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फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां – Stories of Phanishwar Nath Renu in Hindi for Kids

फणीश्वरनाथ रेणु भारत वर्ष के साहिया समाज के बहुत ही जाने माने कविकार और कहानीकार थे| उनके लेखन ने बहुत से लोगो को मनोरंजित किया है| उनका जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के अररिया में हुआ था| उन्होंने अपने साहित्य जीवन में बहुत से उपन्यासों को सराया गया| उनकी एक बहुत ही मशहूर उपन्यास मैला आंचल को बहुत ख्याति मिली की उनको पद्म विभूषण पुरस्कार से नवाज़ा गया| आज के इस पोस्ट में हम आपके लिये फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियाँ, फणीश्वरनाथ रेणु की हिंदी कहानी, फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियाँ इन हिंदी, आदि की जानकारी देंगे|

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी पंचलाइट

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जाड़े का दिन। अमावस्या की रात ठंडी और काली। मलेरिया और हैजे से पीड़ित गांव भयार्त्त शिशु की तरह थर-थर कांप रहा था। पुरानी और उजड़ी बांस-फूस की झोंपड़ियों में अंधकार और सन्नाटे का सम्मिलित साम्राज्य ! अंधेरा और निस्तब्धता !
अंधेरी रात चुपचाप आंसू बहा रही थी। निस्तब्धता करुण सिसकियों और आहों को बलपूर्वक अपने हृदय में ही दबाने की चेष्टा कर रही थी। आकाश में तारे चमक रहे थे। पृथ्वी पर कहीं प्रकाश का नाम नहीं। आकाश से टूटकर यदि कोई भावुक तारा पृथ्वी पर जाना भी चाहता तो उसकी ज्योति और शक्ति रास्ते में ही शेष हो जाती थी। अन्य तारे उसकी भावुकता अथवा असफलता पर खिलखिलाकर हंस पड़ते थे।
सियारों का क्रंदन और पेचक की डरावनी आवाज कभी-कभी निस्तब्धता को अवश्य भंग कर देती थी। गांव की झोंपड़ियों से कराहने और कै करने की आवाज, हरे राम ! हे भगवान की टेर अवश्य सुनाई पड़ती थी। बच्चे भी कभी-कभी निर्बल कंठों से मां-मां’ पुकार कर रो पड़ते थे। पर इससे रात्रि की निस्तब्धता में विशेष बाधा नहीं पड़ती थी।

कुत्तों में परिस्थिति को ताड़ने की एक विशेष बुद्धि होती है। वे दिन भर राख के घूरों पर गठरी की तरह सिकुड़कर, मन मारकर पड़े रहते थे। संध्या या गंभीर रात्रि को सब मिलकर रोते थे।
रात्रि अपनी भीषणताओं के साथ चलती रहती और उसकी सारी भीषणता को ताल ठोककर, ललकारती रहती थी-सिर्फ पहलवान की ढोलक ! संध्या से लेकर प्रातःकाल तक एक ही गति से बजती रहती चट्-धा, गिड़-धा,…. चट्-धा, गिड़-धा !’ यानी ‘आ जा भिड़ जा, आ जा भिड़ जा !’ बीच बीच में चटाक्-चट्-धा, चटाक्-चट-धा !’ यानी उठाकर पटक दे ! उठाकर पटक दे !!’
यही आवाज मृत-गांव में संजीवनी शक्ति भरती रहती थी।

लुट्टन सिंह पहलवान !
यों तो वह कहा करता था-लुट्टन सिंह पहलवान को होल इंडिया भर के लोग जानते हैं, किंतु उसके ‘होल इंडिया’ की सीमा शायद एक जिले की सीमा के बराबर ही हो। जिले भर के लोग उसके नाम से अवश्य परिचित थे।
लुट्टन के माता-पिता उसे नौ वर्ष की उम्र में ही अनाथ बनाकर चल बसे थे। सौभाग्यवश शादी हो चुकी थी, वरना वह भी मां-बाप का अनुसरण करता। विधवा सास ने पाल पोस कर बड़ा किया। बचपन में वह गाय चराता, धारोष्ण दूधपीता और कसरत किया करता था। गांव के लोग उसकी सास को तरह-तरह की तकलीफ दिया करते थे, लुट्टन के सिर पर कसरत की धुन लोगों से बदला लेने के लिए ही सवार हुई थी। नियमित कसरत ने किशोरावस्था में ही उसके सीने और बांहों को सुडौल तथा मांसल बना दिया था। जवानी, में कदम रखते ही वह गांव में सबसे अच्छ पहलवान समझा जाने लगा। लोग उससे डरने लगे और वह दोनों हाथों को दोनों ओर 45 डिग्री की दूरी पर फैलाकर, पहलवानों की भांति चलने लगा। वह कुश्ती भी लड़ता था।

