माँ बाप पर कविता – Maa Baap par Kavita in Hindi – माता पिता पर कविता इन हिंदी – Poem on Parents

maa baap par kavita in hindi
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किसी भी बच्चे के जीवन में सबसे ज्यादा महत्व उसके माँ बाप का होता है| बच्चे के जीवन के प्रारम्भ से ही उसे पाल पोसकर बड़ा करने वाले माँ बाप बच्चे की ख़ुशी के लिए अपनी खुशियों का त्याग कर देते है| कुछ लोग यह भी कहते है की बच्चे के जीवन में उसकी माँ का सबसे ज्यादा महत्व होता है| परन्तु पिता का भी सामान महत्व होता है| यह दोनों दिन रात एक करके अपने संतान को शिष्ट सिखाते है| वे अपने बच्चे की ख़ुशी में ही अपना संसार ढून्ढ लेते है|

माँ पिता पर कविता

भूलो सभी को मगर, माँ-बाप को भूलना नहीं।
उपकार अगणित हैं उनके, इस बात को भूलना नहीं।।
पत्थर पूजे कई तुम्हारे, जन्म के खातिर अरे।
पत्थर बन माँ-बाप का, दिल कभी कुचलना नहीं।।
मुख का निवाला दे अरे, जिनने तुम्हें बड़ा किया।
अमृत पिलाया तुमको, जहर उनके लिए उगलना नहीं।।
कितने लड़ाये लाड़, सब अरमान भी पूरे किये।
पूरे करो अरमान उनके, बात यह भूलना नहीं।।
लाखों कमाते हो भले, माँ-बाप से ज्यादा नहीं।
सेवा बिना सब राख है, मद में कभी फूलना नहीं।।
संतान से सेवा चाहो, संतान बन सेवा करो।
जैसी करनी वैसी भरनी, न्याय यह भूलना नहीं।।
सोकर स्वयं गीले में, सुलाया तुम्हें सूखी जगह।
माँ की अमीमय आँखों को, भूलकर कभी भिगोना नहीं।।
जिसने बिछाये फूल थे, हर दम तुम्हारी राहों में।
उस राहबर की राह के, कंटक कभी बनना नहीं।।
धन तो मिल जायेगा, मगर माँ-बाप क्या मिल पायेंगे ?
पल-पल पावन उन चरण की, चाह कभी भूलना नहीं।।

मा बाप पर कविता

शब्द शब्द में गहराई है…
जब आंख खुली तो माँ की
गोदी का एक सहारा था
उसका नन्हा सा आंचल मुझको
भूमण्डल से प्यारा था
उसके चेहरे की झलक देख
चेहरा फूलों सा खिलता था
उसके स्तन की एक बूंद से
मुझको जीवन मिलता था
हाथों से बालों को नोंचा
पैरों से खूब प्रहार किया
फिर भी उस मां ने पुचकारा
हमको जी भर के प्यार किया
मैं उसका राजा बेटा था
वो आंख का तारा कहती थी
मैं बनूं बुढापे में उसका
बस एक सहारा कहती थी
उंगली को पकड. चलाया था
पढने विद्यालय भेजा था
मेरी नादानी को भी निज
अन्तर में सदा सहेजा था
मेरे सारे प्रश्नों का वो
फौरन जवाब बन जाती थी

माँ बाप पर कविता

मेरी राहों के कांटे चुन
वो खुद गुलाब बन जाती थी
मैं बडा हुआ तो कॉलेज से
इक रोग प्यार का ले आया
जिस दिल में मां की मूरत थी
वो रामकली को दे आया
शादी की पति से बाप बना
अपने रिश्तों में झूल गया
अब करवाचौथ मनाता हूं
मां की ममता को भूल गया
हम भूल गये उसकी ममता
मेरे जीवन की थाती थी
हम भूल गये अपना जीवन
वो अमृत वाली छाती थी
हम भूल गये वो खुद भूखी
रह करके हमें खिलाती थी
हमको सूखा बिस्तर देकर
खुद गीले में सो जाती थी
हम भूल गये उसने ही
होठों को भाषा सिखलायी थी
मेरी नीदों के लिए रात भर
उसने लोरी गायी थी
हम भूल गये हर गलती पर
उसने डांटा समझाया था
बच जाउं बुरी नजर से
काला टीका सदा लगाया था
हम बडे हुए तो ममता वाले
सारे बन्धन तोड. आए
बंगले में कुत्ते पाल लिए
मां को वृद्धाश्रम छोड आए
उसके सपनों का महल गिरा कर
कंकर-कंकर बीन लिए
खुदग़र्जी में उसके सुहाग के
आभूषण तक छीन लिए
हम मां को घर के बंटवारे की
अभिलाषा तक ले आए
उसको पावन मंदिर से
गाली की भाषा तक ले आए
मां की ममता को देख मौत भी
आगे से हट जाती है
गर मां अपमानित होती
धरती की छाती फट जाती है
घर को पूरा जीवन देकर
बेचारी मां क्या पाती है
रूखा सूखा खा लेती है
पानी पीकर सो जाती है
जो मां जैसी देवी घर के
मंदिर में नहीं रख सकते हैं

