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कबीर जयंती स्पीच 2018 – Kabir Das Jayanti Essay in Hindi – Sant Guru Kabir Jayanti Speech in Hindi Pdf Download

कबीर जयंती पर निबंध 2018: संत कबीर दास हमारे देश बहरत के महान संत थे। यही नहीं वे भारत के सबसे बड़े कवियों में से भी एक थे। उनका जन्म 1440 के वर्ष में हुआ था। वह मुस्लिम बुनकरों के बहुत कम आय वाले परिवार से थे। वह बहुत आध्यात्मिक व्यक्ति थे और एक महान साधु बन गए। उनका मानना था कि मनुष्य बराबर हैं और भगवान के साथ प्राणियों को प्रत्येक व्यक्ति का अंतिम उद्देश्य है। आज हुनकी जयंती पर हम उन्हें नमन करते है| आइये देखें कुछ कबीर जयंती पर निबंध, कबीर दास जयंती पर स्पीच फॉर स्कूल, kabir jayanti speech, kabir jayanti ki badhai, कबीर जयंती इन हिंदी, कबीर जयंती स्पीच, कबीर जयंती पर भाषण आदि |

कबीर जयंती कब है

Sant Guru Kabir Jayanti को पूरे भारत में 28 जून 2018 को मनाया जाएगा| इस दिन गुरूवार का दिन है|

Kabir Das jayanti speech

अक्सर छोटे बच्चो Kids को स्कूलों में संत कबीर दास जयंती के बारे में लिखना होता है (कबीर दास जयंती के ऊपर दस लाइन लिखें ) पढ़ाया जाता है तथा उसमे हर क्लास के बच्चे in hindi for class 1, class 2, class 3, class 4, class 5, class 6, class 7, class 8, class 9, class 10, class 11 और class 12 इस तरह से इंटरनेट पर सर्च करते है व स्कूलों के प्रोग्राम व कम्पटीशन में भाग लेते है| ऊपर दी हुई जानकारी में शामिल है इन निबंधों में शामिल है लेख एसेज, anuched, short paragraphs, pdf, wikipedia, Composition, Paragraph, Article हिंदी, निबन्ध (Nibandh). आप यहाँ से कबीर जयंती पर हिंदी स्पीच हिंदी में 100 words, 150 words, 200 words, 400 words जिसे आप pdf download भी कर सकते हैं| साथ ही देखें कबीर के दोहे इन हिंदी अर्थ सहित

‘कबीरदास’ का जन्म सन 1398 ई० में काशी में हुआ था। कबीर के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। इनके जन्म के विषय में यह प्रचलित है कि इनका जन्म स्वामी रामानन्द के आशीर्वाद से एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था जो लोक-लाज के दर से इन्हें ‘लहरतारा’ नामक तालाब के पास फेंक आई। संयोगवश नीरू और नीमा नामक जुलाहा दम्पति को ये मिले और उन्होंने इनका पालन-पोषण किया।

कबीर की शिक्षा-दीक्षा का अच्छा प्रबंध न हो सका। ये अनपढ ही रहे। इनका काम कपड़े बुनना था। ये जुलाहे का काम करते थे परन्तु साथ ही साथ साधु संगति और ईश्वर के भजन चिंतन में भी लगे रहते थे। इनका विवाह ‘लोई’ नामक स्त्री से हुआ था। इनके ‘कमाल’ नामक एक पुत्र और ‘कमाली’ नामक एक पुत्री थी।

कबीरदास ने अपना सारा जीवन ज्ञान देशाटन और साधु संगति से प्राप्त किया। ये पढ़े-लिखे नहीं थे परन्तु दूर-दूर के प्रदेशों की यात्रा कर साधु-संतों की संगति में बैठकर सम्पूर्ण धर्मों तथा समाज का गहरा अध्ययन किया। अपने इस अनुभव को इन्होने मौखिक रूप से कविता में लोगों को सुनाया।

कबीरदास का जन्म ऐसे समय में हुआ था जब कि हमारे देश में चारों तरफ अशांति और अव्यवस्था का बोलबाला था। विदेशी आक्रमणों से देश की जनता पस्त थी। अनेक धर्म और मत-मतान्तर समाज में प्रचलित थे। आर्थिक दशा बड़ी दयनीय थी। ऐसे कठिन समय में जन्म लेकर इस युग दृष्टा महान संत ने देश की जनता को एक नया ज्ञान का ज्योतिर्मय मार्ग दिखाया।

कबीरदास निर्गुण ब्रह्म के उपासक थे। उनका मत था कि ईश्वर समस्त संसार में व्याप्त है। उन्होंने ब्रह्म के लिए राम, हरि आदि शब्दों का प्रयोग किया परन्तु वे सब ब्रह्म के ही पर्यायवाची हैं। उनका मार्ग ज्ञान मार्ग था। इसमें गुरु का महत्त्व सर्वोपरि है। कबीर स्वच्छंद विचारक थे। उन्होंने समाज में व्याप्त समस्त रूढ़ियों और आडम्बरों का विरोध किया।

कबीरदास की मृत्यु स्थान के विषय में भी लोगों में मतभेद है। भिन्न-भिन्न लोग पुरी, मगहर और रतनपुर (अवध) में इनकी मृत्यु हुई मानते हैं परन्तु अधिकाँश विद्वान मगहर को ही इनका मृत्यु स्थान मानने के पक्ष में हैं। इनकी मृत्यु सन 1495 ई० के लगभग मानी जाती है।