एक बार वह ‘दंगल’ देखने श्यामनगर मेला गया। पहलवानों की कुश्ती और दांव-पेंच देखकर उससे नहीं रहा गया। जवानी की मस्ती और ढोल ललकारती हुई आवाज ने उसकी नसों में बिजली उत्पन्न कर दी। उसने बिना कुछ सोचे-समझे दंगल में शेर के बच्चे को चुनौती दे दी।
शेर के बच्चे का असल नाम था चांद सिंह। वह अपने गुरु पहलवान बादल सिंह के साथ, पंजाब से पहले-पहल श्यामनगर मेले में आया था। सुंदर जवान, अंग-प्रत्यंग से सुंदरता टपक पड़ती थी। तीन दिनों में ही पंजाबी और पठान पहलवानों के गिरोह के अपनी जोड़ी और उम्र के सभी पट्ठों को पछाड़कर उसने ‘शेर के बच्चे’ की टायटिल प्राप्त कर ली थी। इसलिए वह दंगल के मैदान में लंगोट लगाकर एक अजीब किलकारी भरकर छोटी दुलकी लगाया करता था। देशी नौजवान पहलवान, उससे लड़ने की कल्पना से भी घबड़ाते थे। अपनी टायटिल को सत्य प्रमाणित करने के लिए भी चांद सिंह बीच-बीच में दहाड़ता फिरता था।

श्यामनगर के दंगल और शिकार प्रिय वृद्ध राजा साहब उसे दरबार में रखने की बातें कर ही रहे थे कि लुट्टन ने शेर के बच्चे को चुनौती दे दी। सम्मान-प्राप्त चांद सिंह पहले तो किंचित, उसकी स्पर्धा पर मुस्कुराया। फिर बाज की तरह उस पर टूट पड़ा।
शांत दर्शकों की भीड़ में खलबली मच गयी पागल है पागल मरा ऐं, मरा-मरा !’….पर वह रे बहादुर ! लुट्टन बड़ी सफाई से आक्रमण को संभालकर निकल कर उठ खड़ा हुआ और पैतरा दिखाने लगा। राजा साहब ने कुश्ती बंद करवाकर लुट्टन को अपने पास बुलवाया और समझाया। अंत में, उसकी हिम्मत की प्रशंसा करते हुए, दस रुपए का नोट देकर कहने लगे-‘‘जाओ, मेला देखकर घर जाओ !…’’
‘‘नहीं सरकार, लड़ेंगे…हुकुम हो सरकार…!’’
‘‘तुम पागल हो, …जाओ !’’

Phanishwar Nath Renu Panchlight

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फणीश्वरनाथ रेणु की कहानियां

मैनेजर साहब से लेकर सिपाहियों तक ने धमकाया-‘‘देह में गोश्त नहीं, लड़ने चला है शेर के बच्चे से ! सरकार इतना समझा रहे हैं…!!’’
‘‘दुहाई सरकार, पत्थर पर माथा पटककर मर जाऊंगा…मिले हुकुम !’’ वह हाथ जोड़कर गिड़गिडाता रहा था।
भीड़ अधीर हो रही थी। बाजे बंद हो गये थे। पंजाबी पहलवानों की जमायत क्रोध से पागल होकर लुट्टन पर गालियों की बौछार कर रही थी। दर्शकों की मंडली उत्तेजित हो रही थी। कोई-कोई लुट्टन के पक्ष से चिल्ला उठता था-‘‘उसे लड़ने दिया जाये !’’
अकेला चांद सिंह मैदान में खड़ा व्यर्थ मुस्कुराने की चेष्टा कर रहा था। पहली पकड़ में ही अपने प्रतिद्वंद्वी की शक्ति का अंदाजा उसे मिल गया था।
विवश होकर राजा साहब ने आज्ञा दे दी-‘‘लड़ने दो !’’

