लाल बहादुर शास्त्री भाषण 2018 – Lal Bahadur Shastri Speech in Hindi, English & Marathi Pdf Download – 2 October Jayanti Special

Lal Bahadur Shastri Bhasan
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लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर 1904 को यू.पी. में हुआ था | लाल बहादुर शास्त्री भारत के दुसरे प्रधानमंत्री थे और इन्हे यह पद देश के प्रति इनकी निष्ठा और प्रतिभा को देखते हुए जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु उपरान्त दिया गया था | इन्होने अप्रत्याशित रूप से हुए भारत-पाक युद्ध में नेहरू के मुकाबले राष्ट्र को उत्तम नेतृत्व प्रदान किया और पाकिस्तान को करारी हार दिलवाई। इनका निधन 11 जनवरी 1966 को हुआ था | ये स्पीच कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए इन मराठी, हिंदी, इंग्लिश, बांग्ला, गुजराती, तमिल, तेलगु, आदि की जानकारी है जिसे आप अपने स्कूल के स्पीच प्रतियोगिता, कार्यक्रम या भाषण प्रतियोगिता में प्रयोग कर सकते है|

Lal Bahadur Shastri Speech in Hindi – Jai Jawan Jai Kisan

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लाल बहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को मुगलसराय, उत्तर प्रदेश में ‘मुंशी शारदा प्रसाद श्रीवास्तव’ के यहां हुआ था। इनके पिता प्राथमिक विद्यालय में शिक्षक थे। ऐसे में सब उन्हें ‘मुंशी जी’ ही कहते थे। बाद में उन्होंने राजस्व विभाग में क्लर्क की नौकरी कर ली थी। लालबहादुर की मां का नाम ‘रामदुलारी’ था। परिवार में सबसे छोटा होने के कारण बालक लालबहादुर को परिवार वाले प्यार से ‘नन्हे’ कहकर ही बुलाया करते थे। जब नन्हे अठारह महीने के हुए तब दुर्भाग्य से उनके पिता का निधन हो गया। उसकी मां रामदुलारी अपने पिता हजारीलाल के घर मिर्जापुर चली गईं। कुछ समय बाद उसके नाना भी नहीं रहे। बिना पिता के बालक नन्हे की परवरिश करने में उसके मौसा रघुनाथ प्रसाद ने उसकी मां का बहुत सहयोग किया। ननिहाल में रहते हुए उसने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद की शिक्षा हरिश्चन्द्र हाई स्कूल और काशी विद्यापीठ में हुई। काशी विद्यापीठ से शास्त्री की उपाधि मिलते ही शास्त्री जी ने अनपे नाम के साथ जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द श्रीवास्तव हमेशा के लिए हटा दिया और अपने नाम के आगे शास्त्री लगा लिया। इसके पश्चात ‘शास्त्री’ शब्द ‘लालबहादुर’ के नाम का पर्याय ही बन गया। बाद के दिनों में “मरो नहीं, मारो” का नारा लालबहादुर शास्त्री ने दिया जिसने एक क्रान्ति को पूरे देश में प्रचण्ड किया। उनका दिया हुआ एक और नारा ‘जय जवान-जय किसान’ तो आज भी लोगों की जुबान पर है।

Lal Bahadur Shastri Speech in Hindi

भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन के एक कार्यकर्ता लाल बहादुर थोड़े समय (1921) के लिए जेल गए। रिहा होने पर उन्होंने एक राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय काशी विद्यापीठ (वर्तमान में महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ) में अध्ययन किया और स्नातकोत्तर शास्त्री (शास्त्रों का विद्वान) की उपाधि पाई। संस्कृत भाषा में स्नातक स्तर तक की शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे भारत सेवक संघ से जुड़ गए और देशसेवा का व्रत लेते हुए यहीं से अपने राजनैतिक जीवन की शुरुआत की। शास्त्रीजी सच्चे गांधीवादी थे जिन्होंने अपना सारा जीवन सादगी से बिताया और उसे गरीबों की सेवा में लगाया। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों व आन्दोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही और उसके परिणामस्वरूप उन्हें कई बार जेलों में भी रहना पड़ा। स्वाधीनता संग्राम के जिन आन्दोलनों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही उनमें 1921 का असहयोग आंदोलन, 1930 का दांडी मार्च तथा 1942 का भारत छोड़ो आन्दोलन उल्लेखनीय हैं।

