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विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर भाषण 2018 – World Mental Health Day Speech in Hindi & English Pdf Download

World Mental Health Day 2018: बहुत से ऐसे तथ्य होते हैं जो एक खुशहाल जीवन को परिभाषित करते हैं, लेकिन उनमे सबसे महवपूर्ण है मानसिक स्वास्थ्य | मान लीजिये आपके पास हर तरह की ख़ुशी है अच्छे दोस्त, अच्छा परिवार और साथ ही अच्छा पैसा भी, मगर ये सब बेकार है अगर आप फिर भी कहीं न कहीं मानसिक तनाव लेते हैं | इसीलिए 1992 मैं रिचर्ड हंटर द्वारा मानसिक स्वस्थ के बारे में लोगों को जागरूक करके के उद्देश्य से यह दिन मानसिक स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है | 10 October World Mental Health Day Speech in Hindi की जानकारी आपको हिंदी, इंग्लिश, बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलगु, आदि की जानकारी देंगे जिसे आप अपने स्कूल के स्पीच प्रतियोगिता, कार्यक्रम या भाषण प्रतियोगिता में प्रयोग कर सकते है| ये स्पीच कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए दिए गए है|

Speech on world mental health day in Hindi

World mental health day 2018 theme: इस साल वर्ल्ड मेन्टल हेल्थ डे २०१८ थीम है “Young people and mental health in a changing world” यानी की एक बदलती दुनिया में युवा लोग और मानसिक स्वास्थ्य| बहुत से लोग साथ ही यह भी जानना चाहते हैं की विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस कब मनाया जाता है| दोस्तों यह दिवस हर वर्ष 10 अक्टूबर को मनाया जाता हैं| इस साल यह दिन बुधवार को मनाया जाएगा|

मनोचिकित्सकों की राय में जब किसी व्यक्ति की भावनाएँ, विचार अथवा व्यवहार दूसरे लोगों के लिए समस्या बन जाए तो यह उस व्यक्ति के मानसिक बीमारी से ग्रस्त होने के लक्ष्ण हो सकते हैं लेकिन समुचित जानकारी के अभाव में लोग इस ओर ध्यान नहीं देते जिससे समस्या गंभीर रूप धारण कर लेती है।
मानसिक बीमारी होने का कारण दिमाग में ‘केमिकल इंबैलेंस’ होने की बात कहते हुए मनोचिकित्सक डॉक्टर समीर पारेख ने कहा, ‘ जब तक समस्या बड़ी न हो तब तक लोगों का ध्यान मानसिक बीमारियों की ओर नहीं जाता। इसे संबंधित व्यक्ति की आदत समझकर लोग  नजरअंदाज कर देते है जबकि कुछ लोग मानसिक बीमारी को पागलपन समझ बैठते हैं ।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आँकड़ों पर गौर करे तो दुनियाभर में करीब 45 करोड़ व्यक्ति मानसिक बीमारी या तंत्रिका संबंधी समस्याओं से ग्रस्त हैं। डाइग्नोस्टिक एण्ड स्टैटिस्टिकल मैनुअल आफ मेंटल डिसआर्डर्स के नवीनतम अंक में इस प्रकार की मानसिक बीमारियों का जिक्र किया गया है और साथ में यह भी कहा गया है कि मनोचिकित्सकों के लिए आज भी यह पता लगाना एक चुनौती है कि अगर कोई व्यक्ति मानसिक बीमारी से ग्रस्त है तो उसकी बीमारी आखिर क्या है।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर भाषण
पारेख के मुताबिक आज मानसिक बीमारियों की पहचान करना मुश्किल नहीं रह गया है क्योंकि इस दिशा में विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है। समय रहते सही मनोचिकित्सक के पास जाने से इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है और उसके दुष्प्रभाव सामने आने से पहले ही उसका इलाज किया जा सकता है। मनोचिकित्सक डॉ. अमित के मुताबिक मानसिक रोगियों के लक्षण आसानी से दिखाई नहीं देते हैं।
मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति में दिमागी विकार होता है और उनकी स्थिति पर कोई नियंत्रण नहीं रहता। कुछ सामान्य मानसिक समस्याएँ है जैसे स्वलीनता,मानसिक बाधा, प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात ‘सेरेब्रल पलसी’, सीखने में बाधा, चिंता विकार आदि। कुछ लोग मानसिक विकार के साथ ही जन्म लेते हैं जबकि बहुत से लोग दुर्घटना, आघात, गंभीर बीमारी समेत कई कारणों से मानसिक समस्याओं से पीड़ित हो जाते हैं।

