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Short Essay on Guru Hargobind Ji – Guru Hargobind Ji Jayanti Essay in Hindi Pdf download

Short essay on Hargobind Ji Jayanti

Guru Hargobind Ji Jayanti 2019: गुरु हरगोबिंद साहिब जी सिखों के छठे गुरु हैं। वे गुरु अर्जन देव जी के इकलौते पुत्र थे। उनका जन्म 19 जून, 1595 को अमृतसर के पास गुरु की वडाली में हुआ था। उन्होंने बाबा बुड्ढा जी से मार्शल आर्ट और आध्यात्मिकता में प्रशिक्षण प्राप्त किया| आध्यात्मिक और लौकिक मामलों की अविभाज्यता के विचार को स्थापित करने के लिए जिम्मेदार, छठे गुरु ने गरीबों की रक्षा और अत्याचारियों को नष्ट करने के उद्देश्य से एक सेना को बनाए रखा। उन्होंने अमृतसर में स्वर्ण मंदिर से सिख धर्म में लौकिक मामलों के केंद्र अकाल तख्त साहिब का निर्माण किया।

Guru Hargobind Ji Jayanti essay in english

Guru Hargobind Sahib was born in 1595 in Wadali Guru, a village 7 km west of Amritsar,[1][8] the only son of Guru Arjun Dev, the fifth Sikh Guru. He suffered from smallpox as a child and survived a poisoning attempt by a pandit(unknown), as well as another attempt on his life, when a cobra was thrown at him. He studied religious texts with Bhai Gurdas and trained in swordsmanship and archery with Baba Budda (not to be confused with the Buddha).[1]

On 25 May 1606 Guru Arjan selected Guru Hargobind Sahib as his successor and instructed his son to start a military tradition to protect people and always keep himself surrounded by armed Sikhs for protection.[9] Shortly afterwards, Guru Arjun was arrested, tortured and martyred by order of the Mughal Emperor Jahangir,[9][10] Guru Hargobind’s succession ceremony took place on 24 June 1606.[5][8] He put on two swords: one indicated his spiritual authority (piri) and the other, his temporal authority (miri).[5][11] He followed his martyred father’s advice and always kept himself surrounded by armed Sikhs for protection. The number fifty-two was special in his life, and his retinue consisted of fifty-two armed men.[1] He thus founded the military tradition in the Sikh faith.[5][9]

Guru Hargobind had three wives: Damodari, Nanaki and Mahadevi.[1][12] He had children from all three wives. Two of his eldest sons from the first wife died during his lifetime. Guru Tegh Bahadur, his son from Mata Nanaki, became the ninth Sikh Guru.[13]

The Guru was a martial artist (shastarvidya), an avid hunter and, according to Persian records, unlike earlier Gurus, he and the Sikh Gurus that followed him were meat eaters.[14] Guru Hargobind encouraged people to maintain physical fitness and keep their bodies ready for physical combat. He had his own Darbar (court). The arming and training of some of his devoted followers began. The Guru came to possess seven hundred horses and his Risaldari (army) grew to three hundred horsemen and sixty musketeers.[14]

Short essay on Hargobind Ji Jayanti

Guru Hargobind Ji Jayanti essay in english

श्री गुरु हरगोबिन्द साहिब जी सिक्खों के छठे Guru Hargobind Jiगुरु थे । आप को बंदी छोड़ और सच्चे पातशाह के नाम से भी जाना जाता है। आप तीर अंदाजी और शास्त्र कला में बड़े ही निपुन थे। श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी का जन्म 19 जून 1595 ईस्वी को ज़िला अमृतसर के बढाली गांब में हुआ था। श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी को माता- पिता का अथाह स्नेह मिला। जब श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी (Guru Hargobind Sahib Ji) सात वर्ष के हुए तो आपको भाई गुरदास जी के पास शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा गया। इसके साथ ही आपने भाई जेठा जी से शास्त्र विद्द्या प्राप्त की। 1606 ईस्वी में जब श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी 11 वर्ष के थे तब गुरु साहिब ने आपने पिता से गुरगद्दी की उपाधि प्राप्त की।

