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महाराजा अग्रसेन की जयंती पर निबंध 2018 – Maharaja Agrasen Jayanti Essay in Hindi Pdf Download

Agrasen jayanti 2018: क्षत्रिय समाज के राजा बल्लभ सेन के सबसे बड़े पुत्र महाराजा अग्रसेन को देवताओं के लिए दी जाने वाली पशुओं की बलि की प्रथा पसंद नहीं थी इसीलिए उन्होंने क्षत्रिय धर्म को छोड़कर वैश्य धर्म अपना लिया था | तभी उन्हें वैश्य समाज का जनक भी कहा जाता है | महाराजा अग्रसेन के जन्म दिवस को अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है। अग्रसेन जयंती पर अग्रसेन के वंशज समुदाय द्वारा अग्रसेन महाराज जी की भव्य झांकी और शोभयात्राएँ निकाली जाती हैं और अग्रसेन महाराज का पूजन पाठ व आरती की जाती हैं। इये आज के इस पोस्ट में हम आपको agrasen jayanti nibandh in hindi व maharaja agarsen jayanti par nibandh आदि की जानकारी इन हिंदी, मराठी, इंग्लिश, बांग्ला, गुजराती, तमिल, तेलगु, आदि की जानकारी देंगे जिसे आप अपने स्कूल के agrasen jayanti competition, निबंध प्रतियोगिता, कार्यक्रम या भाषण प्रतियोगिता में प्रयोग कर सकते है| ये निबंध खासकर कक्षा 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 ,10, 11, 12 और कॉलेज के विद्यार्थियों के लिए दिए गए है|

महाराजा अग्रसेन जयंती पर निबंध

Agrasen jayanti date 2018: इस वर्ष महाराजा अग्रसेन जयंती २०१८, 10 अक्टूबर 2018 (बुधवार) को पूरे भारत में पूर्ण उत्साह के साथ मनायी जाएगी| आइये देखें कुछ agrasen jayanti essay, महाराजा अग्रसेन जयंती स्पीच, अग्रसेन जयंती एस्से, अग्रसेन जयंती पर कविता व agrasen jayanti 2018 essay in hindi, essay writing competition आदि की जानकारी 100 words, 150 words, 200 words, 400 words में|

महाराजा अग्रसेन एक महान भारतीय राजा (महाराजा) थे। जिन्होंने अग्रवाल और आगराहारी समुदायों ने उसके वंश का प्रतिनिधित्व किया। उन्हें उत्तर भारत में व्यापारियों के नाम पर अग्रोहा का श्रेय दिया जाता है, और यज्ञों में जानवरों को मारने से इनकार करते हुए उनकी करुणा के लिए जाने जाते है। महाराजा अग्रसेन का जन्म अश्विन शुक्ल प्रतिपदा हुआ, जिसे अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है। नवरात्रि के प्रथम दिवस को अग्रसेन महाराज जयंती के रूप में मनाया जाता हैं। अग्रसेन जयंती पर अग्रसेन के वंशज समुदाय द्वारा अग्रसेन महाराज की भव्य झांकी व शोभायात्रा नकाली जाती हैं और अग्रसेन महाराज का पूजन पाठ, आरती किया जाता हैं। 1976 में भारत सरकार ने महाराजा अग्रेसेन के सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया।

महापुरूष और विश्वास

अग्रसेन सौर वंश के एक वैश्य राजा थे जिन्होंने अपने लोगों के लिए वनिका धर्म को अपनाया था। वस्तुतः, अग्रवाल का अर्थ है “अग्रसेन के बच्चों” या “अग्रसेन के लोग”, हरियाणा क्षेत्र के हिसार के पास प्राचीन कुरु पंचला में एक शहर, जिसे अग्रसेन ने स्थापित किया था।

महाराजा अग्रसेन महावीर महाकाव्य युग में द्वापर युग के अंतिम चरण के दौरान पैदा हुए सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा थे, वह भगवान कृष्ण के समकालीन थे। वह सूर्यवंशी राजा मन्धाता के वंश थे। राजा मंधता के दो पुत्र थे, गुनाधि और मोहन, अग्रसेन प्रतापनगर के मोहन के वंशज राजा वल्लभ के सबसे बड़े बेटे थे। अग्रसेन प्रतापनगर के मोहन के वंशज राजा वल्लभ और माता भगवती के सबसे बड़े बेटे थे। अग्रसेन के 18 बच्चे हैं, जिनसे अग्रवाल गोत्र अस्तित्व में आया।