Maa Baap Par Kavita

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वो लाखों पुण्य भले कर लें
इंसान नहीं बन सकते हैं
मां जिसको भी जल दे दे
वो पौधा संदल बन जाता है
मां के चरणों को छूकर पानी
गंगाजल बन जाता है
मां के आंचल ने युगों-युगों से
भगवानों को पाला है
मां के चरणों में जन्नत है
गिरिजाघर और शिवाला है
हिमगिरि जैसी उंचाई है
सागर जैसी गहराई है
दुनियां में जितनी खुशबू हैमां के आंचल से आई है
मां कबिरा की साखी जैसी
मां तुलसी की चौपाई है
मीराबाई की पदावली
खुसरो की अमर रूबाई है\

मां आंगन की तुलसी जैसी
पावन बरगद की छाया है
मां वेद ऋचाओं की गरिमा
मां महाकाव्य की काया है
मां मानसरोवर ममता का
मां गोमुख की उंचाई है
मां परिवारों का संगम है
मां रिश्तों की गहराई है
मां हरी दूब है धरती की
मां केसर वाली क्यारी है
मां की उपमा केवल मां है
मां हर घर की फुलवारी है
सातों सुर नर्तन करते जब
कोई मां लोरी गाती है
मां जिस रोटी को छू लेती है
वो प्रसाद बन जाती है
मां हंसती है तो धरती का
ज़र्रा-ज़र्रा मुस्काता है
देखो तो दूर क्षितिज अंबर
धरती को शीश झुकाता है
माना मेरे घर की दीवारों में
चन्दा सी मूरत है
पर मेरे मन के मंदिर में
बस केवल मां की मूरत है
मां सरस्वती लक्ष्मी दुर्गा
अनुसूया मरियम सीता है
मां पावनता में रामचरित
मानस है भगवत गीता है
माँ तेरी हर बात मुझे
वरदान से बढकर लगती है
हे मां तेरी सूरत मुझको
भगवान से बढकर लगती है
सारे तीरथ के पुण्य जहां
मैं उन चरणों में लेटा हूं
जिनके कोई सन्तान नहीं
मैं उन मांओं का बेटा हूं
हर घर में मां की पूजा हो

हिन्दी कविता माँ पर

हर माँ बाप को अपना फर्ज निभाना होता है
रोते हुए बच्चे को प्यार से गले लगाना होता है,
तेरी सूरत देख जन्नत का सुख नसीब होता है
माँ तेरे आँचल में, हर मौसम सुहाना होता है,
मेरे जीवन में बचपना जब उछल कूद करता है
खिलौना लेने का माँ से, फिर नया बहाना होता है,
जब जिद्द पर अड़ जाऊ माँ प्यार से समझाती है
माँ की बात को ना समझू तो, रोना रुलाना होता है,
मेरे हर गुन्हा को मेरी माँ हंस कर माफ़ कर देती है
नादान हू में, कुछ गलतियों को माँ से छुपाना होता है,
लुटा कर सारी दोलत बच्चो पर माँ-बाप गर्व करते है
माँ-बाप का खज़ाना, बच्चो का सपना सजाना होता है