कबीदास की रचनाओं को उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र तथा शिष्यों ने ‘बीजक’ के नाम से संग्रहीत किया। इस बीजक के तीन भाग हैं– (1) सबद (2) साखी (3) रमैनी। बाद में इनकी रचनाओं को ‘कबीर ग्रंथावली’ के नाम से संग्रहीत किया गया। कबीर की भाषा में ब्रज, अवधी, पंजाबी, राजस्थानी और अरबी फ़ारसी के शब्दों का मेल देखा जा सकता है। उनकी शैली उपदेशात्मक शैली है।

कबीर हिंदी साहित्य के महिमामण्डित व्यक्तित्व हैं। उन्होंने हिन्दू मुस्लिम एकता का निरंतर प्रयास किया। हिंदी साहित्य जगत में उनका विशिष्ट स्थान है। अशिक्षित होते हुए भी उन्होंने जनता पर जितना गहरा प्रभाव डाला है, उतना बड़े-बड़े विद्वान भी नहीं डाल सके हैं। वे सच्चे अर्थों में समाज सुधारक थे।

कबीर जयंती स्पीच

Kabir jayanti essay in hindi

कबीरदास जी कवि थे । इससे भी अधिक क्रांतिकारी, समाज सुधारक और ईश्वर भक्त थे । उन्होंने कविता जैसे माध्यम का प्रयोग, समाज सुधार के कार्य तथा समाज में फैले पाखण्ड तथा भ्रान्तियों को दूर करने के उद्देश्य से किया । कबीर जी ने कहीं से भी विधिवत शिक्षा ग्रहण नहीं की थी ।

कहते हैं कि, उन्हें अक्षर ज्ञान भी नहीं था । फिर भी उनकी कविता का भाव इतना सशक्त बन पड़ा जिसके दृष्टिगत भाषा अथवा शैली का दोष अपदार्थ हो जाता है । यद्यपि कबीर जी पर कई विचारधाराओं का प्रभाव पड़ा तो भी कबीर जी का अपना मौलिक दर्शन है । परिणामस्वरूप रवीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रतिष्ठित रचना गीतांजलि पर कबीर की रचना बीजक की गहरी छाप मिलती है ।

कबीरदास जी के जीवन-वृतान्त के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती है । परन्तु कहते हैं कि:

“चौदह सो पचपन साल गये, चन्द्रवार इक ठाठ भये।

जेठ सुदी बरसाइत को, पूरनमासी प्रकट भये ।।’’

उनका जन्म संवत 1456 के आसपास हुआ था वे एक विधवा ब्राह्मणी की कोख से पैदा हुए थे । समाज के भय के कारण वह नवजात शिशु को एक नदी के किनारे छोड़ गई । नीरू और नीमा नामक जुलाहा मुस्लिम दम्पत्ति ने शिशु को उठा लिया और उसका लालन-पालन किया वे निर्धन थे ।

वे कबीर जी की शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध न कर सके । अत: जैसे ही कबीर जी बड़े हुए उन्हें कपड़ा बुनने का कार्य सिखाया । इस कार्य को वे जावन पर्यन्त करते रहे और किसी पर आश्रित नहीं रहे ।

Kabir Das Jayanti Essay in Hindi

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कबीर स्वयं अपनी शिक्षा के बारे में कहते हैं:

‘मसि कागज छुओ नहीं, कलम गही नहिं हाथ ।’

कबीरदास जी को ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा हुई तो वे गुरू की खोज करने लगे । उन दिनों काशी के स्वामी रामानन्द की प्रसिद्धि चारों ओर फैली हुई थी । कबीरदास जी उनके पास गए और उनसे गुरू बनकर ज्ञान देने की प्रार्थना की । स्वामी रामानन्द ने उन्हें शिष्य बनाना अस्वीकार कर दिया । कबीरदास अपनी धुन के पक्के थे । उन्हें पता था कि, स्वामीजी नित्य गंगा स्नान के लिए जाते हैं ।

एक दिन उसी मार्ग पर वे गंगाघाट की सीढ़ियों पर लेट गए । प्रात: जब हमेशा की तरह स्वामी रामानन्द जी गगा स्नान के लिए गए तो उनका पैर कबीरदास की छाती पर पड़ गया । उनके मुख से अकस्मात् निकला ‘ राम राम ‘ कहो भाई । कबीरदास जी की दीक्षा हो गई और यही वाक्य उनका गुरूमंत्र बन गया । वे जीवन भर राम की उपासना करते रहे ।

कबीरदास जी को इसी राम नाम की उपासना से ही ज्ञान हो गया । ईश्वर से साक्षात्कार हुआ और सत्य का पता चला । इस समय हिन्दू तथा मुसलमान दो धर्म मुख्य रूप से प्रचलित थे दोनों धर्मों को रूढ़ियों ने जकड़ रखा था । हिन्दू जाति-पांति और छुआछूत के अतिरिक्त मूर्तिपूजा, तीर्थों तथा अवतारवाद को मानते थे । मुसलमानों में रोजा और बाग का चलन था । कबीरदास जी ने निर्भीक होकर समाज तथा दोनों धर्मों में व्याप्त रूढ़ियों पर प्रहार किये ।

हिन्दुओं की मूर्ति पूजा की रीति पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा:

” पाथर पूजै हरि मिलें, हम लें पूजि पहार ।

घर की चाकी कोई न पूजै, पिस खाय ये संसार ।। ”

कबीरदास के व्यंग्य की परिधि से मुसलमान भी न बच सके:

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