इन चिकित्साओं से इतर अगर योग प्रणाली के माध्यम से मानसिक संतुलन बनाने की बात करें तो योग शिक्षक सिद्धार्थ कुमार के मुताबिक प्रणायाम करने से मस्तिष्क के दोनों गोलार्ध में संतुलन बनता है जो हमारी विचार करने की शक्ति एवं भावनाओं में समन्वय लाता है। विश्व स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य के बारे में लोगों को जागरूक और शिक्षित बनाने के उद्देश्य से प्रत्येक दस अक्टूबर को ‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है। इसकी शुरूआत विश्व मानसिक स्वास्थ्य परिसंघ ने की थी तथा पहली बार इसे 1992 में मनाया गया था।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस स्पीच

अक्सर class 1, class 2, class 3, class 4, class 5, class 6, class 7, class 8, class 9, class 10, class 11, class 12 के बच्चो को कहा जाता है वर्ल्ड टूरिज्म डे पर स्पीच लिखें| आइये अब हम आपको विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर स्पीच, World Mental Health Day Quotes, World Mental Health Day 2018 logo, speech on mental health in hindi व वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे स्पीच की जानकारी (speech recitation activity) निश्चित रूप से आयोजन समारोह या बहस प्रतियोगिता (debate competition) यानी स्कूल कार्यक्रम में स्कूल या कॉलेज में भाषण में भाग लेने में छात्रों की सहायता करेंगे। इन विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर हिंदी स्पीच, हिंदी में 100 words, 150 words, 200 words, 400 words जिसे आप pdf download भी कर सकते हैं|

‘विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस’ विश्व में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने और मानसिक स्वास्थ्य के सहयोगात्मक प्रयासों को संगठित करने के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 10 अक्टूबर को मनाया जाता है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य संघ (वर्ल्ड फेडरेशन फॉर मेंटल हेल्थ) ने विश्व के लोगों के मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को यथार्थवादी बनाने के लिए वर्ष 1992 में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की स्थापना की थी।

मानसिक विकार विश्व में रुग्ण-स्वास्थ्य और विकलांगता उत्पन्न करने वाला प्रमुख कारण हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार 450 मिलियन लोग वैश्विक स्तर पर मानसिक विकार से पीड़ित हैं। विश्व में चार व्यक्तियों में से एक व्यक्ति जीवन के किसी मोड़ पर मानसिक विकार या तंत्रिका संबंधी विकारों से प्रभावित है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित दस से उन्नीस वर्ष की उम्र के व्यक्तियों की वैश्विक रोग भार में सौलह प्रतिशत हिस्सेदारी है। विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस वर्ष 2018 “विश्व के बदलते परिदृश में वयस्क और मानसिक स्वास्थ्य” पर केंद्रित है।

किशोरावस्था और वयस्कता के शुरुआती वर्ष जीवन का वह समय होता है, जब कई बदलाव होते हैं, उदाहरण के लिए स्कूल बदलना, घर छोड़ना तथा कॉलेज, विश्वविद्यालय या नई नौकरी शुरू करना। कई लोगों के लिए ये रोमांचक समय होता हैं तथा कुछ मामलों में यह तनाव और शंका का समय हो सकता है। कई लाभों के साथ ऑनलाइन प्रौद्योगिकियों का बढ़ता उपयोग इस आयु वर्ग के लोगों के लिए अतिरिक्त दबाव भी लाया है, हालांकि यदि इसे पहचाना और प्रबंधित नहीं किया जाता है, तो यह तनाव मानसिक रोग उत्पन्न कर सकता है।

वयस्कों में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं:

सभी मानसिक रोगों में से आधे चौदह वर्ष की उम्र तक शुरू होते है, लेकिन अधिकांश मामले रोग की जानकारी और उपचार के बिना रह जाते है। किशोरों में रोग भार के संदर्भ में अवसाद तीसरा प्रमुख कारण है। आत्महत्या पंद्रह से उनतीस वर्षीय लोगों के बीच मृत्यु का दूसरा प्रमुख कारण है। किशोरों में अल्कोहल और मादक पदार्थों का हानिकारक उपयोग कई देशों में एक प्रमुख समस्या है तथा यह असुरक्षित यौन संबंध या खतरनाक ड्राइविंग जैसा ज़ोखिमपूर्ण व्यवहार उत्पन्न करता है। आहार विकार भी चिंता का विषय हैं। यदि उपचार नहीं किया जाता है, तो ये स्थितियां बच्चों के विकास, शिक्षा प्राप्ति तथा उनकी जीवन अपेक्षाएँ पूरी करने और जीवन उत्पादकता की क्षमता को प्रभावित करती हैं।

बेहतर समझ से रोकथाम की शुरूआत:

