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Swami shankaracharya Biography – Swami shankaracharya Jayanti

Swami shankaracharya Jayanti

शंकराचार्य जयंती 2019: आदि शंकर एक भारतीय दार्शनिक और धर्मशास्त्री थे जिन्होंने अद्वैत वेदांत के सिद्धांत को उजागर किया। उन्होंने बहुत कम उम्र में सांसारिक सुखों को त्याग दिया। शंकराचार्य ने प्राचीन V अद्वैत वेदांत ’की विचारधारा को समाहित किया और उपनिषदों के मूल विचारों को भी समझाया। उन्होंने हिंदू धर्म की सबसे पुरानी अवधारणा की वकालत की जो सर्वोच्च आत्मा (निर्गुण ब्राह्मण) के साथ आत्मा (आत्मान) के एकीकरण की व्याख्या करती है।

स्वामी शंकराचार्य का जीवन परिचय

शंकर, जैसा कि वह एक महान शिक्षक बनने से पहले जाने जाते थे, कादड़ी, वर्तमान भारत के केरल में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में पैदा हुए थे। उनके माता-पिता, शिवगुरु और आर्यम्बा ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे देवता से एक बच्चे को आशीर्वाद देने का अनुरोध करें। उनकी प्रार्थनाओं का जवाब जल्द ही एक बच्चे के रूप में दिया गया। कुछ सिद्धांतों से पता चलता है कि आर्यम्बा का एक सपना था जिसमें भगवान शिव ने स्वयं उसे वचन दिया था कि वह उसके बच्चे के रूप में जन्म लेगी। इसलिए, कई लोग शंकर को शिव का पुनर्जन्म मानते हैं। शंकर को उनकी मां ने शिक्षित किया था क्योंकि उन्होंने अपने पिता को खो दिया था जब वह सिर्फ सात साल के थे। आर्यम्बा ने वेदों और उपनिषदों को एक युवा शंकर को पढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

Swami shankaracharya birth

अपने प्रारंभिक जीवन के दौरान, शंकर ने अपनी ज्ञान बुद्धि से कई लोगों को चकित किया। उन्होंने छोटी उम्र में ही उपनिषदों, ब्रह्म सूत्रों और भगवद् गीता का अपना विश्लेषण लिखना शुरू कर दिया था। बचपन से ही वह संन्यासी बनने का इच्छुक था। हालाँकि उनके भिक्षु बनने के विचार का उनकी माँ ने विरोध किया था, लेकिन शंकर को पता था कि उन्हें क्या करना है। एक बार वह अपनी माँ के साथ पास की एक नदी पर गया और नदी में डुबकी लगाई। अचानक, नदी के नीचे से एक मगरमच्छ दिखाई दिया और उसके पैर को पकड़ लिया। शंकर ने फिर अपनी माँ को पुकारते हुए कहा कि एक मगरमच्छ उसे नदी में खींच रहा था। जब उनकी मां ने असहाय महसूस किया, तो शंकरा ने उन्हें एक भिक्षु के रूप में मरने की अनुमति देने का आग्रह किया।

Swami shankaracharya story in hindi

Swami shankaracharya Biography

आदि शंकराचार्य प्राचीन ग्रंथों पर अपनी शानदार टिप्पणियों के लिए प्रसिद्ध हैं। ‘ब्रह्म सूत्र’ की उनकी समीक्षा को ‘ब्रह्मसूत्रभाष्य’ के रूप में जाना जाता है, और यह ‘ब्रह्म सूत्र’ की सबसे पुरानी जीवित टिप्पणी है। इसे उनका सबसे अच्छा काम भी माना जाता है। उन्होंने भगवद गीता, और दस प्रमुख उपनिषदों पर भाष्य भी लिखे। आदि शंकराचार्य अपने ’स्तोत्र’ (कविताओं) के लिए भी प्रसिद्ध हैं। उन्होंने देवी-देवताओं की प्रशंसा करते हुए कई कविताओं की रचना की। कृष्ण और शिव को समर्पित लोगों को उनके ‘स्तोत्रों’ में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने प्रसिद्ध आदेश उपदेसाहाश्री ’की रचना की, जिसका शाब्दिक अर्थ एक हजार उपदेशों से है।‘ ’उपदसासहस्री’ उनके सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक कार्यों में से एक है।

शंकराचार्य के प्रवचन

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यह परम सत्य है की लोग आपको उसी समय
तक याद करते है जब तक आपकी सांसें चलती हैं
. इन सांसों के रुकते ही आपके क़रीबी रिश्तेदार,
दोस्त और यहां तक की पत्नी भी दूर चली जाती है.

सत्य की कोई भाषा नहीं है. भाषा तो सिर्फ
मनुष्य द्वारा बनाई गई है लेकिन सत्य
मनुष्य का निर्माण नहीं, आविष्कार है.
सत्य को बनाना या प्रमाणित नहीं करना पड़ता.

जब मन में सत्य जानने की जिज्ञासा पैदा
हो जाती है तब दुनिया की बाहरी
चीज़े अर्थहीन लगती हैं.

हर व्यक्ति को यह ज्ञान होना चाहिए कि आत्मा
एक राज़ा के समान होती है जो शरीर, इन्द्रियों
, मन, बुद्धि से बिल्कुल अलग होती है.
आत्मा इन सबका साक्षी स्वरुप है.

तीर्थ करने के लिए किसी जगह जाने की
जरूरत नहीं है. सबसे बड़ा और अच्छा तीर्थ
आपका अपना मन है जिसे विशिष्ट
रूप से शुद्ध किया गया हो.

मोह से भरा हुआ इंसान एक सपने कि तरह हैं,
यह तब तक ही सच लगता है जब तक वह
अज्ञान की नींद में सो रहे होते है. जब उनकी
नींद खुलती है तो इसकी कोई सत्ता नही रह जाती है.

अज्ञानता के कारण आत्मा सीमित लगती
है लेकिन जब अज्ञान का अंधेरा मिट जाता
है तब आत्मा के वास्तविक स्वरुप का
ज्ञान हो जाता है. जैसे बादलों के हट
जाने पर सूर्य दिखाई देने लगता है.

आत्मसंयम क्या है ? आंखो को दुनिया की
चीज़ों की ओर आकर्षित न होने देना
और बाहरी तत्वों को खुद से दूर रखना.

जिस तरह किसी दीपक को चमकने के लिए
दूसरे दीपक की ज़रुरत नहीं होती है ठीक
उसी तरह आत्मा को जो खुद ज्ञान का स्वरूप
है उसे और क़िसी ज्ञान कि आवश्यकता नही होती है.

सत्य की परिभाषा क्या है ? सत्य की बस इतनी
ही परिभाषा है की जो सदा था, जो
सदा है और जो सदा रहेगा.

उस समय धर्म की किताबे पढ़ने का कोई
मतलब नहीं जब तक आप सच का पता
न लगा पाए, इसी तरह से अगर आप
सच जानते है तो धर्मग्रंथ पढ़ने कि कोई जरूरत नहीं हैं.

हमें आनंद तभी मिलता है जब हम
आनंद कि तलाश नही कर रहे होते है.

मंदिर में वही पहुंचता है जो धन्यवाद
देने जाता हैं, धन्यवाद मांगने नहीं.