अग्रसेन ने राजा नागराज कुमूद की बेटी माधवी के स्वयंवर में भाग लिया। हालांकि, इंद्र, स्वर्ग के परमेश्वर और तूफान और वर्षा के स्वामी भी माधवी से शादी करना चाहते थे, लेकिन उन्होंने अपने पति के रूप में अग्रसेन को चुना। इंद्र ने यह सुनिश्चित करके बदला लेने का फैसला किया कि प्रतापनगर को बारिश नहीं मिली।

नतीजन, एक अकाल ने अग्रसेन के राज्य को मारा, जिसने तब इंद्र के खिलाफ युद्ध लड़ने का फैसला किया। नारद ऋषि को मध्यस्थ बना कर दोनों के बीच सुलह करवा दी।

तपस्या

अग्रसेन ने आगरा शहर में शिव को प्रसन्न करने के लिए एक गंभीर (तपस्या) की शुरुआत की। शिव ने तपस्या से प्रसन्नता की और देवी को प्रसन्न करने की सलाह दी। अग्रसेन ने महालक्ष्मी पर फिर से ध्यान देना शुरू कर दिया, जो उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया।

महाराजा अग्रसेन की जयंती पर निबंध

उन्होंने अपने लोगों की समृद्धि के लिए व्यवसाय की परंपरा के लिए वैश्य समुदाय शुरू करने के लिए अग्रसेन (जो क्षत्रिय थे) का आग्रह किया। उसने उनसे एक नया राज्य स्थापित करने के लिए कहा, और वादा किया कि वह अपने वंश को समृद्धि के साथ आशीर्वाद देगी। उसने यह भी कहा कि उसके राज्य में धन की कमी नहीं होगी।

अग्रोहा की स्थापना

एक नए राज्य के लिए जगह चुनने के लिए अग्रसेन ने अपनी रानी के साथ पूरे भारत में यात्रा की। अपनी यात्रा के दौरान एक समय में, उन्हें कुछ बाघ शावक और भेड़िया शावकों को एक साथ देखे। राजा अग्रसेन और रानी माधवी के लिए, यह एक शुभ संकेत था कि क्षेत्र वीराभूमि (बहादुरी की भूमि) था और उन्होंने उस स्थान पर अपना नया राज्य पाया। जगह का नाम अग्रो था। अग्रोहा हरियाणा वर्तमान दिन हिसार के पास स्थित है। वर्तमान में अग्रोहा कृषि के पवित्र स्टेशन के रूप में विकसित हो रहा है, जिसमें अग्रसेन और वैष्णव देवी का एक बड़ा मंदिर है।

एक ईट और एक रुपया’ के सिद्धांत

महाराजा अग्रसेनने ‘एक ईट और एक रुपया’ के सिद्धांत की घोषणा की। जिसके अनुसार नगर में आने वाले हर नए परिवार को नगर में रहनेवाले हर परिवार की ओर से एक ईट और एक रुपया दिया जाएं। ईटों से वो अपने घर का निर्माण करें एवं रुपयों से व्यापार करें। इस तरह महाराजा अग्रसेन जी को समाजवाद के प्रणेता के रुप में पहचान मिली।

Essay on Maharaja Agrasen jayanti in Hindi

“महाराजा अग्रसेन जयंती” अश्विन शुक्ल प्रतिपदा के दिन धूम धाम से महाराजा अग्रसेन की याद में मनाई जाती है। नवरात्रि के पहले दिन अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है। सम्पूर्ण वैश्य समुदाय इनको बड़े हर्ष उल्लास से मनाता है। इनको “अग्रवाल समाज का जन्मदाता” कहा जाता है। “अग्रवाल समाज” की उत्पत्ति इनसे ही हुई है। महाराजा अग्रसेन महादानी, समाजवाद के प्रवर्तक, कर्मयोगी, लोकनायक, समाज सुधारक थे। उनके नाम पर देश भर में अनेक स्कूल, कॉलेज, धर्मशाला, अस्पताल, उद्द्यान, बनाये गये है।

