-सम्मान का भाव जाग उठा है। वह किसी की दया, कृपा, करुणा का पात्र, दीनहीन न समझकर उन्हें अपना मित्र, सहयोगी समझ कर उनकी सहायता करनी चाहिए, उन्हें आत्म-निर्भर बनने का अवसर प्रदान करना चाहिए। अतः हमारा कर्त्तव्य कि हम उनके आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए उनके साथ सहृदयता, सहानुभूति और सहयोग का आचरण करें, उनके पुनर्वास के लिए हर-सम्भव उपाय करें। यह कार्य व्यक्ति, समाजसेवी संस्थाएँ और प्रशासन तीनों क्र सकते हैं।

पहला कर्त्तव्य है विकलांगता को रोकने का। आज चिकित्साशास्त्र ने पंगु बनानेवाले रोगों को जड़ से मिटने के लिए टीकों का निर्माण क्र लिया है। अंग्रेजी में कहावत है – ‘Prevention is better than cure‘ अर्थात् बचाव में ही सुरक्षा है। पोलियो, चेचक, खसरा, हैपेटाईटिस आदि रोगों के टिके समय रहते बचपन में ही लगवा दिये जाएँ तो इन रोगों से बचा जा सकता है।

अब रही उनकी समस्या जो विकलांग हैं। विकलांगों को प्रशिक्षण देकर, उन्हें आत्म-निर्भर और कुंठा-रहित किया जा सकता है। अन्धों को प्रशिक्षण देकर उन्हें कुर्सी बुनने, मशीनें चलाने, टाइप करने आदि के काम में लगाया जा सकता है। गूंगों-बहरों को चित्रकला, मूर्तिकला की शिक्षा दी जा सकती है। इसी प्रकार अन्य विकलांगों को भी उनकी शारीरिक क्षमता देखकर कुछ कार्यों में, दस्तकारी के कामों में लगाया जा सकता है। अतः विकलांगों के लिए विकलांग प्रशिक्षण-केन्द्र, विकलांग पुनर्वास केन्द्र खोलने चाहिएँ। दुसरे, अर्धसरकारी नौकरियों में विकलांगों के लिए आरक्षण होना चाहिए। मैंने नेत्र विहीन प्रतिभाशाली छात्रों को सफल अध्यापक के रूप में कार्य करते हुए देखा है। अतः विकलांगता को ऐसी बाधा, ऐसा रोग न समझना चाहिए जो असाध्य हो और जिसका कोई इलाज ही नहीं है। वह असाध्य रोग नहीं है।

विकलांग के प्रति हमारे कर्त्तव्य हैं –

  • जिस परिवार में विकलांग ने जन्म लिया है या किसी रोग अथवा दुर्घटना के कारण वह विकलांग हो गया है, उस परिवार के सदस्य उसे परिवार के ऊपर न तो बोझ समझें और न यह कहें कि हे ईश्वर, तू इसे धरती से उठा ले।
  • समाज का कर्त्तव्य है कि वह विकलांगों को तिरस्कार, घृणा की दृष्टि से न देखे, उसके प्रति सहृदयता, सुहानुभूति का व्यवहार करे।
  • हमें चाहिए कि हम विकलांग की भावनाओं को भी समझें और उसके आत्म-सम्मान के भाव को ठेस न लगने दें, उसके साथ मित्रता, सहयोग का आचरण करें ताकि वह हीन-भावना से ग्रस्त न हो।
  • समाजसेवी संस्थाओं और सरकार को विकलांगों के प्रशिक्षण के लिए विकलांग प्रशिक्षण-केन्द्र तथा उनके पुनर्वास के लिए विकलांग पुनर्वास-केन्द स्थापित करने चाहिएँ। ये उपाय अपनाकर हम विकलांगों के शारीरिक-मानसिक कष्टों को तो दूर कर ही सकेंगे, उन्हें कार्य करने का अवसर देकर समाज और देश के विकास में भी योगदान कर सकेंगे।

World Disability Day Essay in English

International day of disabled persons 2018 would fall at Monday, on 3rd of December.
The United Nations Staff Union, the Department of General Assembly and Conference Management, Office of Human Resources Management and Office of Central Support Services will be jointly celebrating a series of events in the UN headquarters on the 03rd December. Various seminars, conferences, workshops and presentations are to be organised to commemorate the day. Various social and nonprofit organizations will be organizing various campaigns and events. Two of the NGOs in Mumbai have joined hands to celebrate the day with an event named ‘STRIDE-2018 – Walk with Dignity’ where person with disabilities will showcase their talents on the stage. They will also get a chance to walk with professional models on the ramp.

The International Day of Disabled Persons 2018 Theme is “Empowering persons with disabilities and ensuring inclusiveness and equality”. This theme aims to empower individuals with disabilities so that they can get a sustainable and equitable development. The Secretary General of the United Nations will launch the first ever report on disability and development this year which will help the sustainable global agenda for the persons with disability.

HISTORY OF THE INTERNATIONAL DAY OF DISABLED PERSONS

The year 1981 was announced as the “International Year of Disabled Persons” by the United Nations General Assembly in the year 1976. It was planned to emphasize the rehabilitation, prevention, promotion and equalization of opportunities for the persons with disabilities at the international, regional and national levels.

The theme decided for the celebration of international year of disabled persons was “full participation and equality”, to aware the people about the rights of disabled persons for their equal development in the societies, to emphasize the well being living for them as equal to normal citizens, and to improve their socio-economic condition.

The years from 1983-1992 was declared as the “United Nations Decade of Disabled Persons” by the United Nations General Assembly in order to offer the time frame to the Governments and other organizations so that they could properly implement all the recommended activities.

HOW IT IS CELEBRATED

People from all around the world enthusiastically contribute to the celebration to actively promote the equal rights for disabled persons as well as to support and enhance their morality. This great event is celebrated by organizing the art exhibitions which promotes the artworks made by disabled people to show their abilities. People also involve in the protest activities in order to draw the people attention towards the difficulties of disabled people as well as increase the awareness about the precious roles of disabled people in the society.

AIM OF CELEBRATING THE INTERNATIONAL DAY OF DISABLED PERSONS

> The crucial aim of celebrating this event is to increase the awareness and understanding of people towards the disability issues of disabled people.

> To support the disabled people to get their self-respect, rights, welfare and security in the society.

> To address all the issues of disabled person in all the aspects of life.

> To analyze whether the rules and regulations implemented by the government organizations are working and following well or not.

> To assist them with proper rehabilitation, offer equal opportunities, lessen poverty and encourage their role in the society.

> To focus on their health, well being, education and social dignity.

WHY IT IS NECESSARY TO CELEBRATE THE INTERNATIONAL DAY OF DISABLED PERSONS

Most of the people even do not known that how many people are disabled in the society around their houses. They are getting their equal rights like normal people in the society or not. They need some assistance by the normal people to rise in the life, to get dignity and life of well being. But, generally the people in the society never know all the needs of them. According to the record, it is found that approximately 15% of the total population of the world is disabled people.

So, it is very necessary to celebrate this event to get people aware about the real condition of the people with disabilities. People with the disabilities come under “the world’s largest minority” and faces a lot of obstructions in all the aspects of life because of the lack of proper resources and rights for them.

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