बाजे बजने लगे। दर्शकों में फिर उत्तेजना फैली। कोलाहल बढ़ गया। मेले के दुकानदार दुकान बंद करके दौड़े-‘‘चांद सिंह की जोड़ी चांद की कुश्ती हो रही है !’’
‘चट्-धा, गिड़-धा, चट्-धा-गिड़ धा…’
भारी आवाज में एक ढोल-जो अब तक चुप था। बोलने लगा-
ढाक्-ढिना ढाक्-ढिना, ढाक्-ढिना…’’
(अर्थात् वाह पट्ठे वाह पट्ठे !!)

लुट्टन को चांद ने कसकर दबा लिया था।
-अरे गया-गया !!’’ दर्शकों ने तालियां बजायीं-हलुआ हो जायेगा, हलुआ ! हंसी-खेल नहीं शेर का बच्चा है…बच्चू !’’
‘चट्-धा, गिड़-धा, चट्-धा-गिड़ धा…’
(मत डरना, मत डरना, मत डरना…)
लुट्टन की गर्दन पर केहुनी डालकर चांद ‘चित्त’ करने की कोशिश कर रहा था।
‘‘वहीं दफना दे, बहादुर !’’ बादल सिंह अपने शिष्य को उत्साहित कर रहा था।
लुट्टन की आंखें बाहर निकल रही थीं। उसकी छाती फटने-फटने को हो रही थी। राजमत, बहुमत चांद के पक्ष में था। सभी चांद को शाबाशी दे रहे थे। लुट्टन के पक्ष में सिर्फ ढोल की आवाज थी, जिसके ताल पर वह अपनी शक्ति और दांव-पेंच की परीक्षा ले रहा था-अपनी हिम्मत को बढ़ा रहा था। अचानक ढोल की एक पतली आवाज सुनायी पडी-
‘धाक-धिना, तिरकट-तिना, धाक-धिना, तिरकट-तिना….!!’’

लुट्टन को स्पष्ट सुनायी पड़ा, ढोल कह रहा था-‘‘दांव काटो, बाहर हो जा, दांव काटो बाहर हो जा !!’’
लोगों के आश्चर्य सीमा नहीं रही, लुट्टन दांव काटकर बाहर निकला और तुरंत लपककर उसने चांद की गर्दन पकड़ ली।
‘‘वाह रे मिट्टी के शेर ! ’’
‘‘अच्छा ! बाहर निकल आया ? इसीलिए तो…!’’ जनमत बदल रहा था।
मोटी और भोंड़ी आवाज वाला ढोल बज उठा-चटाक्-चट्-धा चटाक्-चट्-धा…’
(उठा पटक दे ! उठा पटक दे !!)
लुट्टन ने चालाकी से दांव और जोर लगाकर चांद को जमीन पर दे मारा।

‘धिक-धिना, धिक-धिना ! (अर्थात् चित करो, चित करो !!)
लुट्टन ने अंतिम जोर लगाया-चांद सिंह चारों खाने चित हो रहा।
धा-गिड़-गिड़, धा-गिड़-गिड़, धा-गिड़-गिड़’…(वाह बहादुर ! वाह बहादुर !! वाह बहादुर !!)
जनता यह स्थिर नहीं कर सकी कि किसकी जय-ध्वनि की जाये। फलतः अपनी अपनी इच्छानुसार किसी ने ‘मां दुर्गा की’, किसी ने ‘महावीर जी की’, कुछ ने राजा श्यामानंद की जय-ध्वनि की। अंत में सम्मिलित ‘जय’ ! से आकाश गूंज उठा।
विजय लुट्टन कूदता फांदता ताल ठोंकता सबसे पहले बाजे वालों की ओर दौड़ा और ढोलों को श्रद्धापूर्वक प्रमाण किया। फिर दौड़कर उसने राजा साहब को गोद में उठा लिया। राजा साहब के कीमती कपड़े मिट्टी में सन गये। मैनेजर साहब ने आपत्ति की-‘‘हें-हें
अरे रे ।’’ किंतु राजा साहब ने स्वयं उसे छाती से लगाकर गद्गद होकर कहा-‘‘जीते रहो, बहादुर ! तुमने मिट्टी की लाज रख ली !’’

