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संत रविदास के दोहे 2018 – Sant Ravidas Dohe in Hindi – रैदास के दोहे और उनके अर्थ – Shloks & Quotes

जैसे की आप जानते हैं की हमारे भारत के इतिहास में बहुत से बड़े और महान महात्मा संत है संत रविदास भी उन्ही महान गुरुओ में से एक थे| उनके श्लोक और पद ने हमारे जीवन पर बहुत अच्छा प्रभाव छोड़ा हैं| उनके महान विचारो और सोच को जीवन में अपनाना लाभदायक हैं| हमारे पोस्ट द्वारा आप महान संत रविदास के दोहे इन हिंदी, रविदास के पद प्रभुजी और संत रविदास कोट्स इन हिंदी के बारे में आपको जानकारी देंगे|आज संत रविदास जी की जयंती पर आइये देखें उनके कुछ प्रसिद्द दोहे जिनको आप quotes, sms व मेसेज कर सकते हैं|

संत रविदास के दोहे इन हिंदी

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

संत रविदास दोहे

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।

वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।

रैदास की कविता

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
रैदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम

सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम

अर्थ : रविदास जी कहते है कि जिसके हर्दय मे रात दिन राम समाये रहते है, ऐसा भक्त राम के समान है, उस पर न तो क्रोध का असर होता है और न ही कम भावना उस पर हावी हो सकती है

हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।

अर्थ : रविदास जी कहते है कि हरी के समान बहुमूल्य हीरे को छोड़ कर अन्य की आशा करने वाले अवश्य ही नरक जायेगें अर्थात् प्रभु भक्ति को छोड़ कर इधर-उधर भटकना व्यर्थ है

अर्थ : रविदास जी कहते है कि जिस रविदास को देखने से घर्णा होती थी, जिसका नरक कुंद मे वास था, ऐसे रविदास जी का प्रेम भक्ति ने कल्याण कर दिया है ओंर वह एक मनुष्य के रूप मै प्रकट हो गए है

’रविदास’ जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नर कूँ नीच करि डारि है, ओछे करम की कीच।

अर्थ : “गुरु रविदास जी कहते हैं कि मात्र जन्म के कारण कोई नीच नहीं बन जाता हैं परन्तु मनुष्य को वास्तव में नीच केवल उसके कर्म बनाते हैं”

quotes of sant ravidas in hindi pdf

माटी को पुतरा कैसे नचत है ।। देखै देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरत है ।। १ ।। रहाउ ।।
जब कछु पावै तब गरब करत है ।। माया गई तब रोवन लगत है ।। १ ।।
मन बच क्रम रस कसहि लुभाना ।। बिनसि गया जाय कहुँ समाना ।।२।।
कहि रविदास बाजी जग भाई ।। बाजीगर सउ मोहे प्रीत बन आई ।।३।।

अर्थ : “गुरु रविदास जी कहते हैं कि यह पाँच तत्व रुपी मिट्टी का पुतला ( मनुष्य ) मोह-माया में फँसकर सांसारिक कार्य-कलापों में नाच रहा है। यह मोह-माया के प्रभाव में फँसकर देखता, सुनता, बोलता और दौड़ता है । जब मनुष्य कुछ प्राप्त कर लेता है तब यह अभिमान करता है और जब माया चली जाती है, तब रोने लगता है अर्थात उसे अपने लुट जाने का अहसास होता है । सांसारिक विषय-वासनाओं के लोभ में पड़कर जीव मन, वचन और कर्म से माया का ही वीचार करता है। उसे यह भी ज्ञान नही कि मरने के बाद वह किस योनि में जाएगा । गुरू रविदास जी कहते हैं कि यह संसार बाजीगर की बाजी की तरह झुठा है, पर मेरी प्रीति तो इस खेल को करने वाले परमात्मा से लग गई है ।

जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।

कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।

Raidas ke pad arth sahit

रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।

हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।

कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।

वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।

चरन पताल सीस असमांना,
सो ठाकुर कैसैं संपटि समांना।

बांधू न बंधन छांऊं न छाया,
तुमहीं सेऊं निरंजन राया।।

raidas ke pad prabhuji

सिव सनिकादिक अंत न पाया,
खोजत ब्रह्मा जनम गवाया।।

तोडूं न पाती पूजौं न देवा,
सहज समाधि करौं हरि सेवा।।

नख प्रसेद जाकै सुरसुरी धारा,
रोमावली अठारह भारा।।

संत रविदास जी के दोहे

चारि बेद जाकै सुमृत सासा,
भगति हेत गावै रैदासा।।

“मन चंगा तो कठौती में गंगा।”
“गुरु मिलीया रविदास जी दीनी ज्ञान की गुटकी।
चोट लगी निजनाम हरी की महारे हिवरे खटकी।।”

Sant Ravidas ji ke dohe in Hindi

“जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।”

“रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कछु नाहिं।
तैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि।।”

Sant ravidas quotes in hindi

“कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।।”

“कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।”

“हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।”

रैदास के दोहे

“वर्णाश्रम अभिमान तजि, पद रज बंदहिजासु की।
सन्देह-ग्रन्थि खण्डन-निपन, बानि विमुल रैदास की।।”

“विष को प्याला राना जी मिलाय द्यो मेरथानी ने पाये।
कर चरणामित् पी गयी रे, गुण गोविन्द गाये।।”

“हिंदू तुरक नहीं कछु भेदा सभी मह एक रक्त और मासा।
दोऊ एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यो सोइ रैदासा।।”

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