Story Of Lord Krishna From Birth To Death In Hindi – श्री कृष्ण की कहानियाँ

श्री कृष्ण की कहानियाँ

भगवान् विष्णु जी के सभी अवतारों में से एक अवतार Govind जी यानि श्री कृष्ण भी है। सभी Bhagwan Shri Krishna ki Kahani भली भांति जानते है। यह अवतार बाकि सभी अवतारों में से सर्व श्रेष्ठ माना जाता है क्यूंकि यह अवतार 16 कलाओं से परिपूर्ण है। इस गोविंद अवतार में God Krishna ने बहुत ही अलग-अलग लीलाएँ दिखाई है। आज हम इस Article में Krishna Birth Story in Hindi और Shri Krishna ki Lilaye आपके साथ साँझा कर रहे है। आज हम आपको Kanha Ji Story के साथ-साथ Bhagwan ki Baate भी इस लेख के द्वारा बताएँगे।

इसके साथ Radha Krishn का एक दुसरे के प्रति स्नेह-भाव और उनके मिलन के बारे में भी जानकारी प्रदान कर रहे है। आप Krishna Story in Hindi Written को Internet पर in English और in Marathi के साथ-साथ अन्य भाषाओँ में भी पढ़ सकते है। आज के इस Modern Times में Tv या Mobile पर अक्सर सभी बच्चों को Krishna Cartoon और Little Krishna जैसे Shows देखना पसंद होता है और इन Cartoon Shows के माध्यम से उन्हें Shri Krishna Ji की कहानी की Knowledge हो जाती है। आप इस Article को Pdf Format में Download कर सकते है और Whatsapp एवं Facebook पर अपने Friends और Relatives के साथ Share कर सकते है।

श्री कृष्णा जन्म (Shri Krishna Birth)

श्री कृष्णा का जन्म

द्वापर युग में मथुरा के राजा कंस अपनी बहन देवकी को उनके पति बासुदेव जी के साथ उनके विवाह के उपरांत उन्हें उनके घर छोड़ने जा रहे थे। तभी रास्ते में अचानक आकाशवाणी हुई कि कंस की बहन देवकी की आठवीं संतान के हाथों कंस की मृत्यु होगी और यही सुनकर कंस अपनी बहन देवकी एवं उनके पति वासुदेव जी को अपनी नगरी मथुरा के कारावास में उन्हें बंद कर दिया। वह अपनी बहन की सभी संतानों की हर बार हत्या कर देता। जब देवकी और वासुदेव आठवीं संतान के रूप में श्री कृष्णा जी ने मथुरा नरेश कंस के यहां कारावास में जन्म लिया। Krishna Ji का जन्म लेने के उपरांत ही कारावास के सभी दरवाजे खुल जाते है तथा कारावास के सभी प्रहरी गहरी निंद्रा में सो जाते है।

कान्हा जी का जन्म होते ही आकाशवाणी होती है कि इस संतान को नंदराय जी के यहाँ पर नंदगांव में पंहुचा दो और उनकी कन्या को यहां पर ले आओ। वासुदेव जी आकाशवाणी के अनुसार यह कार्य करते है। इसके बाद कंस को देवकी और वासुदेव की आठवीं संतान के बारे में ज्ञात हो जाने के उपरान्त ही वह उस कन्या की पत्थर पर फेंक कर हत्या कर देता है किन्तु वह कन्या माँ दुर्गा जी का रूप होती है और तभी एक आकाशवाणी होती है कि कंस का वध करने वाली देवकी की आठवीं संतान का जन्म हो चूका है। यह सुन कंस भयभीत हो जाता है।

पूतना वध (Putna Slaughter)

पूतना का वध

कंस को जब श्री कृष्‍ण के जन्म की सूचना प्राप्त होती है तो वह पूतना नामक राक्षसी को Shri Krishna को मारने हेतु भेजाता है। पूतना अपना रूप बदलकर कृष्‍ण का हरण कर लेती है एवं अपने स्तन पर जहर लगा कान्हा हो स्तन पान करने लगती है। तभी श्री कृष्‍ण पूतना के स्तन पान करने के दौरान राक्षसी पूतना के प्राणों को खींच लेते है और व‌िशालकाय राक्षसी पूतना मृत्यु को प्राप्त हो जाती है।