शास्त्रीजी के राजनीतिक दिग्दर्शकों में पुरुषोत्तमदास टंडन और पण्डित गोविंद बल्लभ पंत के अतिरिक्त जवाहरलाल नेहरू भी शामिल थे। सबसे पहले 1929 में इलाहाबाद आने के बाद उन्होंने टण्डनजी के साथ भारत सेवक संघ की इलाहाबाद इकाई के सचिव के रूप में काम करना शुरू किया। इलाहाबाद में रहते हुए ही नेहरूजी के साथ उनकी निकटता बढ़ी। इसके बाद तो शास्त्रीजी का कद निरंतर बढ़ता ही चला गया और एक के बाद एक सफलता की सीढियां चढ़ते हुए वह नेहरूजी के मंत्रिमंडल में गृहमंत्री के प्रमुख पद तक जा पहुंचे।

1961 में गृह मंत्री के प्रभावशाली पद पर नियुक्ति के बाद उन्हें एक कुशल मध्यस्थ के रूप में प्रतिष्ठा मिली। तीन साल बाद जवाहरलाल नेहरू के बीमार पड़ने पर उन्हें बिना किसी विभाग का मंत्री नियुक्त किया गया और नेहरू की मृत्यु के बाद जून 1964 में वह भारत के प्रधानमंत्री बने।उन्होंने अपने प्रथम संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि उनकी पहली प्राथमिकता खाद्यान्न मूल्यों को बढ़ने से रोकना है और वे ऐसा करने में सफल भी रहे। उनके क्रियाकलाप सैद्धांतिक न होकर पूरी तरह से व्यावहारिक और जनता की आवश्यकताओं के अनुरूप थी। निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो शास्त्रीजी का शासन काल बेहद कठिन रहा।

भारत की आर्थिक समस्याओं से प्रभावी ढंग से न निपट पाने के कारण शास्त्री जी की आलोचना भी हुई,लेकिन जम्मू-कश्मीर के विवादित प्रांत पर पड़ोसी पाकिस्तान के साथ 1965 में हुए युद्ध में उनके द्वारा दिखाई गई दृढ़ता के लिए उनकी बहुत प्रशंसा हुई।ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के साथ युद्ध न करने की ताशकंद घोषणा के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद उनकी मृत्यु हो गई। शास्त्रीजी को उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिए आज भी पूरा भारत श्रद्धापूर्वक याद करता है। उन्हें मरणोपरान्त वर्ष 1966 में भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया।

Lal Bahadur Shastri Speech in English

Shri Lal Bahadur Shastri was born on October 2, 1904 at Mughalsarai, a small railway town seven miles from Varanasi in Uttar Pradesh. His father was a school teacher who died when Lal Bahadur Shastri was only a year and half old. His mother, still in her twenties, took her three children to her father’s house and settled down there.

Lal Bahadur’s small town schooling was not remarkable in any way but he had a happy enough childhood despite the poverty that dogged him.

He was sent to live with an uncle in Varanasi so that he could go to high school. Nanhe, or ‘little one’ as he was called at home, walked many miles to school without shoes, even when the streets burned in the summer’s heat.

As he grew up, Lal Bahadur Shastri became more and more interested in the country’s struggle for freedom from foreign yoke. He was greatly impressed by Mahatma Gandhi’s denunciation of Indian Princes for their support of British rule in India. Lal Bahadur Sashtri was only eleven at the time, but the process that was end day to catapult him to the national stage had already begun in his mind.

Lal Bahadur Shastri was sixteen when Gandhiji called upon his countrymen to join the Non-Cooperation Movement. He decided at once to give up his studies in response to the Mahatma’s call. The decision shattered his mother’s hopes. The family could not dissuade him from what they thought was a disastrous course of action. But Lal Bahadur had made up his mind. All those who were close to him knew that he would never change his mind once it was made up, for behind his soft exterior was the firmness of a rock.

Lal Bahadur Shastri joined the Kashi Vidya Peeth in Varanasi, one of the many national institutions set up in defiance of the British rule. There, he came under the influence of the greatest intellectuals, and nationalists of the country. ‘Shastri’ was the bachelor’s degree awarded to him by the Vidya Peeth but has stuck in the minds of the people as part of his name.