श्री गुरु अर्जुन देव जी की शहीदी के बाद सिक्खों में एक नया जोश आ गया था। सिक्खों ने मुस्लिम सम्राजय का डट कर सामना किया और एक नई क्रांति को जन्म दिया ।

श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी (Guru Hargobind Sahib Ji) ने मीरी और पीरी नाम की दो तलवारें धारण की। पीरी नाम की तलवार आध्यात्मिक रक्षा के लिए और मीरी नाम की तलवार सैन्य शक्ति के लिए थी। अब सिक्खों की शक्ति और भी बढ़ गई थी।

श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी (Guru Hargobind Sahib Ji) एक शक्तिशाली योद्धा थे और श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने सिक्खों को लड़ने का परीक्षण दिया और तलवार बाज़ी सिखाई। श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने सिक्खों से कहा के सिक्ख योद्धा अपने बचाव के लिए तलवार उठाएगा ना के हमला करने के लिए। श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने सिक्ख धर्म को मज़बूत करने के लिए अपने जीवन में अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये। श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने सिक्खों के लिए अकाल तख़्त का निर्माण किया। श्री गुरु हरगोबिन्द सिंह जी ने सिक्ख धर्म के लिए बहुत सारी लड़ाइयां लड़ी। आप जी ने अपनी अंतिम सांस कीरतपुर में ली।

19 मार्च 1664 ईस्वी को आप ज्योति -ज्योत समा गए।

गुरु हरगोबिंद जी जयंती दिवस निबंध

गुरु हरगोबिंद साहिब का जीवन परिचय (Details of Guru Hargobind)
गुरु हरगोबिंद साहिब सिक्खों के छ्ठे गुरु थे। इनका जन्म 19 जून 1595 को हुआ और इनकी मृत्यु सन् 1644 में हुई। गुरु हरगोबिंद साहिब गुरु अरजन सिंह की इकलौती सन्तान थे। सिख समुदाय को एक सेना के रूप में संगठित करने का श्रेय गुरु हरगोबिंद जी को ही जाता है। इन्होंने सिख कौम को योद्धा-चरित्र प्रदान किया था।

ग़ुरु हरगोबिंद साहिब (Guru Hargobind Sahib Ji)
सन् 1606 में 11 साल की उम्र में ही गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने अपने पिता से गुरु की उपाधि पा ली थी। गुरु अरजन साहिब की शहादत के बाद सिखों के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण पल था जब सिखों ने मुगल साम्राज्य की मनमानी को रोकने के लिए पहली बार गंभीरता से विचार किया था।

गुरु हरगोबिंद साहिब के कार्य (Works of Guru Hargobind Sahib)
गुरु हरगोबिंद साहिब ने शांति और ध्यान में लीन रहने वाली इस कौम को राजनीतिक और आध्यात्मिक दोनों तरीकों से चलाने का फैसला किया। गुरु हरगोबिंद सिंह ने दो तलवारें पहननी शुरू की, एक आध्यात्मिक शक्ति के लिए (पिरी) और एक सैन्य शक्ति के लिए (मिरी)। अब सिखों की भूमिका बढ़कर संत सैनिकों की बन चुकी थी।

गुरु हरगोबिंद जी स्वयं एक शक्तिशाली योद्धा थे और उन्होंने दूसरे सिखों को भी लड़ने का प्रशिक्षण दिया। इस बात को अपना मूल सिद्धान्त बनाया कि एक सिख योद्धा केवल बचाव के लिए तलवार उठाएगा ना कि हमले के लिए। गुरु हरगोबिंद जी ने ही अकाल तख्त का निर्माण भी करवाया। गुरु हरगोबिंद जी ने अपने जीवनकाल में बुनियादी मानव अधिकारों के लिए कई लड़ाइयां लड़ीं।

Guru Hargobind Ji essay in english

Guru Hargobind Sahib Ji is the Sixth Guru of the Sikhs. He was the only son of Guru Arjan Dev Ji. He was born on June 19th, 1595 at Guru Ki Wadali near Amritsar. He got his training in martial arts and spirituality from Baba Budha Ji

Responsible for establishing the idea of inseparability of spiritual and temporal matters, the sixth Guru maintained an army for the purpose of protecting the poor and destroying tyrants. He constructed the Akal Takht Sahib, centre of temporal affairs in the Sikh religion, across from the Golden Temple in Amritsar. By this time, the Sikh community was a full-fledged social, religious, and political entity.