माता पिता पर कविता इन हिंदी

भूलो सभी को तुम मगर, माँ-बाप को भूलो नहीं
उपकार अगणित है कभी, इस बात को भूलो नहीं।
पत्थर कई पूजे तुम्हारे, जन्म के खातिर
अरे पत्थर बन माँ-बाप की छाती,कभी कुचलो नहीं।
मुख का निवाला देकर, जिन्होंने तुम्हे मोटा किया
अमृत दिया तुमको, जहर उनके लिए उगलो नहीं।
कितने लड़ाए लाड सब, अरु अरमान भी पूरे
किये पूरे करो अरमान उनके, बात यह बदलो नहीं।
लाखो कमाते हो भले, माता-पिता से ज्यादा नहीं
सेवा बिना सब राख है, मद में कभी भूलो नहीं।
संतान की सेवा मिले, संतान बन सेवा करो
जैसा करो वैसा भरो, इस सत्य को भूलो नहीं।
जो स्वयं सोकर गीले में , तुमको सुलाया सूखे में
माँ की तरसती भावना को, तुम, कभी कुचलो नहीं।
जिसने बिछाए फूल थे, हरदम तुम्हारी राह में
उन राह्गर के प्राण को, कष्टक बन कुचलो नहीं।
धन तो बहुत मिल जायेगा, पर माँ-बाप क्या मिल
पाएंगे उनके चरण की धूल लेना, तुम कभी भूलो नहीं।
दुःख सहा भी अगर माप-बाप की खातिर,
तो क्या एहसान है कर्ज है जिनका तेरे सिर,
ये उसका मामूली भुगतान है।
माता-पिता के चरण छुए जो, चारधार तीर्थ फल पावे
जो आशीष वह दिल से दे, भगवान से भी ताली न जावे।
माता-पिता को जो तड़पाता है, दर दर के धक्के खाता है
अंत समय सेवक वो प्राणी, सीधा नरक को जाता है।
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माता पिता के लिए कविता

देखते ही देखते जवान,
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते हैं…
सुबह की सैर में,
कभी चक्कर खा जाते है,
सारे मौहल्ले को पता है,
पर हमसे छुपाते है…
दिन प्रतिदिन अपनी,
खुराक घटाते हैं,
और तबियत ठीक होने की,
बात फ़ोन पे बताते है…
ढीली हो गए कपड़ों,
को टाइट करवाते है,
देखते ही देखते जवान,
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते हैं…
किसी के देहांत की खबर,
सुन कर घबराते है,
और अपने परहेजों की,
संख्या बढ़ाते है,
हमारे मोटापे पे,
हिदायतों के ढेर लगाते है,
“रोज की वर्जिश” के,
फायदे गिनाते है,
‘तंदुरुस्ती हज़ार नियामत’,
हर दफे बताते है,
देखते ही देखते जवान,
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते हैं..
हर साल बड़े शौक से,
अपने बैंक जाते है,
अपने जिन्दा होने का,
सबूत देकर हर्षाते है…
जरा सी बढी पेंशन पर,
फूले नहीं समाते है,
और फिक्स्ड डिपाजिट, रिन्यू करते जाते है…
खुद के लिए नहीं,
हमारे लिए ही बचाते है,
देखते ही देखते जवान,
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते हैं…
चीज़ें रख के अब,
अक्सर भूल जाते है,
फिर उन्हें ढूँढने में,
सारा घर सर पे उठाते है…
और एक दूसरे को,
बात बात में हड़काते है,
पर एक दूजे से अलग,
भी नहीं रह पाते है…
एक ही किस्से को,
बार बार दोहराते है,
देखते ही देखते जवान,
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते हैं…
चश्में से भी अब,
ठीक से नहीं देख पाते है,
बीमारी में दवा लेने में,
नखरे दिखाते है…
एलोपैथी के बहुत सारे,
साइड इफ़ेक्ट बताते है,
और होमियोपैथी/आयुर्वेदिक की ही रट लगाते है..
ज़रूरी ऑपरेशन को भी,
और आगे टलवाते है.
देखते ही देखते जवान
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते हैं..
उड़द की दाल अब,
नहीं पचा पाते है,
लौकी तुरई और धुली मूंगदाल,
ही अधिकतर खाते है,
दांतों में अटके खाने को,
तिली से खुजलाते हैं,
पर डेंटिस्ट के पास,
जाने से कतराते हैं,
“काम चल तो रहा है”,
की ही धुन लगाते है..
देखते ही देखते जवान,
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते हैं..
हर त्यौहार पर हमारे,
आने की बाट देखते है,
अपने पुराने घर को,
नई दुल्हन सा चमकाते है..
हमारी पसंदीदा चीजों के,
ढेर लगाते है,
हर छोटी बड़ी फरमाईश,
पूरी करने के लिए,
माँ रसोई और पापा बाजार,
दौडे चले जाते है..
पोते-पोतियों से मिलने को,
कितने आंसू टपकाते है..
देखते ही देखते जवान,
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते है…
देखते ही देखते जवान,
“माँ-बाप” बूढ़े हो जाते है…

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