दीपावली की कविताएं 2018

Diwali ki Kavita: दिवाली हमारे भारत का एक प्रमुख त्योहार है यह अक्टूबर और नवंबर के महीने धूम धाम से मनाया जाता है । इस त्योहार को हिंदू कैलेंडर के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन को प्रमुख रूप से भगवान श्री राम के 14 साल के वनवास से वापिस लौटने की ख़ुशी में मनाया जाता है| त्योहारों पर कविताएं सबको अच्छी लगतीं हैं|आइये दीपावली से सम्बंधित कुछ कविताएँ जानते हैं|

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दीवाली पर छोटी कविता


दीप जलाओ दीप जलाओ
आज दिवाली रे
खुशी-खुशी सब हँसते आओ
आज दिवाली रे।
मैं तो लूँगा खील-खिलौने
तुम भी लेना भाई
नाचो गाओ खुशी मनाओ
आज दिवाली आई।
आज पटाखे खूब चलाओ
आज दिवाली रे
दीप जलाओ दीप जलाओ
आज दिवाली रे।
नए-नए मैं कपड़े पहनूँ
खाऊँ खूब मिठाई
हाथ जोड़कर पूजा कर लूँ
आज दिवाली आई।
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वह दीपों का आना
पाहुन-सा
फिर लक-दक करना
आंगन में
आस्वादन कुछ मीठा-मीठा
वह खुशी भरा आशियाना
वह किलकारी नूतन वय की
किसलय-सी
युवकों का उल्लास निरंतर
अनवरत झरते निर्झर-सा
बालाओं का सजना-धजना
वह चम-चम
चमकीली बिन्दिया
ओ कंगना हूर परी-सा
नूतन प्रकाश का आना
पाहुन-सा।
- प्रभा चामलीकर
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दिया जलता रहे
यह ज़िन्दगी का कारवाँ, इस तरह चलता रहे
हर देहरी पर अँधेरों में दिया जलता रहे
आदमी है आदमी तब ,जब अँधेरों से लड़े
रोशनी बनकर सदा ,सुनसान पथ पर भी बढ़े
भोर मन की हारती कब, घोर काली रात से
न आस्था के दीप डरते, आँधियों के घात से
मंज़िलें उसको मिलेंगी जो निराशा से लड़े
चाँद- सूरज की तरह, उगता रहे ढलता रहे
जब हम आगे बढ़ेंगे, आस की बाती जलाकर
तारों भरा आसमाँ, उतर आएगा धरा पर
आँख में आँसू नहीं होंगे किसी भी द्वार के
और आँगन में खिलेंगे, सुमन ममता प्यार के
वैर के विद्वेष के कभी शूल पथ में न उगें
धरा से आकाश तक बस प्यार ही पलता रहे
-रामेश्वर दयाल कांबोज हिमांशु
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दिवाली पर एक कविता


दीपावली मनाऊँ
जिस दिन सारा जग प्रकाश से सराबोर हो
जी में है उस दिन ही दीपावली मनाऊँ
रहे न कोई कोना जब तम से आच्छादित
मन करता है उस दिन ही मैं दीप जलाऊँ।।
मानवता का चिर प्रकाश फैले हर उर में,
मानव कोई हीन भावना से न ग्रसित हो
अंतर में हो देश प्रेम की उत्कट इच्छा
त्याग और निष्ठा से हर मन उदभासित हो
नव प्रकाश से जिस दिन धरा गगन ज्योतित हो,
उस दिन ही मैं तेरा आरति दीप जलाऊँ।
जी में है उस दिन ही दीपावली मनाऊँ।।
धन-दौलत जब रहे न मानव की परिभाषा
हाथों की मेहनत ही जब पूजा कहलाए
'विश्व बंध' का पाठ पढ़ें और करें अनुसरण
अपना भाग्य विधाता मानव खंद बन जाए
उस दिन ही आराध्य देव तेरी मूरत पर
जी में आता है निज पूजा पुष्प चढ़ाऊँ।
जी में है उस दिन ही दीपावली मनाऊँ।।
जब न धरा का कोई बेटा भूखा सोए
औ' न किसी बेटी की इज़्ज़त लूटी जाए
जब न किसी मां की हड्डी से चिपक ठिठुर कर
कोई बालक रो-रो अपनी रात बिताए
उस दिन ही 'जग के स्वामी' निज थाल सजाकर
जी में आता है मैं तेरा भोग लगाऊँ।
जी में है उस दिन ही दीपावली मनाऊँ।।
-उमाशंकर वर्मा 'साहिल'
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दीपावली कविताएं


मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है।
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है।
आभारी हूँ तुमने आकर
मेरा ताप-भरा तन देखा,
आभारी हूँ तुमने आकर
मेरा आह-घिरा मन देखा,
करुणामय वह शब्द तुम्हारा–
’मुसकाओ’ था कितना प्यारा।
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है।
है मुझको मालूम पुतलियों
में दीपों की लौ लहराती,
है मुझको मालूम कि अधरों
के ऊपर जगती है बाती,
उजियाला करदेनेवाली
मुसकानों से भी परिचित हूँ,
पर मैंने तम की बाहों में अपना साथी पहचाना है।
मैं दीपक हूँ, मेरा जलना ही तो मेरा मुस्काना है।
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आज फिर से
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
है कंहा वह आग जो मुझको जलाए,
है कंहा वह ज्वाल पास मेरे आए,
रागिनी, तुम आज दीपक राग गाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
तुम नई आभा नहीं मुझमें भरोगी,
नव विभा में स्नान तुम भी तो करोगी,
आज तुम मुझको जगाकर जगमगाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
मैं तपोमय ज्योती की, पर, प्यास मुझको,
है प्रणय की शक्ति पर विश्वास मुझको,
स्नेह की दो बूंदे भी तो तुम गिराओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
कल तिमिर को भेद मैं आगे बढूंगा,
कल प्रलय की आंधियों से मैं लडूंगा,
किन्तु आज मुझको आंचल से बचाओ;
आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ ।
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दीपोत्सव कविता


एक दीपक
जूझ कर कठिनाइयों से
कर सुलह परछाइयों से
एक दीपक रातभर जलता रहा
लाख बारिश आँधियों ने सत्य तोड़े
वक्त ने कितने दिए पटके झिंझोड़े
रौशनी की आस पर
टूटी नहीं
आस्था की डोर भी
छूटी नहीं
आत्मा में डूब कर के
चेतना अभिभूत कर के
साधना के मंत्र को जपता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा
जगमगाहट ने बुलाया पर न बोला
झूठ से उसने कोई भी सच न तौला
वह सितारे देख कर
खोया नहीं
दूसरों के भाग्य पर
रोया नहीं
दिन महीने साल निर्मम
कर सतत अपना परिश्रम
विजय के इतिहास को रचता रहा
एक दीपक
रातभर जलता रहा
--पूर्णिमा वर्मन
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दीपावली
तुमने दीपावली मनाई है
दीपावली के सुख ख़रीदे हैं
दीपक की ज्योति से
मिष्ठानों से
नए वस्त्र, आभूषण, उपहारों से
ख़रीदे हुए सुख
न फलते हैं
न फूलते हैं।
मैंने दीपावली जी है
हर बार
जब मेरे बच्चे
होस्टल से लौटते हैं।
घर- बाहर
लॉन- दालान
जगमगा उठता है।
बच्चों के कहकहों से
सुर संगीत
हर ओर छा जाता है।
बातचीत से
मिसरी सी
भर आती है मुँह में।
उदासी की सब परतें घोकर
आतिशबाजियों से रोशनी से
चकाचौंध कर देते हैं
बच्चे मेरे मन को।
-डॉ. मधु संधु
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