Guru Hargobind Sahib Ji wore two swords of Miri (Temporal Power) and Piri (Spiritual Power) after martyrdom of Guru Arjan Dev Ji. He never allowed the temporal aspect to overpower spiritual aspect of his life. Guru Hargobind Sahib Ji transformed the Sikh saints into saint-soldiers. He gave a fine blend to the powers of Bhakti and Shakti. He called upon the Sikhs to protect human rights and stand for human liberty, equality and fraternity.

Guru Hargobind Sahib Ji built Akal Takht Sahib in proximity of Sri Harmandar Sahib with the help of Baba Budha Ji and Bhai Gurdas Ji. He issued Hukams to the Sikhs to learn martial arts for self-defence. Guru Hargobind Sahib Ji fought many battles against atrocities of the Mughal Empire. He travelled extensively to preach the high limits of Sikhism.

The Guru was arrested and put into Jail at Gawalior by the tyrant Mughals. He is called “Bandi Chhore” as he got 52 princes released from the Gawalior jail of the Mughals. On his release from jail, the residents of Amritsar illuminated Sri Harmandar Sahib Ji and fired crackers in rejoice. Since then, the Diwali festival is celebrated at Amritsar in memory of the Guru Ji.

Out of total life of the Guru Ji, thirty-eight and a half years as pontificate Guru were full of historic events. Battles were thrusted upon him. Guru Hargobind Sahib Ji fought battles at Amritsar, Sri Hargobindpur, Lahira and Kartarpur. Sikh troops carried Nagara and Nishan Sahib Ji’s in the battles during the times of Guru Hargobind Sahib Ji. Guru Hargobind Sahib Ji shifted his head quarters from Amritsar to Kiratpur Sahib to get respite from the daily oppression caused by the Mughal forces.

He left for his heavenly abode on March 2nd, 1644 at Kiratpur Sahib. Guru Har Rai Sahib Ji became the seventh Guru after the eternal rest of his grandfather Guru Hargobind Sahib Ji.

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ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਸਿੱਖਾਂ ਦਾ ਛੇਵੇਂ ਗੁਰੂ ਹਨ. ਉਹ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਦਾ ਇਕਲੌਤਾ ਪੁੱਤਰ ਸੀ. ਉਹ 19 ਜੂਨ 1595 ਨੂੰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਨੇੜੇ ਗੁਰੂ ਕੀ ਵਡਾਲੀ ਵਿਖੇ ਪੈਦਾ ਹੋਇਆ ਸੀ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਬਾਬਾ ਬੁੱਢਾ ਜੀ ਤੋਂ ਮਾਰਸ਼ਲ ਆਰਟਸ ਅਤੇ ਰੂਹਾਨੀਅਤ ਵਿਚ ਆਪਣੀ ਸਿਖਲਾਈ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕੀਤੀ

ਰੂਹਾਨੀ ਅਤੇ ਅਸਥਾਈ ਮਾਮਲਿਆਂ ਦੀ ਅਟੁੱਟਤਾ ਦੇ ਵਿਚਾਰ ਦੀ ਸਥਾਪਨਾ ਲਈ ਜ਼ਿੰਮੇਵਾਰ, ਛੇਵੇਂ ਗੁਰੂ ਨੇ ਗਰੀਬਾਂ ਦੀ ਸੁਰੱਖਿਆ ਅਤੇ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹ ਤਬਾਹ ਕਰਨ ਦੇ ਮਕਸਦ ਲਈ ਇੱਕ ਫੌਜ ਬਣਾਈ ਰੱਖੀ. ਉਸ ਨੇ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ ਦਾ ਨਿਰਮਾਣ ਕੀਤਾ, ਜੋ ਕਿ ਸਿੱਖ ਧਰਮ ਵਿਚ ਅਜੋਕੇ ਦਰਬਾਰ ਵਿਚ ਹੈ. ਇਸ ਸਮੇਂ ਤੱਕ, ਸਿੱਖ ਭਾਈਚਾਰਾ ਇੱਕ ਪੂਰਨ ਸਮਾਜਿਕ, ਧਾਰਮਿਕ ਅਤੇ ਰਾਜਨੀਤਕ ਇਕਾਈ ਸੀ.

ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਦੀ ਸ਼ਹਾਦਤ ਦੇ ਬਾਅਦ ਮੀਰੀ (ਟੈਂਪੋਰਲ ਪਾਵਰ) ਅਤੇ ਪੀਰੀ (ਰੂਹਾਨੀ ਸ਼ਕਤੀ) ਦੀਆਂ ਦੋ ਤਲਵਾਰਾਂ ਪਹਿਨੀਆਂ ਸਨ. ਉਸਨੇ ਆਪਣੇ ਜੀਵਨ ਦੇ ਰੂਹਾਨੀ ਪਹਿਲੂ ਨੂੰ ਉੱਪਰ ਚੁੱਕਣ ਲਈ ਕਦੇ ਵੀ ਸਥਾਈ ਪਹਿਲੂ ਦੀ ਆਗਿਆ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤੀ. ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਸਿੱਖ ਸੰਤਾਂ ਨੂੰ ਸੰਤ ਸੈਨਿਕਾਂ ਵਿਚ ਬਦਲ ਦਿੱਤਾ. ਉਸਨੇ ਭਕਤੀ ਅਤੇ ਸ਼ਕਤੀ ਦੀਆਂ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਦਾ ਜੂਲਾ ਭਰ ਦਿੱਤਾ. ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੇ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਮਨੁੱਖੀ ਅਧਿਕਾਰਾਂ ਦੀ ਰੱਖਿਆ ਕਰਨ ਅਤੇ ਮਨੁੱਖੀ ਆਜ਼ਾਦੀ, ਬਰਾਬਰੀ ਅਤੇ ਭਰੱਪਣ ਲਈ ਖਲੋਣ ਦਾ ਸੱਦਾ ਦਿੱਤਾ.

ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਬਾਬਾ ਬੁੱਢਾ ਜੀ ਅਤੇ ਭਾਈ ਗੁਰਦਾਸ ਜੀ ਦੀ ਮਦਦ ਨਾਲ ਸ੍ਰੀ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਦੇ ਨਜ਼ਦੀਕ ਅਕਾਲ ਤਖ਼ਤ ਸਾਹਿਬ ਬਣਾਇਆ. ਉਸਨੇ ਸਵੈ-ਰੱਖਿਆ ਲਈ ਮਾਰਸ਼ਲ ਆਰਟਸ ਸਿੱਖਣ ਲਈ ਸਿੱਖਾਂ ਨੂੰ ਹੁਕਮ ਜਾਰੀ ਕੀਤੇ. ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਮੁਗ਼ਲ ਸਾਮਰਾਜ ਦੇ ਅਤਿਆਚਾਰਾਂ ਵਿਰੁੱਧ ਬਹੁਤ ਸਾਰੀਆਂ ਲੜਾਈਆਂ ਲੜੀਆਂ. ਉਹ ਸਿੱਖ ਧਰਮ ਦੀਆਂ ਉਚ ਹੱਦਾਂ ਦਾ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਨ ਲਈ ਵਿਆਪਕ ਰੂਪ ਵਿਚ ਯਾਤਰਾ ਕੀਤੀ.