In 1927, he got married. His wife, Lalita Devi, came from Mirzapur, near his home town. The wedding was traditional in all senses but one. A spinning wheel and a few yards of handspun cloth was all the dowry. The bridegroom would accept nothing more.

In 1930, Mahatma Gandhi marched to the sea beach at Dandi and broke the imperial salt law. The symbolic gesture set the whole country ablaze. Lal Bahadur Shastri threw himself into the struggle for freedom with feverish energy. He led many defiant campaigns and spent a total of seven years in British jails. It was in the fire of this struggle that his steel was tempered and he grew into maturity.

When the Congress came to power after Independence, the sterling worth of the apparently meek and unassuming Lal Bahadur Shastri had already been recognised by the leader of the national struggle. When the Congress Government was formed in 1946, this ‘little dynamo of a man’ was called upon to play a constructive role in the governance of the country. He was appointed Parliamentary Secretary in his home State of Uttar Pradesh and soon rose to the position of Home Minister. His capacity for hard work and his efficiency became a byeword in Uttar Pradesh. He moved to New Delhi in 1951 and held several portfolios in the Union Cabinet – Minister for Railways; Minister for Transport and Communications; Minister for Commerce and Industry; Home Minister; and during Nehru’s illness Minister without portfolio. He was growing in stature constantly. He resigned his post as Minister for Railways because he felt responsible for a railway accident in which many lives were lost. The unprecedented gesture was greatly appreciated by Parliament and the country. The then Prime Minister, Pt. Nehru, speaking in Parliament on the incident, extolled Lal Bahadur Shastri’s integrity and high ideals. He said he was accepting the resignation because it would set an example in constitutional propriety and not because Lal Bahadur Shastri was in any way responsible for what had happened. Replying to the long debate on the Railway accident, Lal Bahadur Shastri said; “Perhaps due to my being small in size and soft of tongue, people are apt to believe that I am not able to be very firm. Though not physically strong, I think I am internally not so weak.”

In between his Ministerial assignments, he continued to lavish his organizing abilities on the affairs of the Congress Party. The landslide successes of the Party in the General Elections of 1952, 1957 and 1962 were in a very large measure the result of his complete identification with the cause and his organisational genius.

More than thirty years of dedicated service were behind Lal Bahadur Shastri. In the course of this period, he came to be known as a man of great integrity and competence. Humble, tolerant, with great inner strength and resoluteness, he was a man of the people who understood their language. He was also a man of vision who led the country towards progress. Lal Bahadur Shastri was deeply influenced by the political teachings of Mahatma Gandhi. “Hard work is equal to prayer,” he once said, in accents profoundly reminiscent of his Master. In the direct tradition of Mahatma Gandhi, Lal Bahadur Shastri represented the best in Indian culture.

Lal Bahadur Shastri Jayanti Speech in Hindi

लाल बहादुर शास्त्री देश के सच्चे सपूत थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देशभक्ति के लिए समर्पित कर दिया । एक साधारण परिवार में जन्मे शास्त्री जी का जीवन गाँधी जी के असहयोग आंदोलन से शुरू हुआ और स्वतंत्र भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री के रूप में समाप्त हुआ । देश के लिए उनके समर्पण भाव को राष्ट्र कभी भुला नहीं सकेगा ।

शास्त्री जी का जन्म 2 अक्यूबर 1904 ई॰ को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय नामक शहर में हुआ था । उनके पिता स्कूल में अध्यापक थे । दुर्भाग्यवश बाल्यावस्था में ही उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया । उनकी शिक्षा-दीक्षा उनके दादा की देखरेख में हुई । परंतु वे अपनी शिक्षा भी अधिक समय तक जारी न रख सके ।

उस समय में गाँधी जी के नेतृत्व में आंदोलन चल रहे थे । चारों ओर भारत माता को आजाद कराने के प्रयास जारी थे । शास्त्री जी स्वयं को रोक न सके और आंदोलन में कूद पड़े । इसके पश्चात् उन्होंने गाँधीजी के असहयोग आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया । मात्र सोलह वर्ष की अवस्था में सन् 1920 ई॰ को उन्हें जेल भेज दिया गया ।

