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वाल्मीकि जयंती पर कविता 2018 – Maharishi Valmiki Jayanti Kavita in Hindi – Valmiki Jayanti Poem in Hindi

valmiki jayanti 2018: महर्षि वाल्मीकि भारत के पहले कवी थे जिन्होंने हिंदी एवं संस्कृत दोनों भाषा में रामायण लिखी थी| उन्होंने श्लोक की रचना भी करि थी| वाल्मीकि जयंती समूचे भारत में मनाये जाने वाला पर्व है पर इस दिन को ज्यादातर उत्तर भारत में मनाया जाता है| इस दिन को बहुत से लोग बाल्मीकि जयंती के नाम से भी सम्भोधित करते हैं| इस दिन भारत में अलग अलग स्थान पर महर्षि वाल्मीकि की शोभा यात्रा निकाली जाती है| यह जानकारी हिंदी, इंग्लिश, मराठी, तेलगु, बांग्ला, गुजराती, तमिल आदि की जानकारी देंगे जिसे आप अपने स्कूल में प्रतियोगिता, कार्यक्रम या भाषण प्रतियोगिता में प्रयोग कर सकते है| ये कविता खासकर कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए दिए गए है|

Valmiki Jayanti kavita in hindi

वाल्मीकि जयंती कब है: यह पर्व हर वर्ष आश्विन मॉस की पूर्णिमा को मनाया जाता है| इस वर्ष यह पर्व 24 अक्टूबर को है| आइये अब हम आपको वाल्मीकि जयंती पर भाषण, Valmiki Jayanti jayanti poem in hindi language, वाल्मीकि जयंती पर निबंध, Valmiki Jayanti par kavita, Valmiki Jayanti poetry in hindi, वाल्मीकि जयंती पर पोएम इन हिंदी में,  किसी भी भाषा जैसे Hindi, हिंदी फॉण्ट, मराठी, गुजराती, Urdu, उर्दू, English, sanskrit, Tamil, Telugu, Marathi, Punjabi, Gujarati, Malayalam, Nepali, Kannada के Language व Font में साल 2007, 2008, 2009, 2010, 2011, 2012, 2013, 2014, 2015, 2016, 2017 का full collection जिसे आप अपने स्कूल व सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे whatsapp, facebook (fb) व instagram पर share कर सकते हैं|

कहते हैं कि वाल्मीकि
एक खूंखार लुटेरा था
नारद ने उसे ज्ञान दिया
वह महाॠषि हो गया
पर वाल्मीकि लुटेरा क्यों था?
जंगल में रहता क्यों था?
श्रेष्ठियों को लूटता क्यों था?

कहते हैं कि वाल्मीकि
एक अदना सा ब्राह्मण था
उसने राम कथा गाई
और महाकवि हो गया
पर क्यों लिखी उसने
शंबूक वध कथा

हर बार वाल्मीकि जयंती पर
मैं यही सोचता हूँ
कि क्या है वाल्मीकि का असली चेहरा
उस पर क्यों लगा है
इस जंजाल का पहरा

Valmiki Jayanti par kavita

Valmiki Jayanti par kavita

कौसल्या ने पुत्र जना , रामचन्द्र ही आज
अस्पताल बारात हुई , शुरू हो गया नाच

भरत शत्रुघ्न लक्ष्मण , पुत्र तीन थे और
पूरी अयोध्या नाच उठी , खुशियों का था दौर

पुत्र सभी बड़े हुए , पहुँचे अब स्कूल
इंटर तक रखा गया , मोबाइल से दूर

ग्रेजुएशन में बनाई , फेसबुक पर आयडी
हनुमान दोस्त हुए , सीता मैय्या भाभी

सम्पत्ति के खेल को , खेल गयी कैकेय
राम जायें वनवास को , राजा भरत ही होय

दसरथ को मैसेज कर , निकल पड़े श्रीराम
साथ में सीता माँ और , भाई था लक्ष्मण नाम

शूपर्णखा की फ्रेंड रिक्वेस्ट , आई प्रभु के पास
इसी बात पर हो गयी , सीता जी नाराज

राम चन्द्र गुस्से में , निकल गए एक टूर
रावण ने फायदा उठा , ले गया माँ को दूर

रिप्लाई जब ना मिला , कुटिया पहुँचे राम
लक्ष्मण चैटिंग विद उर्मिला , भूले सारे काम

