Hindi Lekh Hindi Stories

काबुलीवाला :: Kabuliwala Story in Hindi

Kabuliwala-story-by-Rabindranath-Tagore

Ravindra Nath Tagore भारतीय साहित्य में Noble Prize जीतने वाले एक अकेले भारतीय थे । वे विश्व प्रसिद्ध कवि , साहित्यकार एवं दार्शनिक थे । Noble prize जीतकर वे एशिया के पहले पहले व्यक्ति बन गए जिन्होंने इस पुरुस्कार को प्राप्त किया । वे कविता लेखन के क्षेत्र के एकमात्र ऐसे कवि थे जिनके द्वारा रचित दो रचनाएँ दो देशों के राष्ट्रीय गान के रूप में स्वीकार की गई पहला है भारत देश का राष्ट्र गान ” जन – गन – मन ” और दूसरा है बांग्लादेश का राष्ट्र गान “आमार सोनार बांग्ला” ।इनकी कविताओं को संग्रह “गीतांजलि” नाम से किया गया । इसे पूरे विश्व में बहुत पसंद किया गया और इनकी कविताएँ लोगों को इतनी अच्छी लगी की विश्व की अन्य भाषाओं में इनका अनुवाद किया गया जैसे कि अंग्रेजी , फ्रेंच , जर्मन और जापानी आदि ।

गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की प्रसिद्ध कहानियों के नाम है काबुली वाला , भिखारिन , अनमोल भेंट , गूंगी , अनाथ आदि । आज हम उनकी सबसे प्रसिद्ध कहानी brief summary of kabuliwala in hindi, message of the story kabuliwala in hindi, kabuliwala story characters,kabuliwala story in hindi class 9 को पड़ेंगे । अगर हम moral of kabuliwala in hindi या moral of the story kabuliwala in hindi की बात करे तो इस कहानी में उन्होंने मानव जीवन में बनते नए रिश्तों की संवेदनशील भावनाओं को दर्शाया गया है ।

(काबुलीवाला) Kabuliwala Story by Rabindranath Tagore

Kabuliwala Meaning in Hindi –

काबुलीवाला पश्तून का एक पठान था जो कलकत्ता व्यापार करने आया था ।

रवींद्रनाथ जी इस कहानी में बताते है की उनकी 5 साल की एक लड़की है जिसका नाम मिनी है , जो की क्षण भर के लिए उनसे बात किए बिना नहीं रह सकती । जन्म के बाद उसको बोलने में मात्र 1 साल का समय लगा उसके बाद वह कभी शांत नहीं रहती थी सिवाय सोने के समय । उसकी माँ बहुधा उसे डाँट- फटकार कर चुप करा देती थी लेकिन मुझसे ऐसा नहीं हो पता । मिनी का चुप रहना मेरे लिए सामान्य नहीं था, जब कभी भी वो चुप हो जाती थी तो मुझे बहुत ही खालीपन महसूस होता था ।

एक दिन सुबह सुबह मैं अपने उपन्यास के सत्रहवे अध्याय को हाथ लगाने जा ही रहा था की इतने में मिनी भागते हुए आई और बोली – ” बाबूजी जो रामदयाल दरबान है , वो काक को कौआ कहता है , उसे कुछ पता नहीं है ना बाबूजी । ” इससे पहले की मै कुछ बोल पता वह फिर बोल पड़ी ।इस बार एक ऐसा प्रश्न कर बैठी जिसका उत्तर देना मेरे लिए थोड़ा कठिन था । वह बोली -“बाबूजी, माँ आपकी कौन है ?” इस बार मैंने उसको बोल – “मिनी , अभी तू जाकर भोला के साथ खेल तब तक मै अपना काम करता हुँ ।”इस पर वह मेरे पास ही बैठकरअपने खेल में लग गई ।

मेरा घर सड़क के किनारे ही बना हुआ था । एक दिन मिनी कमरे में अटकन – बटकन  खेल रही थी । अचानक से वह अपना खेल छोड़कर खिड़की की तरफ दौडी और जोर जोर से चिल्लाने लगी – काबुली वाले , अरे ओ काबुलीवाले ।

ढीले – ढाले ,मैले – कुचेले कपड़े पहने , कंधे पर सूखे मेवों का थैला लटकाए , हाथ में अंगूरों का डिब्बा लिए एक लंबा सा काबुली वाला धीरे-धीरे चला जा रहा था । मिनी की आवाज सुनकर उसने मुड़कर देखा और मुस्कुराकर घर की ओर आने लगा उसे देखकर मिनी ने जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया और वह डर के मारे घर के अंदर भाग कर आ गई । उसके झोले को देखकर उसे ऐसा एहसास हुआ की मानों उस जैसे चार – पाँच बच्चे और मिल जाएंगे ।

काबुली वाला हस्ते हुए मेरे पास आया और मैंने उससे सामान खरीदा । उससे मुझसे पूछा , ” साहब ,आपकी लड़की कहाँ गई ?” मिनी के आने पर काबुली वाले ने अपने झोले में से किशमिश-बादाम निकाल कर मिनी को दिए । इस प्रकार काबुली वाले से मिनी की पहली मुलाकात हुई । कुछ दिन बाद बाहर जाते समय मैंने देखा की मिनी काबुलीवाले से हँस कर बात कर रही थी । काबुलीवाला भी उसकी बात बड़े ध्यान से सुन रहा था । मिनी की झोली में किशमिश – बादाम भरे हुए थे । मैंने जाते समय काबुलीवाले को अठठन्नी देते हुए कहा , “अब आगे से मत देना ।” काबुली वाला कुछ समय बाद वह वही अठठन्नी मिनी की दे गया ।

इस तरह वह रोज आता और मिनी को किशमिश और बादाम देता उसके और मिनी के बीच गहरी दोस्ती हो गई । दोनों काफी देर तक बात करते हो हँसते । काबुलीवाले का नाम रहमत था । अब जब कभी वह आता तो मिनी उससे पूछती ,” काबुली वाले तुम्हारे झोले में क्या है ?”