भारत में लगभग 356 मिलियन लोग दस से चौबीस वर्ष की आयु के बीच हैं; भारत, लगभग तीस प्रतिशत युवा जनसंख्या के साथ युवाओं का देश है। किशोरों और वयस्कों के बीच मानसिक परेशानी की रोकथाम और प्रबंधन की शुरूआत जागरूकता बढ़ाकर और मानसिक रोग के प्रारंभिक चेतावनी संकेतों और लक्षणों को समझकर कम उम्र से की जानी चाहिए।

अभिभावक (माता-पिता) और शिक्षक घर एवं स्कूल में रोजमर्रा की चुनौतियों का मुक़ाबला करने में सहयोग के लिए बच्चों और किशोरों के जीवन कौशल निर्माण करने में मदद कर सकते हैं जैसे कि सामाजिक कौशल, समस्या सुलझाने का कौशल और आत्मविश्वास बढ़ाना। प्रयास संसाधन और सेवाएं उत्पन्न और विकसित करने पर केंद्रित होना चाहिए, जो कि वयस्कों को सशक्त और जुड़ा महसूस होने में सहयोग करता हैं। मनोवैज्ञानिक सहयोग स्कूलों और अन्य सामुदायिक स्तरों पर प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा प्रदान किया जा सकता है जो कि मानसिक स्वास्थ्य विकारों का पता लगा सकते हैं तथा उन्हें प्रबंधित कर सकते हैं। किशोरावस्था स्वास्थ्य को प्रोत्साहित और संरक्षित करने से न केवल किशोर स्वास्थ्य को, बल्कि समाज और देश को भी लाभ होता है क्योंकि इससे ‘स्वस्थ युवा’ जनबल, परिवार और समुदाय तथा समाज में अधिक योगदान करने में सक्षम बनता हैं।

मानसिक स्वास्थ्य को सहयोग करने के लिए राष्ट्रीय गतिविधियां:

राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम*: भारत सरकार ने जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम-मुख्य कार्यान्वयन इकाई से सबके लिए न्यूनतम मानसिक स्वास्थ्य देखभाल की उपलब्धता और पहुंचनीयता सुनिश्चित करने के लिए वर्ष 1982 में राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनएमएचपी) की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को एकीकृत करना और सामुदायिक स्वास्थ्य देखभाल की ओर बढ़ना है।

10 अक्टूबर वर्ष 2014 को राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति की घोषणा की गयी तथा भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मज़बूत करने के लिए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 लाया गया। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के अंतर्गत किशोरावस्था प्रजनन और यौन स्वास्थ्य कार्यक्रम (एआरएसएच) वयस्कों से संबंधित विभिन्न स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करता है। भारत सरकार के कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम हैं तथा राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न पहलें और राष्ट्रीय योजनाएं (राष्ट्रीय सामाजिक सेवा योजना, नेहरू युवा केंद्र संगठन, राष्ट्रीय युवा नीति वर्ष 2014) हैं, जो कि युवाओं के सकारात्मक विकास के लिए कार्यों की रूपरेखा तैयार करती हैं।

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस भाषण

तनावग्रस्त जीवनशैली में बिगड़ने मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए इसके प्रति जागरूकता उत्पन्न करने और इससे बचने के उपायों पर विचार करने के उद्देश्य से हर साल 10 अक्टूबर को पूरे विश्व में विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पूरे विश्व में सरकारी और सामाजिक संगठनों द्वारा तनावमुक्ति विषय पर कार्यक्रम आयाजित किए जाते हैं। विकास की दौड़ में भागती जीवनशैली से उपजे तनाव के प्रति चिंता व्यक्त कर, उससे बचने और दूर करने के बारे में विचार विमर्श किया जाता है। साथ ही इसके प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए कई तरह के आयोजन किए जाते हैं।

मानसिक रोगियों के रोग लक्षण आसानी से दिखाई नहीं देते हैं। मानसिक अशक्तता से पीड़ित व्यक्तियों को दिमागी विकार होता है तथा उनका अपनी स्थिति पर कोई नियंत्रण नहीं होता। कुछ सामान्य मानसिक समस्याएं हैं—स्वलीनता, मानसिक बाधा, प्रमस्तिष्कीय पक्षाघात (सेरेब्रल पाल्सी), सीखने में बाधा, चिन्ता विकार और अन्यमनस्कता (शाइजोफ्रेनिया)। कुछ लोग मानसिक विकार सहित जन्म लेते हैं, जबकि बहुत से दुर्घटनाओं, आघात, गंभीर बीमारी व वृद्धावस्था के कारण मानसिक समस्याओं से पीड़ित होते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत 36 प्रतिशत की अवसाद दर के साथ दुनिया के सर्वाधिक अवसादग्रस्त देशों में से एक है. अर्थात भारत में मानसिक अवसाद से पीड़ित लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है. मानव संसाधन के लिहाज से ऐसे आंकड़े किसी भी देश के लिए अच्छे नहीं कहे जाएंगे, जहां हर चार में से एक महिला और दस में से एक पुरुष मानसिक रोग से पीड़ित हो. इसकी पुष्टि मानसिक अवसाद रोधी दवाओं के बढ़ते कारोबार से भी हो रही है.