प्रदेश कांग्रेस के लिए भी उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता । 1935 ई॰ को राजनीति में उनके सक्रिय योगदान को देखते हुए उन्हें ‘उत्तर प्रदेश प्रोविंशियल कमेटी’ का प्रमुख सचिव चुना गया । इसके दो वर्ष पश्चात् अर्थात् 1937 ई॰ में प्रथम बार उन्होंने उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव लड़ा । स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् 1950 ई॰ तक वे उत्तर प्रदेश के गृहमंत्री के रूप में कार्य करते रहे ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् वे अनेक पदों पर रहते हुए सरकार के लिए कार्य करते रहे। 1952 ई॰ को वे राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए । इसके पश्चात् 1961 ई॰ में उन्होंने देश के गृहमंत्री का पद सँभाला । राजनीति में रहते हुए भी उन्होंने कभी अपने स्वयं या अपने परिवार के स्वार्थों के लिए पद का दुरुपयोग नहीं किया ।

निष्ठापूर्वक ईमानदारी के साथ अपने कर्तव्यों के निर्वाह को उन्होंने सदैव प्राथमिकता दी । लाल बहादुर शास्त्री सचमुच एक राजनेता न होकर एक जनसेवक थे जिन्होंने सादगीपूर्ण तरीके से और सच्चे मन से जनता के हित को सर्वोपरि समझते हुए निर्भीकतापूर्वक कार्य किया । वे जनता के लिए ही नहीं वरन् आज के राजनीतिज्ञों के लिए भी एक आदर्श हैं । यदि हम आज उनके आदर्शों पर चलने का प्रयास करें तो एक समृद्‌ध भारत का निर्माण संभव है ।

नेहरू जी के निधन के उपरांत उन्होंने देश के द्‌वितीय प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्र की बागडोर सँभाली । प्रधानमंत्री के रूप में अपने 18 महीने के कार्यकाल में उन्होंने देश को एक कुशल व स्वच्छ नेतृत्व प्रदान किया । सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार आदि को समाप्त करने के लिए उन्होंने कठोर कदम उठाए ।

उनके कार्यकाल के दौरान 1965 ई॰ को पाकिस्तान ने भारत पर अघोषित युद्‌ध थोप दिया । शास्त्री जी ने बड़ी ही दृढ़ इच्छाशक्ति से देश के युद्‌ध के लिए तैयार किया । उन्होंने सेना को दुश्मन से निपटने के लिए कोई भी उचित निर्णय लेने हेतु पूर्ण स्वतंत्रता दे दी थी । अपने नेता का पूर्ण समर्थन पाकर सैनिकों ने दुश्मन को करारी मात दी ।

ऐतिहासिक ताशकंद समझौता शास्त्री जी द्‌वारा ही किया गया परंतु दुर्भाग्यवश इस समझौते के पश्चात् ही उनका देहांत हो गया । देश उनकी राष्ट्र भावना तथा उनके राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव के लिए सदैव उनका ऋणी रहेगा । उनके बताए हुए आदर्शों पर चलकर ही भ्रष्टाचार रहित देश की हमारी कल्पना को साकार रूप दिया जा सकता है । ‘ सादा जीवन, उच्च विचार ‘ की धारणा से परिपूरित उनका जीवन-चरित्र सभी के लिए अनुकरणीय है ।

लाल बहादुर शास्त्री स्पीच

आज भारतीय राजनीति में फैले भ्रष्टाचार और उच्च संवैधानिक पदों के लिए नेताओं के बीच मची होड़ को देखकर यह विश्वास नहीं होता कि देश ने कभी किसी ऐसे महापुरुष को भी देखा होगा, जिसने अपनी जीत की पूर्ण सम्भावना के बाद भी यह कहा हो कि- “यदि एक व्यक्ति भी मेरे विरोध में हुआ, तो उस स्थिति में मैं प्रधानमन्त्री बनना नहीं चाहूँगा ।”

भारत के दूसरे प्रधानमन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री ऐसे ही महान् राजनेता थे, जिनके लिए पद नहीं, बल्कि देश का हित सर्वोपरि था । 27 मई, 1964 को प्रथम प्रधानमन्त्री पण्डित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के बाद देश का साहस एवं निर्भीकता के साथ नेतृत्व करने वाले नेता की जरूरत थी ।