पंजाबी पहलवानों की जमायत चांद सिंह की आंखें पोंछ रही थी। लुट्टन को राजा साहब ने पुरस्कृत ही नहीं किया, अपने दरबार में सदा के लिए रख लिया। तब से लुट्टन राज-पहलवान हो गया और राजा साहब उसे लुट्टन सिंह कहकर पुकारने लगे। राज-पंडितों ने मुंह बिचकाया-‘‘हुजूर ! जाति का दुसाध सिंह !’’
मैनेजर साहब क्षत्रिय थे। क्लीन शेब्ड चेहरे को संकुचित करते हुए, अपनी पूरी शक्ति लगाकर नाक के बाल उखाड़ रहे थे। चुटकी से अत्याचारी बाल को रगड़ते हुए बोले-‘‘हां सरकार, यह अन्याय है।’’
राजा साहब ने मुस्कुराते हुए सिर्फ इतना ही कहा-‘‘उसने क्षत्रिय का काम किया है।’’

फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी ठेस

खेती-बारी के समय, गाँव के किसान सिरचन की गिनती नहीं करते। लोग उसको बेकार ही नहीं, ‘बेगार’ समझते हैं। इसलिए, खेत-खलिहान की मजदूरी के लिए कोई नहीं बुलाने जाता है सिरचन को। क्या होगा, उसको बुला कर? दूसरे मजदूर खेत पहुँच कर एक-तिहाई काम कर चुकेंगे, तब कहीं सिरचन राय हाथ में खुरपी डुलाता दिखाई पड़ेगा – पगडंडी पर तौल तौल कर पाँव रखता हुआ, धीरे-धीरे। मुफ्त में मजदूरी देनी हो तो और बात है।
…आज सिरचन को मुफ्तखोर, कामचोर या चटोर कह ले कोई। एक समय था, जबकि उसकी मड़ैया के पास बड़े-बड़े बाबू लोगो की सवारियाँ बँधी रहती थीं। उसे लोग पूछते ही नहीं थे, उसकी खुशामद भी करते थे। ‘…अरे, सिरचन भाई! अब तो तुम्हारे ही हाथ में यह कारीगरी रह गई है सारे इलाके मे। एक दिन भी समय निकाल कर चलो।
कल बड़े भैया की चिट्ठी आई है शहर से – सिरचन से एक जोड़ा चिक बनवा कर भेज दो।’
मुझे याद है… मेरी माँ जब कभी सिरचन को बुलाने के लिए कहती, मैं पहले ही पूछ लेता, ‘भोग क्या क्या लगेगा?’
माँ हँस कर कहती, ‘जा-जा, बेचारा मेरे काम में पूजा-भोग की बात नहीं उठाता कभी।’
ब्राह्मणटोली के पंचानंद चौधरी के छोटे लड़के को एक बार मेरे सामने ही बेपानी कर दिया था सिरचन ने – ‘तुम्हारी भाभी नाखून से खाँट कर तरकारी परोसती है। और इमली का रस साल कर कढ़ी तो हम कहार-कुम्हारों की घरवाली बनाती हैं। तुम्हारी भाभी ने कहाँ से बनाईं!’
इसलिए सिरचन को बुलाने से पहले मैं माँ को पूछ लेता…
सिरचन को देखते ही माँ हुलस कर कहती, ‘आओ सिरचन! आज नेनू मथ रही थी, तो तुम्हारी याद आई। घी की डाड़ी (खखोरन) के साथ चूड़ा तुमको बहुत पसंद है न… और बड़ी बेटी ने ससुराल से संवाद भेजा है, उसकी ननद रूठी हुई है, मोथी के शीतलपाटी के लिए।’
सिरचन अपनी पनियायी जीभ को सँभाल कर हँसता – ‘घी की सुगंध सूँघ कर आ रहा हूँ, काकी! नहीं तो इस शादी ब्याह के मौसम में दम मारने की
भी छुट्टी कहाँ मिलती है?’
सिरचन जाति का कारीगर है।
मैंने घंटों बैठ कर उसके काम करने के ढंग को देखा है। एक-एक मोथी और पटेर को हाथ में लेकर बड़े जातां से उसकी कुच्ची बनाता। फिर, कुच्चियों को रँगने से ले कर सुतली सुलझाने में पूरा दिन समाप्त… काम करते समय उसकी तन्मयता में जरा भी बाधा पड़ी कि गेंहुअन साँप की तरह फुफकार उठता – ‘फिर किसी दूसरे से करवा लीजिए काम। सिरचन मुँहजोर है, कामचोर नहीं।’