डांट खाई प्रभु राम की , शुरू हुई तब ख़ोज
सिग्नल के अभाव में , जीपीएस था लूज़

इसी बीच सुग्रीव से , हुई एक मुलाकात
दोनों के दुःख एक से , हो गए दोनों साथ

बाली का स्टिंग किया ,किया पुलिस के हाथ
दूर किया सुग्रीव का , बरसों का सन्ताप

हनुमान को देख कर , प्रभु ने किया प्रनाम
आँख में आँसू पाय के , पवनसुत परेशान

लंका में नेटवर्क का , नही हुआ विकास
बन्द है प्रिय का फोन , होवे कैसे बात

परेशान प्रभु हो नही , मरेगा वो रावण
खत्म होगा ये युद्ध जब , लगेंगें वहाँ टावर

हनुमान उड़के गए , दिया रिलायंस का सिम
माँ ने प्रभु को फोन किया , दोनों बातों में गुम

रावण के गुर्गों ने , पकड़ा श्री हनुमान
आग लगाई पूँछ पर , बिफर गए श्रीमान

स्वाहा किया तुरन्त ही , सोने का वह होम
रावण डिप्रेशन गया , कैसे भरेगा लोन

वापस आकर राम को , बता दिया सब हाल
राम ने बोला मित्रगण , साफ करो हथियार

धनुष बाण काफी है , क्या होगा परमाणु
लंका जब से जल गयी , रावण है कंगाल

पूरी सेना चल पड़ी , लंका फतह को आज
सुग्रीव लकी हनुमान , करते ऊँची आवाज़

जीतती सेना देख कर , लक्ष्मण इन उत्साह
देख रहे मेसेज तभी , बाण से आई मुरछा

हनुमान उड़ कर गए , बाबा जी के पास
जड़ी बूटी के लेप से , लक्ष्मण खड़े थे आज

राम ने मारा बाण तब , रावण गिरा जमीन
बोला प्रभु माफ़ी दियो , कृत्य गलत था कीन

राम के स्टेटस में , आई एम विद माय लव
मेरे एक प्रहार से , मर गए दुश्मन सब

वापस पाकर सीता , पहुँचे अपने धाम
पूरी प्रजा दीप जलाकर , करती है सम्मान

आसमान से देख के , वर माँगे ” शशांक ”
अर्पित चमक प्रभु चरण , न हो कभी थकान !!!

Valmiki Jayanti poem in hindi

मंगल मूरति करिवर बदन। शंकर सुत सुख सिद्धिक सदन॥
गणनायक दायक फल चारि। प्रणमिय तनिक चरण शिर धारि॥
श्री लक्ष्मीनारायण चरण। सेविय मन दय भवभय हरण॥
सीता राम जनिक अवतार। सगुणे कयल चरित्र अपार॥
पूरण ब्रह्म मनुज तन घयल। लोकक हित कति लीला कयल॥
जनिक मनोहर चरित उदार। गाबि होथि नर भव निधि पार॥
तनि पद नति करि बारम्बार। करथु पतित पावन निस्तार॥
गुरु पद पंकज रज निज नयन। अंजन करिय लहिय सुख चयन॥
छूट अविद्या आदिक दोष। विमल ज्ञान पाविय परितोष॥
मारूत सुत पद वन्दन करिय। जनिके वल भवनिधि सन्तरिय॥
पवन तनय जौं होथि सहाय। सकल कष्ट क्षणमय छुटिजाय॥
जनिकाँ उर रामायण माल। महावीर से होथु दयाल॥
जे ऋषि काव्यक प्रथम स्नान। तनिपद करिय प्रणाम विधान॥
रहयित राम नाम विपरीति। पाओल ब्रह्मक पद सुख रीति॥
दया करथु से देथु प्रसाद। जेहि सौं छूटय मनक विषाद॥
शिरधरि देव पितर पद धूर। करथु हमर अभिलाषा पूर॥
वैदेही महिमा सुख सार। कहलनि बालमीकि विस्तार॥
भारद्वाज सुनल मन लाय। सीता चरित ललित समुदाय॥
बजली सीता भाषा जैह। तेहि मे कहब कथा हम सैह॥