जब प्रधानमन्त्री पद के दावेदार के रूप में मोरारजी देसाई और जगजीवन राम जैसे नेता सामने आए, तो इस पद की गरिमा और प्रजातान्त्रिक मूल्यों को देखते हुए शास्त्री जी ने चुनाव में भाग लेने से स्पष्ट इनकार कर दिया ।

अन्ततः काँग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष कामराज ने काँग्रेस की एक बैठक बुलाई, जिसमें शास्त्री जी को समर्थन देने की बात कीं गई और 2 जून, 1964 को काँग्रेस के संसदीय दल ने सर्व सम्मति से उन्हें अपना नेता स्वीकार किया । इस तरह 9 जून, 1984 को लालबहादुर शास्त्री देश के दूसरे प्रधानमन्त्री बनाए गए।

लालबहादुर शास्त्री का जन्म 2 अक्टूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश के बनारस जिले में स्थित मुगलसराय नामक गाँव में हुआ था । उनके पिता ही शारदा प्रसाद एक शिक्षक थे, जो शास्त्री जी के जन्म के केवल डेढ़ वर्ष बाद स्वर्ग सिधार गए । इसके बाद उनकी माँ रामदुलारी देवी उनको लेकर अपने मायके मिर्जापुर चली गईं । शास्त्री जी की प्रारम्भिक शिक्षा उनके नाना के घर पर ही हुई ।

पिता की मृत्यु के बाद उनके घर की माली हालत अच्छी नहीं थी, ऊपर से उनका स्कूल गंगा नदी के उस पार स्थित था । नाव से नदी पार करने के लिए उनके पास थोड़े-से पैसे भी नहीं होते थे । ऐसी परिस्थिति में कोई दूसरा होता तो अवश्य अपनी पढ़ाई छोड़ देता, किन्तु शास्त्री जी ने हार नहीं मानी, वे स्कूल जाने के लिए तैरकर गंगा नदी पार करते थे ।

इस तरह, कठिनाइयों से लड़ते हुए छठी कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए वे अपने मौसा के पास चले गए । वहाँ से उनकी पढ़ाई हरिश्चन्द्र हाईस्कूल तथा काशी विद्यापीठ में हुई । वर्ष 1920 में गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के लिए उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़ दी, किन्तु बाद में उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने काशी विद्यापीठ में प्रवेश लिया और वहाँ से वर्ष 1926 में ‘शास्त्री’ की उपाधि प्राप्त की ।

शास्त्री की उपाधि मिलते ही उन्होंने जन्म से चला आ रहा जातिसूचक शब्द ‘श्रीवास्तव’ हमेशा के लिए हटा लिया तथा अपने नाम के आगे ‘शास्त्री’ लगा लिया । इसके बाद वे देश सेवा में पूर्णतः संलग्न हो गए ।गाँधीजी की प्रेरणा से ही शास्त्री जी अपनी पढ़ाई छोड़कर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े थे और उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने बाद में काशी विद्यापीठ से ‘शास्त्री’ की उपाधि भी प्राप्त की ।

इससे पता चलता हे कि उनके जीवन पर गाँधीजी का काफी गहरा प्रभाव था और बापू को वे अपना आदर्श मानते थे । वर्ष 1920 में असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण ढाई वर्ष के लिए जेल में भेज दिए जाने के साथ ही उनके स्वतन्त्रता संग्राम का अध्याय शुरू हो गया था ।

काँग्रेस के कर्मठ सदस्य के रूप में उन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभानी शुरू की । वर्ष 1930 में नमक सत्याग्रह में भाग लेने के कारण उन्हें पुन: जेल भेज दिया गया । शास्त्री जी की निष्ठा को देखते हुए पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस का महासचिव बनाया । ब्रिटिश शासनकाल में किसी भी राजनीतिक पार्टी का कोई पद काँटों की सेज से कम नहीं हुआ करता था, पर शास्त्री जी वर्ष 1935 से लेकर वर्ष 1938 तक इस पद पर रहते हुए अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते रहे ।

इसी बीच वर्ष 1937 में वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के लिए चुन लिए गए और उन्हें उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री का संसदीय सचिव भी नियुक्त किया गया । साथ ही वे उत्तर प्रदेश कमेटी के महामन्त्री भी चुने गए और इस पद पर वर्ष 1941 तक बने रहे ।