जीवन परिचय

इनका जन्म द्वापर युग के अंत में और कलयुग की शुरुवात में आज से लगभग 5185 वर्ष पूर्व हुआ था। ये “अग्रोदय” नामक राज्य के महाराज थे जिसकी राजधानी अग्रोहा थी। ये बल्लभ गढ़ और आगरा के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र, शूरसेन के बड़े भाई थे। बचपन से बहुत दयालु, न्यायप्रिय, प्रजा को प्यार करने वाले, शांतिप्रिय, धार्मिक प्रवृति के, हिंसा का विरोध करने वाले, बलि प्रथा के विरोधी थे। ये जीव जानवरों से बहुत प्यार करते थे।

महाराजा अग्रसेन का विवाह

महाराजा अग्रसेन ने राजा नागराज कुमूद की बेटी माधवी के स्वयंवर में भाग लिया था। माधवी बेहद रूपवान और गुणवान कन्या था। उससे विवाह करने के लिए इंद्र और दूसरे देवता भी स्वयंवर में आये थे। सभी माधवी से विवाह को इक्छुक थे पर उसने महाराजा अग्रसेन से विवाह किया। इंद्र ने बदला लिया और प्रतापनगर में बारिश नही की। अकाल पड़ गया। महाराजा अग्रसेन इंद्र से युद्ध को तैयार हो गये पर नारद ने विवाद को शांत किया।

महाराजा अग्रसेन की तपस्या

महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य की खुशहाली के लिए काशी (बनारस) जाकर भगवान शिव की तपस्या की थी। शिव ने उनको दर्शन दिया और माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। फिर महाराजा अग्रसेन ने माँ लक्ष्मी की तपस्या करके उनको प्रसन्न कर दिया। माँ लक्ष्मी ने उनको एक नया राज्य बनाने को कहा और प्रजा की देखभाल करने को कहा।

“अग्रोदय” राज्य की स्थापना की कहानी

महाराज अग्रसेन अपनी रानी माधवी के साथ सम्पूर्ण भारत के भ्रमण पर निकल गये। वो किसी अनुकूल जगह अपना राज्य बनाना चाहते थे। वो ऐसी भूमी की तलाश में थे जो वीर और पवित्र भूमि हो। एक जगह उनको एक शेरनी अपने बच्चे को जन्म देती दिखी। जन्म लेते ही बच्चे ने महाराजा अग्रसेन के हाथी को खतरा समझकर उनपर हमला कर दिया। अग्रसेन को यह एक शुभ संकेत लगा। उनको दैवीय संकेत लगा कि यह भूमी वीरता से भरी है। इसी जगह इन्होने अपने राज्य “अग्रोदय” की स्थापना। जिस जगह शेरनी के बच्चे का जन्म हुआ था उसे अपनी राजधानी “अग्रोहा” बना दिया। वर्तमान में यह स्थान हरियाणा के हिसार में स्तिथ है। अग्रवाल समाज इसे अपना “पांचवा धाम” मानता है और इसकी पूजा करता है। यहाँ पर सरकार ने “अग्रोहा विकास ट्रस्ट” की स्थापना की है।

महाराजा अग्रसेन के 18 गोत्र

महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य को 18 राज्यों में विभक्त किया। महर्षि गर्ग ने उनको 18 गणाधिपतियों के साथ 18 यज्ञ करने का परामर्श दिया। यज्ञों में बैठे इन 18 गणाधिपतियों के नाम पर ही अग्रवाल समाज के 18 गोत्रो की स्थापना हुई। इन गोत्रों के नाम-

ऐरन
बंसल
बिंदल
भंदल
धारण
गर्ग
गोयल
गोयन
जिंदल
कंसल
कुच्छल
मधुकुल
मंगल
मित्तल
नागल
सिंघल
तायल
तिंगल