बिना मजदूरी के पेट-भर भात पर काम करने वाला कारीगर। दूध में कोई मिठाई न मिले, तो कोई बात नहीं, किंतु बात में जरा भी झाल वह नहीं बर्दाश्त कर सकता।
सिरचन को लोग चटोर भी समझते हैं… तली-बघारी हुई तरकारी, दही की कढ़ी, मलाई वाला दूध, इन सब का प्रबंध पहले कर लो, तब सिरचन को बुलाओ; दुम हिलाता हुआ हाजिर हो जाएगा। खाने-पीने में चिकनाई की कमी हुई कि काम की सारी चिकनाई खत्म! काम अधूरा रख कर उठ खड़ा होगा – ‘आज तो अब अधकपाली दर्द से माथा टनटना रहा है। थोड़ा-सा रह गया है, किसी दिन आ कर पूरा कर दूँगा… ‘किसी दिन’ – माने कभी नहीं!
मोथी घास और पटरे की रंगीन शीतलपाटी, बाँस की तीलियों की झिलमिलाती चिक, सतरंगे डोर के मोढ़े, भूसी-चुन्नी रखने के लिए मूँज की रस्सी के बड़े-बड़े जाले, हलवाहों के लिए ताल के सूखे पत्तों की छतरी-टोपी तथा इसी तरह के बहुत-से काम हैं, जिन्हें सिरचन के सिवा गाँव में और कोई नहीं जानता। यह दूसरी बात है कि अब गाँव में ऐसे कामों को बेकाम का काम समझते हैं लोग- बेकाम का काम, जिसकी मजदूरी में अनाज या पैसे देने की कोई जरुरत नहीं। पेट-भर खिला दो, काम पूरा होने पर एकाध पुराना-धुराना कपड़ा दे कर विदा करो। वह कुछ भी नहीं बोलेगा…
कुछ भी नहीं बोलेगा, ऐसी बात नहीं। सिरचन को बुलाने वाले जानते हैं, सिरचन बात करने में भी कारीगर है… महाजन टोले के भज्जू महाजन की बेटी सिरचन की बात सुन कर तिलमिला उठी थी – ठहरो! मैं माँ से जा कर कहती हूँ। इतनी बड़ी बात!’
‘बड़ी बात ही है बिटिया! बड़े लोगों की बस बात ही बड़ी होती है। नहीं तो दो-दो पटेर की पटियों का काम सिर्फ खेसारी का सत्तू खिला कर कोई करवाए भला? यह तुम्हारी माँ ही कर सकती है बबुनी!’ सिरचन ने मुस्कुरा कर जवाब दिया था।
उस बार मेरी सबसे छोटी बहन की विदाई होने वाली थी। पहली बार ससुराल जा रही थी मानू। मानू के दूल्हे ने पहले ही बड़ी भाभी को खत लिख कर चेतावनी दे दी है – ‘मानू के साथ मिठाई की पतीली न आए, कोई बात नहीं। तीन जोड़ी फैशनेबल चिक और पटेर की दो शीतलपाटियों के बिना आएगी मानू तो…’ भाभी ने हँस कर कहा, ‘बैरंग वापस!’ इसलिए, एक सप्ताह से पहले से ही सिरचन को बुला कर काम पर तैनात करवा दिया था माँ ने – ‘देख सिरचन! इस बार नई धोती दूँगी, असली मोहर छाप वाली धोती। मन लगा कर ऐसा काम करो कि देखने वाले देख कर देखते ही रह जाएँ।’
पान-जैसी पतली छुरी से बाँस की तीलियों और कमानियों को चिकनाता हुआ सिरचन अपने काम में लग गया। रंगीन सुतलियों से झब्बे डाल कर वह चिक बुनने बैठा। डेढ़ हाथ की बिनाई देख कर ही लोग समझ गए कि इस बार एकदम नए फैशन की चीज बन रही है, जो पहले कभी नहीं बनी।
मँझली भाभी से नहीं रहा गया, परदे के आड़ से बोली, ‘पहले ऐसा जानती कि मोहर छाप वाली धोती देने से ही अच्छी चीज बनती है तो भैया को खबर भेज देती।’