स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी भूमिका के लिए देश के इस सपूत को अपने जीवनकाल में कई बार जेल की यातनाएँ सहनी पड़ी थी । वर्ष 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने के कारण उन्हें पुन: जेल भेज दिया गया ।

वर्ष 1946 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमन्त्री पं. गोविन्द बल्लभ पन्त ने शास्त्री जी को अपना सभा सचिव नियुक्त किया तथा वर्ष 1947 में उन्हें अपने मन्त्रिमण्डल में शामिल किया । गोविन्द बल्लभ पन्त के मन्त्रिमण्डल में उन्हें पुलिस और परिवहन मन्त्रालय सौंपा गया ।

परिवहन मन्त्री के कार्यकाल में उन्होंने प्रथम बार महिला संवाहकों (कण्डक्टर्स) की नियुक्ति की थी । पुलिस मन्त्री के रूप में उन्होंने भीड़ को नियन्त्रित रखने के लिए लाठी की जगह पानी बौछार का प्रयोग प्रारम्भ करवाया ।

उनकी कर्त्तव्यनिष्ठा और योग्यता को देखते हुए वर्ष 1951 में उन्हें काँग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया । वर्ष 1952 में नेहरू जी ने उन्हें रेलमन्त्री नियुक्त किया । रेलमन्त्री के पद पर रहते हुए वर्ष 1956 में एक बड़ी रेल दुर्घटना की जिम्मेदारी लेते हुए नैतिक आधार पर मन्त्री पद से त्यागपत्र देकर उन्होंने एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया ।

वर्ष 1957 में जब वे इलाहाबाद से संसद के लिए निर्वाचित हुए, तो नेहरू जी ने उन्हें अपने मन्त्रिमण्डल में परिवहन एवं संचार मन्त्री नियुक्त किया । इसके बाद उन्होंने वर्ष 1958 में वाणिज्य और उद्योग मन्त्रालय की जिम्मेदारी सँभाली । वर्ष 1961 में पं. गोविन्द बल्लभ पन्त के निधन के उपरान्त उन्हें गृहमन्त्री का उत्तरदायित्व सौंपा गया ।

उनकी कर्त्तव्यनिष्ठा एवं योग्यता के साथ-साथ अनेक संवैधानिक पदों पर रहते हुए सफलतापूर्वक अपने दायित्वों को निभाने का ही परिणाम था कि 9 जून, 1964 को वे सर्वसम्मति से देश के दूसरे प्रधानमन्त्री बनाए गए । शास्त्री जी कठिन-से-कठिन परिस्थिति का सहजता से साहस, निर्भीकता एवं धैर्य के साथ सामना करने की अनोखी क्षमता रखते थे । इसका उदाहरण देश को उनके प्रधानमन्त्रित्व काल में देखने को मिला ।

वर्ष 1966 में पाकिस्तान ने जब भारत पर आक्रमण करने का दुस्साहस किया, तो शास्त्री जी के नारे ‘जय जबान, जय किसान’ से उत्साहित होकर जहाँ एक ओर वीर जवानों ने राष्ट्र की रक्षा के लिए अपने प्राण हथेली पर रख लिए, तो दूसरी ओर किसानों ने अपने परिश्रम से अधिक-से-अधिक अन्न उपजाने का संकल्प लिया ।

परिणामतः न सिर्फ युद्ध में भारत को अभूतपूर्व विजय हासिल हुई, बल्कि देश के अन्न भण्डार भी पूरी तरह भर गए । अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ और साहस के बल पर अपने कार्यकाल में शास्त्री जी ने देश की कई समस्याओं का समाधान किया । वर्ष 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध की समाप्ति के बाद जनवरी, 1966 में सन्धि-प्रयत्न के सिलसिले में दोनों देशों के प्रतिनिधियों की बैठक ताशकन्द (वर्तमान उज्बेकिस्तान) में बुलाई गई थी । 10 जनवरी, 1966 को भारत के प्रधानमन्त्री के रूप में लालबहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अय्यूब खान ने एक सन्धि-पत्र पर हस्ताक्षर किए और उसी दिन रात्रि को एक अतिथि गृह में शास्त्री जी की रहस्यमय परिस्थितियों में आकस्मिक मृत्यु हृदय गीत रुक जाने के कारण हो गई ।