ਗੁਰੂ ਨੂੰ ਗ੍ਰਿਫਤਾਰ ਕਰ ਲਿਆ ਗਿਆ ਅਤੇ ਤਾਨਾਸ਼ਾਹ ਮੁਗਲ ਦੁਆਰਾ ਗਵਾਲੀਅਰ ਵਿਖੇ ਜੇਲ੍ਹ ਵਿਚ ਸੁੱਟ ਦਿੱਤਾ ਗਿਆ. ਉਸ ਨੂੰ “ਬੰਦੀ ਛੋਰੇ” ਕਿਹਾ ਜਾਂਦਾ ਹੈ ਕਿਉਂਕਿ ਉਸ ਨੇ ਮੁਗਲੋਂ ਦੀ ਗਵਾਲਿਯੇਰ ਜੇਲ ਤੋਂ 52 ਮੁਖੀਆਂ ਨੂੰ ਰਿਹਾ ਕੀਤਾ ਸੀ. ਜੇਲ੍ਹ ਵਿੱਚੋਂ ਰਿਹਾ ਕੀਤੇ ਜਾਣ ‘ਤੇ, ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਦੇ ਨਿਵਾਸੀ ਸ੍ਰੀ ਹਰਿਮੰਦਰ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੂੰ ਪ੍ਰਕਾਸ਼ਮਾਨ ਕਰਦੇ ਸਨ ਅਤੇ ਖੁਸ਼ੀ ਵਿਚ ਫਰਾਖਾਰ ਕੱਢੇ ਜਾਂਦੇ ਸਨ. ਉਦੋਂ ਤੋਂ, ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੀ ਯਾਦ ਵਿਚ ਦਿਵਾਲੀ ਦਾ ਤਿਉਹਾਰ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਵਿਖੇ ਮਨਾਇਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ.

ਗੁਰੂ ਜੀ ਦੇ ਕੁਲ ਜੀਵਨ ਵਿਚੋਂ, ਸਾਢੇ ਅੱਠ ਸਾਲ ਪਹਿਲਾਂ ਹੀ ਗੁਰੂ ਜੀ ਇਤਿਹਾਸਿਕ ਘਟਨਾਵਾਂ ਨਾਲ ਭਰੇ ਹੋਏ ਸਨ. ਉਸ ਦੇ ਵਿਰੁੱਧ ਲੜਾਈਆਂ ਦਾ ਜ਼ੋਰ ਪੈ ਗਿਆ ਸੀ ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ, ਸ੍ਰੀ ਹਰਗੋਬਿੰਦਪੁਰ, ਲਹਿਰਾ ਅਤੇ ਕਰਤਾਰਪੁਰ ਵਿਖੇ ਲੜਾਈਆਂ ਲੜੀਆਂ. ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਜ਼ਮਾਨਿਆਂ ਦੌਰਾਨ ਸਿੱਖ ਸੈਨਿਕਾਂ ਨੇ ਨਾਗਰਾ ਅਤੇ ਨਿਸ਼ਾਨ ਸਾਹਿਬ ਦੀ ਲੜਾਈ ਵਿੱਚ ਫੌਜਾਂ ਦੀ ਵਰਤੋਂ ਕੀਤੀ. ਗੁਰੂ ਹਰਿਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਨੇ ਮੁਸਲਮਾਨਾਂ ਦੁਆਰਾ ਕੀਤੇ ਗਏ ਰੋਜ਼ਾਨਾ ਜੁਰਮ ਤੋਂ ਰਾਹਤ ਪਾਉਣ ਲਈ ਅੰਮ੍ਰਿਤਸਰ ਤੋਂ ਕੀਰਤਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਤੱਕ ਆਪਣਾ ਹੈਡ ਕੁਆਰਟਰ ਬਦਲ ਦਿੱਤਾ.

ਉਸ ਨੇ 2 ਮਾਰਚ 1644 ਨੂੰ ਕੀਰਤਪੁਰ ਸਾਹਿਬ ਵਿਚ ਆਪਣੇ ਸਵਰਗੀ ਨਿਵਾਸ ਲਈ ਰਵਾਨਾ ਹੋਏ. ਗੁਰੂ ਹਰਿ ਰਾਏ ਜੀ ਸਾਹਿਬ ਆਪਣੇ ਦਾਦਾ ਗੁਰੂ ਹਰਗੋਬਿੰਦ ਸਾਹਿਬ ਜੀ ਦੇ ਅਰਾਮ ਲਈ ਬਾਕੀ ਰਹਿੰਦੇ ਸੱਤਵੇਂ ਗੁਰੂ ਬਣੇ.

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