पशु बलि प्रथा को खत्म किया – जीव जंतुओ से प्रेम का संदेश दिया

महाराजा अग्रसेन जीव जंतुओ से बहुत स्नेह और प्यार करते थे। उस समय यज्ञों में पशुओं की बलि देने की प्रथा थी। जब 18 यज्ञ शुरू हुए हर एक यज्ञ में जानवरों की बलि होने लगी। इस तरह से 17 यज्ञ पूरे हो गये। पर जब 18 वें यज्ञ के लिए जीवित पशु की बलि होने लगी तो महाराजा अग्रसेन को इस हिंसा से बहुत घृणा उत्पन्न हो गयी। उन्होंने उसी वक्त बलि प्रथा को रोक दिया और घोषणा की कि उनके राज्य में कोई भी अब निर्दोष पशु की बलि नही देगा, ना ही कोई मांसाहार करेगा। सभी लोग जानवरों की रक्षा करेंगे। महाराजा अग्रसेन ने इसी वजह से सूर्यवंशी क्षत्रिय धर्म का त्याग कर दिया और वैश्य धर्म अपना लिया। वैश्य धर्म में कोई भी मांसाहार नही करता है। इस तरह हम देखते है की महाराजा अग्रसेन एक दयालु और जीव-जंतुओ से प्रेम करने वाले राजा थे।

महाराजा अग्रसेन के 3 आदर्श

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था
आर्थिक समानता व समरूपता
समाजिक समानता

महाराजा अग्रसेन का संयास

इन्होने 108 वर्षो तक अपने राज्य “अग्रोदय” में राज्य किया। फिर अपने कुलदेवी महालक्ष्मी से परामर्श कर आग्रेय गणराज्य की सत्ता अपने बड़े बेटे विभु को सौप दी और संयास ले लिया।

श्री अग्रसेन महाराज आरती

जय श्री अग्र हरे, स्वामी जय श्री अग्र हरे।
कोटि कोटि नत मस्तक, सादर नमन करें।। जय श्री।
आश्विन शुक्ल एकं, नृप वल्लभ जय।
अग्र वंश संस्थापक, नागवंश ब्याहे।। जय श्री।
केसरिया थ्वज फहरे, छात्र चवंर धारे।
झांझ, नफीरी नौबत बाजत तब द्वारे।। जय श्री।
अग्रोहा राजधानी, इंद्र शरण आये!
गोत्र अट्ठारह अनुपम, चारण गुंड गाये।। जय श्री।
सत्य, अहिंसा पालक, न्याय, नीति, समता!
ईंट, रूपए की रीति, प्रकट करे ममता।। जय श्री।
ब्रहम्मा, विष्णु, शंकर, वर सिंहनी दीन्हा।।
कुल देवी महामाया, वैश्य करम कीन्हा।। जय श्री।
अग्रसेन जी की आरती, जो कोई नर गाये!
कहत त्रिलोक विनय से सुख संम्पति पाए।। जय श्री!

समाजवाद के अग्रदूत

महाराजा अग्रसेन समाजवाद में विश्वास रखते थे। वो चाहते थे की उनकी प्रजा में अमीर गरीब की खाई न हो। सभी एक समान हो। इसलिए लिए उन्होंने ‘एक ईट और एक रुपया’ का सिद्धांत दिया। इसके अनुसार नगर में आने वाले बाहरी परिवार को नगर के हर एक परिवार से एक ईंट और एक रुपया दिया जाये। ईंट से वो घर बना लेंगे और रुपया से व्यापार करेंगे। सभी लोग ख़ुशी समृद्धि से रहेंगे। इस तरह से महाराजा अग्रसेन को “समाजवाद का प्रणेता” भी कहा जाता है। इनके शासनकाल में “अग्रोद्य गणराज्य” ने बहुत तरक्की की। इनके राज्य में लाखो व्यापारी रहते थे जो खुशहाली से अपना व्यापार करते थे।

महाराजा अग्रसेन पर पुस्तके

प्रसिद्द लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 1871 में “अग्रवालो की उत्पत्ति” नामक पुस्तक लिखी है जो बहुत ही प्रमाणिक जानकारी देती है।