काम में व्यस्त सिरचन के कानों में बात पड़ गई। बोला, ‘मोहर छापवाली धोती के साथ रेशमी कुरता देने पर भी ऐसी चीज नहीं बनती बहुरिया। मानू दीदी काकी की सबसे छोटी बेटी है… मानू दीदी का दूल्हा अफसर आदमी है।’
मँझली भाभी का मुँह लटक गया। मेरे चाची ने फुसफुसा कर कहा, ‘किससे बात करती है बहू? मोहर छाप वाली धोती नहीं, मूँगिया-लड्डू। बेटी की विदाई के समय रोज मिठाई जो खाने को मिलेगी। देखती है न।’
दूसरे दिन चिक की पहली पाँति में सात तारे जगमगा उठे, सात रंग के। सतभैया तारा! सिरचन जब काम में मगन होता है तो उसकी जीभ जरा बाहर निकल आती है, होठ पर। अपने काम में मगन सिरचन को खाने-पीने की सुध नहीं रहती। चिक में सुतली के फंदे डाल कर अपने पास पड़े सूप पर निगाह डाली – चिउरा और गुड़ का एक सूखा ढेला। मैंने लक्ष्य किया, सिरचन की नाक के पास दो रेखाएँ उभर आईं। मैं दौड़ कर माँ के पास गया। ‘माँ, आज सिरचन को कलेवा किसने दिया है, सिर्फ चिउरा और गुड़?’
माँ रसोईघर में अंदर पकवान आदि बनाने में व्यस्त थी। बोली, ‘मैं अकेली कहाँ-कहाँ क्या-क्या देखूँ!… अरी मँझली, सिरचन को बुँदिया क्यों नहीं देती?’
‘बुँदिया मैं नहीं खाता, काकी!’ सिरचन के मुँह में चिउरा भरा हुआ था। गुड़ का ढेला सूप के किनारे पर पड़ा रहा, अछूता।
माँ की बोली सुनते ही मँझली भाभी की भौंहें तन गईं। मुट्ठी भर बुँदिया सूप में फेंक कर चली गई
सिरचन ने पानी पी कर कहा, ‘मँझली बहूरानी अपने मैके से आई हुई मिठाई भी इसी तरह हाथ खोल कर बाँटती है क्या?’
बस, मँझली भाभी अपने कमरे में बैठकर रोने लगी। चाची ने माँ के पास जा कर लगाया – ‘छोटी जाति के आदमी का मुँह भी छोटा होता है। मुँह लगाने से सर पर चढ़ेगा ही… किसी के नैहर-ससुराल की बात क्यों करेगा वह?’
मँझल भाभी माँ की दुलारी बहू है। माँ तमक कर बाहर आई – ‘सिरचन, तुम काम करने आए हो, अपना काम करो। बहुओं से बतकुट्टी करने की क्या जरूरत? जिस चीज की जरुरत हो, मुझसे कहो।’
सिरचन का मुँह लाल हो गया। उसने कोई जवाब नहीं दिया। बाँस में टँगे हुए अधूरे चिक में फंदे डालने लगा।
मानू पान सजा कर बाहर बैठकखाने में भेज रही थी। चुपके से पान का एक बीड़ा सिरचन को देती हुई बोली और इधर-उधर देख कर कहा – ‘सिरचन दादा, काम-काज का घर! पाँच तरह के लोग पाँच किस्म की बात करेंगे। तुम किसी की बात पर कान मत दो।’
सिरचन ने मुस्कुरा कर पान का बीड़ा मुँह में ले लिया। चाची अपने कमरे से निकल रही थी। सिरचन को पान खाते देख कर अवाक हो गई। सिरचन ने चाची को अपनी ओर अचरज से घूरते देख कर कहा – ‘छोटी चाची, जरा अपनी डिबिया का गमकौआ जर्दा तो खिलाना। बहुत दिन हुए…।’
चाची कई कारणों से जली-भुनी रहती थी, सिरचन से। गुस्सा उतारने का ऐसा मौका फिर नहीं मिल सकता। झनकती हुई बोली, ‘मसखरी करता है? तुम्हारी चढ़ी हुई जीभ में आग लगे। घर में भी पान और गमकौआ जर्दा खाते हो? …चटोर कहीं के!’ मेरा कलेजा धड़क उठा… यत्परो नास्ति!
बस, सिरचन की उँगलियों में सुतली के फंदे पड़ गए। मानो, कुछ देर तक वह चुपचाप बैठा पान को मुँह में घुलाता रहा। फिर, अचानक उठ कर पिछवाड़े पीक थूक आया। अपनी छुरी, हँसियाँ वगैरह समेट सँभाल कर झोले में रखे। टँगी हुई अधूरी चिक पर एक निगाह डाली और हनहनाता हुआ आँगन के बाहर निकल गया।