1982 में भारत सरकार ने राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य देश में मानसिक रोगियों की बढ़ रही संख्या के हितार्थ, मानसिक स्वास्थ्य देखभाल के लिए उपलब्ध आधारभूत रूपरेखा का विस्तार करना था।
फिलहाल मानसिक स्वास्थ्य सेवा विधेयक, 2013 अभी संसद में लंबित है. इस विधेय क में ऐसे रोगियों की देखभाल और उनसे संबंधित अधिकारों का प्रावधान है.
इसके अलावा देश में 8,500 मनोचिकित्सकों और 6,750 मनोवैज्ञानिकों की कमी है. इसके अतिरिक्त 2,100 योग्य नर्सों की भी कमी है |

मानसिक स्वास्थ्य सेवा विधेयक, 2013

8 अगस्त, 2016 को राज्यसभा ने मानसिक स्वास्थ्य सेवा विधेयक, 2013 को 134 संशोधनों के साथ पारित कर दिया था।
इसका उद्देश्य मानसिक रोगियों के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित करने के अलावा बेहतर चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराना है।
इस विधेयक के अनुसार, भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 309 के तहत आत्महत्या की कोशिश करने वाला कोई व्यक्ति तब तक अपराधी नहीं माना जाएगा, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि आत्महत्या की कोशिश करते समय वह मानसिक रूप से स्वस्थ था|
विधेयक में सामुदायिक आधारित उपचार पर जोर दिया गया है, जबकि महिलाओं के लिए अलग से प्रावधान किए गए हैं।
इस विधेयक में मानसिक बीमारी को परिभाषित किया गया है, साथ ही साइको सर्जरी पर रोक लगाने का भी प्रावधान किया गया है।

देश की पहली मानसिक स्वास्थ्य नीति

देश में अक्तूबर 2014 से पूर्व मानसिक स्वास्थ्य नीति का कोई अस्तित्व नहीं था. 10 अक्टूबर 2014 को तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन ने मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति और राष्ट्रीय स्वास्थ्य आश्वासन मिशन (एनएचएएम) में पर्याप्त महत्व देने की घोषणा करते हुए भारत की पहली मानसिक स्वास्थ्य नीति की शुरुआत की।

इस नीति का उद्देश्य सभी स्तरों पर मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समझ बढ़ाना तथा मानसिक स्वास्थ्य क्षेत्र में नेतृत्व को सुदृढ़ करके मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक व्यापक पहुँच प्रदान करना है।
यह नीति गरीबों के अनुकूल है क्योंकि वर्तमान में भारत में केवल समाज के उच्च वर्ग की ही मानसिक स्वास्थ्य देखभाल तक पहुँच है।
इस नीति का उद्देश्य मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्तियों पर दोष मढ़ने के खिलाफ जागरुकता उत्पन्न करने तथा अवसाद, सीजोफ्रेनिया, बाईपोलर सिंड्रोम आदि से पीड़ित व्यक्तियों के लक्षणों को स्पष्ट करने और उपचारात्मक सुविधाएं प्रदान करने का है|
यह नीति मानसिक स्वास्थ्य कार्य योजना 365 द्वारा समर्थित है।
इसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, स्थानीय निकायों एवं सिविल सोसायटी संगठनों द्वारा निभाई जाने वाली विशेष भूमिकाओं का स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है।
विदित हो कि मानसिक रूप से बीमार लोगों की देखभाल के लिए बनाए गए पूर्व कानून, जैसे-भारतीय पागलखाना अधिनियम, 1858 और भारतीय पागलपन अधिनियम, 1912 में मानवाधिकार के पहलू की उपेक्षा की गई थी और केवल पागलखाने में भर्ती मरीजों पर ही विचार किया गया था। आजादी के बाद भारत में इस संबंध में पहला कानून बनाने में 31 वर्ष का समय लगा और उसके 9 वर्ष के उपरांत मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 अस्तित्व में आया। परंतु इस अधिनियम में कई खामियां होने के कारण इसे किसी राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश में लागू नहीं किया जा सका।

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