इस पर रहमत जाववाब देता ‘हाथी’ और मिनी से पूछता -‘ तुम ससुराल कब जाओगी ? तुम कभी ससुराल मत जाना । ” इस पर मिनी उससे पूछती है – “तुम जाओगे ससुराल । ” तो रहमत हसकर जवाब देता -” हम ससुर को मारेगा” और मिनी हँस उठती ।

एक सुबह मै अपने किसी काम में व्यस्त था की तभी आचनक से सड़क से बहुत जोर से शोर आता हुआ सुनाई दिया । बाहर देखा तो पता चला की रहमत को कुछ सिपाही पकड़ कर ले जा रहे थे । रहमत का कुर्ता खून से सना हुआ था और सिपाही के हाथ में एक छुरा लगा हुआ था ।

जब सिपाही से पूछा तो पता चल की पास में रहने वाले एक आदमी ने रहमत से एक चादर खरीदी थी और कुछ रुपए उधार कर दिए थे । जब रहमत ने वह रुपए मांगे तो उस आदमी ने देने से मना कर दिया , तो उन दोनों के बीच बात इतनी बढ़ गई की रहमत ने गुस्से में आकार उसे छुरा मार दिया । इतने में मिनीन घर के अंदर से भागते हुए आई और बोली – “काबुलीवाले क्या तुम ससुराल जाओगे इस पर उसने जवाब दिया – वही तो जा रहा हुँ । ” उसे लगा की मिनी उसके जवाब से खुश नहीं हुई तो उसने घूसा दिखते हुए कहा – ” हाथ बंधे हुए है मेरे नहीं तो ससुर को बहुत मारता । ”

छुरा मरने के लिए उसे कई साल की सजा हो गई और मिनी भी बड़ी होती गई और धीरे – धीरे उसे भूल गई । कई साल निकल गए ।

आज मेरी मिनी की शादी है । मै अपने कमरे में बैठ हिसाब कर रहा था की तभी वह रहमत आया और मुझे सलाम किया । पहले तो मै उसे पहचान नहीं पाया बाद में गौर से देखने पर ध्यान दिया की ये तो रहमत है । मैंने उससे कहा की रहमत कब आए तो उसने कहा “आज ही जेल से छूटकर आया हु । मैंने उससे कहा आज मेरे घर बहुत काम है , तुम कल आना । वह उदास हो गया और जाने लगा फिर दरवाजे के पास रुक कर बोल -” क्या बच्ची को नहीं देख सकता ?” मैंने कहा – ” आज उससे मिलने नहीं हो पाया ।”

वह उदास होकर घर से बाहर निकाल गया । मैंने सोचा उसे बुलाऊ इतने में उसने वापस आकर बोल – ” ये कुछ सुखी मेवा है बच्ची के लिए । उसको दे दीजिएगा । ” जब मैंने उसे पैसे देने चाहे तो वह बोला – “पैसे मत दीजिए साहब , आपकी बहुत मेहरबानी होगी । मेरी भी एक आपकी तरह एक बेटी है जिसकी याद में रोज कुछ मेवा ले आता हुँ । बेचने नहीं आता । ”

उसने अपने पुराने गंदे से कुर्ते के अंदर हाथ डाल कर अपने सीने के पास से एक गंदा पुराना सा कागज निकाला और बहुत ही सावधानी के साथ उसे खोलकर मेरी मेज पर बिछा दिया । उस कागज के टुकड़े पर नन्हे से हाथों की छाप थी । ये कोई चित्र नहीं था  बल्कि हाथ में कालिख लगा कर कागज पर उसकी छाप ले ली गई थी । यह देखकर मेरा हृदय द्रवित हो गया और मेरी आँखें भर आई ।

मैंने उसी समय मिनी को बाहर से बुलाया । दुल्हन के कपड़ों में सजी -सँवरी वह शरमाते हुए मेरे पास आकर खड़ी हो गई । पहले तो काबुली वाला उसे देखकर थोड़ा सकपकाया फिर बोला – “लल्ली ! सास के घर जा रही हो क्या ?”

मिनी के जाने पर रहमत ने गहरी साँस ली और जमीन पर बैठ गया । उसे अब इस बात का एहसास हो गया था की उसकी बेटी भी अब इतनी बड़ी हो गई होगी । मैंने अपनी जेब से एक नोट निकालकर रहमत को दिया और कहा – ” रहमत तुम अपनी बेटी के पास अपने देश चले जाओ । इससे मेरी मिनी को बहुत खुशी होगी ।” इस का प्रभाव मिनी की शादी पर भी पढ़ा । जिस धूम-धाम से मै अपनी बेटी की शादी करना चाहता था वह नहीं कर पाया ।जिसके लिए मुझे घर की महिलाओं ने बहुत सुनाया । लेकिन एक पिता को उसकी बेटी से मिलाकर हमारा समारोह और प्रकाशित हो गया ।

आशा है कि ये कहानी आपको पसंद आई होगी ।आप Kabuliwala Hindi Book Pdf डाउनलोड करके भी पढ़ सकते है ।

Leave a Comment