कृष्ण और फल विक्रेता (Krishna And The Fruit Seller)

कृष्ण और फल विक्रेता

एक बार जब श्री कृष्ण जी अपने घर पर अकेले थे और उस समय वह अत्यधिक भूखे भी थे। उसी समय के दौरान गोकुल में एक फल बेचने वाली एक वृद्धा स्त्री आयी। वह अपने साथ एक टोकरी में बहुत ही स्वादिष्ट पके हुए और अत्यधिक मीठे फलों को बेचते-बेचते कान्हा जी के घर के द्वार पर पहुंच गयी एवं आवाज लगाने लगी “फल लेलो फल, ताजा मीठे स्वादिष्ट फल लेलो” किन्तु उस वृद्धा स्त्री की आवाज किसी ने नहीं सुनी तो वह घर के द्वार से अंदर की ओर आ गयी। लेकिन फिर भी उस वृद्धा स्त्री की आवाज किसी ने ना सुनी ओर वह वापस जाने लगी। उस दिन उस स्त्री का एक भी फल की बिक्री नहीं हुई थी। तभी उस वृद्धा स्त्री की आवाज सुनकर Krishna Ji अपने घर के बाहर आये और उस वृद्धा स्त्री से फल मांगने लगे।

उस वृद्धा ने कहा कि जाओ पहले अपनी माँ को बुलालो तो कान्हा जी ने अपनी मनमोहक आवाज में कहा कि उनके माता-पिता घर पर नहीं है। फिर उस वृद्धा ने कहा कि फल के बदले में कुछ देना होगा और तभी मैं फल दे पाऊँगी क्यूंकि मेरी सुबह से बोहनी नहीं हुई है। लेकिन कन्हैया जी के पास उस स्त्री को देने के लिए कुछ नहीं था तो वृद्धा ने कहा घर में कुछ होगा इन फलों के बदले में देने के लिए तो कृष्णा जी घर के अंदर गए और अपने छोटे-छोटे हाथों में कुछ अनाज ले आये। वह अनाज उस वृद्धा स्त्री को दे दिया और उसके बदले में उससे सभी फल ले लिए। जब वह वृद्धा पूरे रास्ते भर यह कह कर “आज तो बड़ा ही अच्छा सौदा हो गया रे, बहुत ही अच्छा सौदा हो गया” अपने घर पर पहुंची तो वह सारा अनाज हीरे-जवाहरात में परिवर्तित हो गया। यह देख कर वह वृद्धा स्त्री बहुत ही प्रसन्न हो गयी तथा ईश्वर का धन्यवाद करने लगी।

अरिष्टासुर और कृष्ण (Arishtasura & Krishna)

अरिष्टासुर और कृष्ण

कृष्ण को मारने के लिए मथुरा नरेश कंस अरिष्टासुर नाम के एक दानव को वृंदावन में भेज देता है। वह अरिष्टासुर नामक राक्षस वृंदावन के जंगल में एक बैल के रूप में जाकर तवाही मचाना शुरू कर देता है एवं सभी वृक्षों को और घरों को नष्ठ करना शुरू कर देता है। यह देख सभी ग्रामीण डर जाते है। यह बात जब krishna को ज्ञात होती है तो वह उस बैल रुपी दानव को देखकर पहचान जाते है एवं उस अरिष्टासुर राक्षस का अंत कर देते है।

केशी राक्षस का वध (Slaughter of Keshi Demon)

केशी राक्षस का वध

Arishtasura के अंत के बाद कंस ने लंबे बालों वाले केशी नामक राक्षस को कन्हैया जी को मरने के लिए भजता है। केशी एक विशाल काय घोड़े का रूप लेकर Sri Krishna को मरने के लिए वृंदावन पहुंच जाता है। केशी राक्षस सभी वृंदावन वासियों को डरता है तभी कृष्णा केशी राक्षस को द्वन्द युद्ध के लिए ललकारते है। केशी राक्षस से युद्ध दौरान कान्हा जी अपनी कोहनी के द्वारा उस राक्षस के सभी दाँतों को तोड़ देते है फिर उस केशी राक्षस के मुँह में अपनी कोहनी को फसाकर उस राक्षस का अंत कर देते है। जिस कारण krishna जी केशव (Keshav) के नाम जाने जाते है।