Maharishi Valmiki Jayanti short poems

तदनन्तर श्री हरि हरषाय। सभा सुरंजित कयलनि जाय॥
कौशिक प्रीति महोत्सव गान। हो आरम्भ कहल भगवान॥
तेहिखन विष्णु पाबि निदेश। आयल किन्नर गुणिगण वेश॥
एक कोटि चेटी तेही संग। आइलि सुन्दरि करयित रंग॥
परम मनोहर कहल न जाय। सुर सुन्दरि सभ देखि लजाय॥
तनि सबहिक सुन्दरता देखि। सकल भक्त परि हरल विशेषि॥
विष्णु प्रसन्न होथि तेँ काज। लागल गाबय गुणिक समाज॥
विधि सौं गाबय गान नवीन। बजबय विविध वादय वरवोत॥
नित्य करय सुन्दरि समुदाय। कोकिल स्वर गाबय मन लाय॥
लक्ष्मी सहित विष्णु बैसलाह। कौशिक प्रभूति सुनय लगलाह॥
लक्ष्मीक दासी कोटि हजार। वेत्र पाणि सभ रोकल द्वार॥
गान सुनय सुरगण निज धाम। ऋषि गण मिलि अयला तेहिठाम॥
से सभ लगला करय प्रवेश। गान महोत्सव हो जेहि देश॥
सुरगण काँ दासी समुदाय। वरवस तहँ सौं देल हटाय॥
जे नहि मनि मरथि किछु जोर। तनिकाँ मारय दण्ड कठोर॥
दासी युक्त कथा सभ भनय। प्रभु आगा तोहरा के गनय॥
सुरगण सुनि रहलाह अबाक। ताकथि ठाढ़ फराक फराक॥
तुम्बुरू तखन वजाओल गेल। सादर से तँह आगत भेल॥
जतय दहथि लक्ष्मी भगवान। तहँ आरम्भ भेल शुभ गान॥
विविध ताल युत गान प्रवीन। गाबथि सुन्दर बजबथि वीन॥
नाना राग रागिनी ताल। सभ प्रत्यक्ष भेल तहिकाल॥
तुम्बुरू गान कहल नहि जाय। मोहित भेल सभा समुदाय॥
ककरहु शुद्धि रहल नहि जतय। डूबल रागोदधि मे ततय॥
चित्तक चंचलता सभ गेल। चित्र समान सकल जन भेल॥
मन एकाग्र लक्ष्मी भगवान। कि कहब आनक मनक ठेकान॥
तुम्बुरू कयलनि सभा सुरंज। गाओल सभ गायक गुण पुंज॥
सुनल सभ्य मिलि सुन्दर गान। तखन विसर्जन भेल निदान॥
बड़ प्रसन्न भेला भगवान। दिव्य वसन भूषण देल दान॥
हरि सौं पाबि विविध सनमान। तुम्बुरू बहरयला सविधान॥

वाल्मीकि जयंती मराठी कविता

त्यानंतर, श्री हरि हरशाया बैठक स्वच्छ आणि स्वच्छ आहे.
कौशिक प्रीती महोत्सव गाणे होय सुरूवातीस म्हणतात
तेखखान विष्णु पाबी निर्देश तेल पार्सर गुणाकार प्रवेश.
स्ट्रोकसह मी एक सुंदर रंग आहे.
त्याला परिपूर्ण मनोहर म्हणू नये. सुर सुंदरी सर्व मजेदार पहा
सुंदर दृश्याकडे पहा. एकूण भक्त
विष्णु प्रसन्ना होथी टीन काज लगल गाबी मल्टीप्लिसीटी सोसायटी
लॉस्मिथ सॉन्ग सोंग्स न्यू विविध वाडी पार्वती
नेहमी सुंदर समुदाय करा कोकिल स्वर गबे मॅन लाई
लक्ष्मीसह विष्णु बसिला कौशिक प्रभुपती सुनय लागला
लक्ष्मी मासी कोटी हजार वेत्र पान सब् रोकेट गेटवे
गाणे सनी सुगान निज धाम ऋषी गण मिलई आई तेहीथम
सर्व प्रवेशद्वार गान उत्सव, जिहो जमीन
सुरगॅनची नौकरानी समुदाय अनिश्चित
तुरुंगात काहीही फरक पडत नाही कडक शिक्षा दंडनीय
दासी-पूंछ कथा लॉर्ड आगा टोहोरा यांचे गुना
सुगान सूर्य राहला अबक तकाथी थाड फारक फरक
तुंबुरु तखान वाजोल गेल भेल जमा करण्याबाबत
जटाय दहेती लक्ष्मी देव भेल चांगले गाणे सुरु केले
विविध लय संगीत गठ्ठी सुंदर बाघथी वीन
नाना राग रागिनी लय सर्व प्रत्यक्ष भेल तहहालाल
तुंबरु गाणे म्हटले जाऊ शकत नाही. मोहित भेल सभा
कुर्कुह शुध्द अस्तित्वात नाही. तट्टय मधील दबल रागगोदी
चिंतक चंचलाता गेल भल भव्य वस्तुमान चित्र पहा
मन देवीच्या देवताकडे लक्ष केंद्रित करते त्यास एक चांगला मणी घर म्हणतात.
तुंबुरु काइलन मीटिंग हॉल गाऊल सैफ गायक प्रतिभा गुंज
सुन्न कल्चरिव्ह मिलि बॅन्युफुल गॅन फ्रोजन इमर्सन बीएचएल निदान
देवाने आनंदित केले दिव्य वासन भूषण डॅन डॅन.
ग्रीन हनी तुंबुरू संविधानाचे फळ

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