चाची बड़बड़ाई – ‘अरे बाप रे बाप! इतनी तेजी! कोई मुफ्त में तो काम नहीं करता। आठ रुपए में मोहरछाप वाली धोती आती है… इस मुँहझौंसे के मुँह में लगाम है, न आँख में शील। पैसा खर्च करने पर सैकड़ों चिक मिलेंगी। बांतर टोली की औरतें सिर पर गट्ठर ले कर गली-गली मारी फिरती हैं।’
मानू कुछ नहीं बोली। चुपचाप अधूरी चिक को देखती रही… सातो तारे मंद पड़ गए।
माँ बोली, ‘जाने दे बेटी! जी छोटा मत कर, मानू. मेले से खरीद कर भेज दूँगी.’
मानू को याद आया, विवाह में सिरचन के हाथ की शीतलपाटी दी थी माँ ने। ससुरालवालों ने न जाने कितनी बार खोल कर दिखलाया था पटना और कलकत्ता के मेहमानों को। वह उठ कर बड़ी भाभी के कमरे में चली गई।
मैं सिरचन को मनाने गया। देखा, एक फटी शीतलपाटी पर लेट कर वह कुछ सोच रहा है।
मुझे देखते ही बोला, बबुआ जी! अब नहीं। कान पकड़ता हूँ, अब नहीं… मोहर छाप वाली धोती ले कर क्या करूँगा? कौन पहनेगा? …ससुरी खुद मरी, बेटे बेटियों को ले गई अपने साथ। बबुआजी, मेरी घरवाली जिंदा रहती तो मैं ऐसी दुर्दशा भोगता? यह शीतलपाटी उसी की बुनी हुई है। इस शीतलपाटी को छू कर कहता हूँ, अब यह काम नहीं करूँगा… गाँव-भर में तुम्हारी हवेली में मेरी कदर होती थी… अब क्या ?’ मैं चुपचाप वापस लौट आया। समझ गया, कलाकार के दिल में ठेस लगी है। वह अब नहीं आ सकता।
बड़ी भाभी अधूरी चिक में रंगीन छींट की झालर लगाने लगी – ‘यह भी बेजा नहीं दिखलाई पड़ता, क्यों मानू?’
मानू कुछ नहीं बोली… बेचारी! किंतु, मैं चुप नहीं रह सका – ‘चाची और मँझली भाभी की नजर न लग जाए इसमें भी।’
मानू को ससुराल पहुँचाने मैं ही जा रहा था.
स्टेशन पर सामान मिलाते समय देखा, मानू बड़े जतन से अधूरे चिक को मोड़ कर लिए जा रही है अपने साथ। मन-ही-मन सिरचन पर गुस्सा हो आया। चाची के सुर-में-सुर मिला कर कोसने को जी हुआ… कामचोर, चटोर…!
गाड़ी आई। सामान चढ़ा कर मैं दरवाजा बंद कर रहा था कि प्लेटफॉर्म पर दौड़ते हुए सिरचन पर नजर पड़ी – ‘बबुआजी!’ उसने दरवाजे के पास आ कर पुकारा।
‘क्या है?’ मैंने खिड़की से गर्दन निकाल कर झिड़की के स्वर में कहा। सिरचन ने पीठ पर लादे हुए बोझ को उतार कर मेरी ओर देखा – ‘दौड़ता आया हूँ… दरवाजा खोलिए। मानू दीदी कहाँ हैं? एक बार देखूँ!’
मैंने दरवाजा खोल दिया।
‘सिरचन दादा!’ मानू इतना ही बोल सकी।
खिड़की के पास खड़े हो कर सिरचन ने हकलाते हुए कहा, ‘यह मेरी ओर से है। सब चीज है दीदी! शीतलपाटी, चिक और एक जोड़ी आसनी, कुश की।’
गाड़ी चल पड़ी।
मानू मोहर छापवाली धोती का दाम निकाल कर देने लगी। सिरचन ने जीभ को दाँत से काट कर, दोनों हाथ जोड़ दिए।
मानू फूट-फूट रो रही थी। मैं बंडल को खोल कर देखने लगा – ऐसी कारीगरी, ऐसी बारीकी, रंगीन सुतलियों के फंदों का ऐसा काम, पहली बार देख रहा था।

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