कालिया नाग का अंत (End of The Serpent Kaliya)

कालिया नाग का अंत

एक बार जब श्री कृष्ण माधव अपने सभी मित्रों के साथ गेंद से यमुना के किनारे क्रीड़ा कर रहे थे। तब वह गेंद यमुना नदी में चली जाती है और उस गेंद को पुनः प्राप्त करने के लिए krishna ji उस Yamuna River में कूद जाते है। उन्हें यह बात ज्ञात होती है कि नदी में kaliya नामक सर्प भ्रमण कर रहा है। वह उस सर्प को यमुना नदी को छोड़ने के लिए कहते है। किन्तु वह यह बात को स्वीकार नहीं करता है तथा कृष्ण को मारने के लिए प्रयास करता है। सौ मुख कालिया नाग वाले सर्प को युद्ध में हराकर कृष्ण ब्रह्मांड का भार मानते हुए उसके शीश पर नृत्य करते है। कालिया नाग इसके बाद हार मानकर Yamuna नदी को छोड़कर हमेशा के लिए चला जाता है।

गोवेर्धन पर्वत की लीला (Leela of Goverdhan Parvat)

गोवेर्धन पर्वत की लीला

हर बार की तरह वृंदावन के सभी ग्रामीण इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करते थे और उन्हें प्रसाद चढ़ाते। यह सब देखकर कृष्ण ने एक सभा का आयोजन किया और सभी ग्रामीणों को समझने लगे। कि इंद्र देव की तुलना में गिरि गोवर्धन पर्वत की ज्यादा महत्व है एवं इस सभी कथन को सुनने के पश्चात् सभी ग्रामीण अनिच्छा से सहमत हो गए। इंद्र देव की पूजा को रोक दिया। यह देख इंद्रा देव क्रोधित हो गए और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। इस वर्षा के कारण सभी ग्रामीण नन्दराय जी के यहां पहुंच गए और उनसे कहा कि अब वह सभी कहा जाये। तब श्री कृष्ण इस वर्षा से सभी ग्रामीणों को बचने के लिए गिरि गोवेर्धन पर्वत को अपनी बाएं हाथ की छोटी ऊँगली पर उठाकर एक बड़े आकार की छतरी बना ली। उस पर्वत के नीचे सभी ग्रामीणों को शरण दी। यह वर्षा सात दिन और सात रात्रि तक चली किन्तु इंद्रा देव सभी ग्रामीण वासियों का कुछ नहीं बिगाड़ सके। जिसके बाद इंद्रा देव ने हार मान ली और भगवान् Shri Krishna Ji से क्षमा मांगी। इस कारण कन्हैया जी को Goverdhan , गिर्राज के नाम से भी जाना जाता है।

भगवान कृष्ण की मृत्यु (Lord Krishna Death)

भगवान कृष्ण की मृत्यु

भगवान कृष्ण जी की मृत्यु एक वृक्ष के नीचे हुई थी। वहां एक प्रभास नामक नदी में लोहे की छड़ के चूर्ण को प्रवाहित किया था। उस नदी में एक मछली ने उस चूर्ण को निगल लिया था और वह चूर्ण उस मछली के पेट में एक धातु के टुकड़े के रूप में परिवर्तित हो गयी। कुछ समय बाद उस मछली को एक जीरू नाम के शिकारी ने पकड़ लिया और उस मछली के पेट से निकले धातु के टुकड़े से एक नुकीला तीर बना दिया। जब कृष्ण वन में ध्यान में लीन थे तभी जीरू को ऐसा लगा कि वहां कोई हिरन है उसने हिरन के अंदेशे में कृष्ण पर उस तीन से प्रहार कर दिया। जिस कारण श्री कृष्ण जी की मृत्यु हो गयी। भगवान कृष्ण ने अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने महाभारत के दौरान द्रोपती के साथ अर्जुन के भी सारथि बने थे और महाभारत में अपने अहम् भूमिका निभाई थी।

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