शास्त्री जी की अन्त्येष्टि पूरे राजकीय सम्मान के साथ शान्ति वन के पास यमुना के किनारे की गई और उस स्थल को विजय घाट नाम दिया गया । उनकी मृत्यु से पूरा भारत शोकाकुल हो गया । शास्त्री जी के निधन से देश की जो क्षति हुई उसकी पूर्ति सम्भव नहीं, किन्तु देश उनके तप, निष्ठा एवं कार्यों को सदा आदर और सम्मान के साथ याद करेगा ।

उनकी सादगी, देशभक्ति और ईमानदारी के लिए मृत्योपरान्त वर्ष 1966 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया । तीव्र प्रगति एवं खुशहाली के लिए आज देश को शास्त्री जी जैसे नि:स्वार्थ राजनेताओं की आवश्यकता है ।

Speech on Lal Bahadur Shastri in Marathi

लाल बहादूर शास्त्री मुघल ऑक्टोबर 2, 1904 पंतप्रधान जन्म उत्तर प्रदेशातील एक सामान्य सामाइक असणारा कुटुंब होते. तुमचे खरे नाव लाल बहादुर श्रीवास्तव होते. शास्त्री वडील शारदा प्रसाद श्रीवास्तव एक शिक्षक होते आणि नंतर भारत सरकारच्या महसूल विभाग कारकून म्हणून काम केले.

लाल बहादुर यांचे शिक्षण हरिश्चंद्र हायस्कूल आणि काशी विद्या पेठ येथे झाले. पोस्ट ग्रेजुएट परीक्षा उत्तीर्ण केल्यानंतर तुम्हाला ‘शास्त्री’ हा किताब मिळाला.

तुम्ही भारत सेवक संघाशी संबंधित आहात. येथेच आपण आपले राजकीय जीवन सुरू केले.

भारताच्या स्वातंत्र्यानंतर शास्त्रीजी उत्तर प्रदेशचे संसदीय सचिव म्हणून नियुक्त झाले. गोविंद बल्लभ पंत यांच्या मंत्रिमंडळात तुम्हाला पोलीस व वाहतूक मंत्रालय नेमण्यात आले होते. परिवहन मंत्रालयाच्या कार्यकाळात आपण महिला कंडक्टर नेमले. आपण पोलिस मंत्री असल्यास, गर्दीवर नियंत्रण ठेवण्यासाठी आपण स्टिकऐवजी जल धक्क्याचा वापर केला आहे.

1 9 51 मध्ये जवाहरलाल नेहरू यांच्या नेतृत्वाखाली तुम्हाला अखिल भारतीय काँग्रेस कमिटीचे सरचिटणीस नियुक्त केले गेले. 1952, 1957 आणि 1962 च्या निवडणुकीत गुणविशेष काँग्रेस च्या जबरदस्त बहुतांश विजय मिळवून आपल्या हार्ड काम आणि मेहनत झाली. आपल्या भारताचा पहिला पंतप्रधान जवाहरलाल नेहरू यांच्या मृत्यूनंतर प्रतिभा आणि निष्ठा आधारीत, काँग्रेस 1964 मध्ये पंतप्रधान लाल बहादूर शास्त्री जबाबदारी नियुक्त केले आहे. आपण 9 जून 1 9 64 रोजी पंतप्रधानपदाची जबाबदारी घेतली.

पंतप्रधान लाल बहादूर शास्त्री 26 जानेवारी, 1965 देशातील सैन्याने घोषणा दिली आणि शेतकरी स्वावलंबी अन्न ‘जय जवान, जय किसान’ तयार उद्देश देशात त्याच्या काम आणि समर्पण मजबूत राहतील. हा नारा अजूनही भारतात लोकप्रिय आहे. युद्ध समाप्त करण्यासाठी करारावर स्वाक्षऱ्या नंतर पाकिस्तान राष्ट्रपती अयुब खान सह उझबेकिस्तान राजधानी ताश्कंद जानेवारी 11, 1966 रात्री अनाकलनीय परिस्थितीत मृत्यू गेला.

आपल्या साधेपणा, देशभक्ती आणि प्रामाणिकपणाबद्दल आपल्याला ‘भरत रत्न’ देण्यात आला.

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