महाराजा अग्रसेन पर डाक टिकट

भारत सरकार ने 24 सितंबर 1976 में महाराजा अग्रसेन के नाम पर 25 पैसे का डाक टिकट जारी कर उनका सम्मान किया था। सन 2012 में भारतीय डाक ने “अग्रसेन की बावली” पर डाक टिकट जारी किया।

महाराजा अग्रसेन के नाम पर हुआ युद्धपोत का नामकरण

सन 1995 में भारत सरकार ने दक्षिण कोरिया से 350 करोड़ में एक युद्धपोत ख़रीदा जिसका नाम “महाराजा अग्रसेन” रखा गया।

महाराजा अग्रसेन द्वारा समाज को दिया गया संदेश

हिंसा मत करो, अहिंसा को अपनाओ
जीव हत्या पाप है। जीव हत्या, बलि प्रथा समाप्त करो
समाजवादी बनो, न कोई अमीर हो न कोई गरीब, सभी एक समान हो
प्रजा से प्यार करो
लोकतंत्र की स्थापना करो
नैतिक मूल्यों का विकास करो
व्यापार और उद्योग करो जिससे सभी का पालन पोषण हो
गौपालन करो

अग्रसेन जयंती कैसे मनाते है?

इस दिन अग्रवाल और अग्रगाही, महाराजा अग्रसेन की पूजा करते है। देवी लक्ष्मी की भी पूजा की जाती है जिससे समृद्धि और खुशहाली बनी रहे। व्यापार और बिजनेस में तरक्की होती रहे। भक्त सुबह के समय अपने कुलदेवता के मन्दिर में जाकर पूजा करने जाते है।

सभी स्थानों पर शोभा यात्रा निकाली जाती है। यह यात्रा शहर के मुख्य मार्गो से होकर निकलती है। यात्रा में महाराजा अग्रसेन की प्रतिमा को सजाया जाता है। अग्रवाल और अग्रगाही समाज के लोग इस दिन अनेक तरह के सामाजिक कार्यक्रम जैसे भंडारा, गरीब लोगो को भोजन, कपड़ा दान जैसे कार्यक्रम करते है। जगह जगह खाना खिलाया जाता है। मेडिकल कैम्प लगाकर मरीजो का इलाज किया जाता है। महाराजा अग्रसेन पर गोषठी होती है। उनके योगदान और दी गयी शिक्षा के बारे में लोगो को बताया जाता है। इस दिन सम्पूर्ण वैश्य समुदाय उनको याद करता है और उनके पद चिन्हों पर चलने का प्रयास करता है।

निष्कर्ष

हम सभी को महाराजा अग्रसेन के बताये मार्ग पर चलना चाहिये। हिंसा से बचना चाहिये। जीव जंतुओ से प्यार करना चाहिये।

Agrasen Jayanti par Nibandh

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ऐसी मान्यता है कि महाराजा अग्रसेन अग्रवाल जाति के पितामह थे। धार्मिक मान्यतानुसार इनका जन्म मर्यादा पुरुषोतम भगवान श्रीराम की चौंतीसवी पीढ़ी में सूर्यवशीं क्षत्रिय कुल के महाराजा वल्लभ सेन के घर में द्वापर के अन्तिमकाल और कलियुग के प्रारम्भ में आज से 5000 वर्ष पूर्व हुआ था। महाराजा अग्रसेन समाजवाद के प्रर्वतक, युग पुरुष, राम राज्य के समर्थक एवं महादानी थे। महाराजा अग्रसेन उन महान् विभूतियों में से थे जो सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखायः कृत्यों द्वारा युगों-युगों तक अमर रहेगें |

जीवन परिचय

महाराजा अग्रसेन जी का जन्म अश्विन शुक्ल प्रतिपदा को हुआ, जिसे अग्रसेन जयंती के रूप में मनाया जाता है। महाराजा अग्रसेन का जन्म लगभग पाँच हज़ार वर्ष पूर्व प्रताप नगर के राजा वल्लभ के यहाँ सूर्यवंशी क्षत्रिय कुल में हुआ था। वर्तमान में राजस्थान व हरियाणा राज्य के बीच सरस्वती नदी के किनारे प्रतापनगर स्थित था। राजा वल्लभ के अग्रसेन और शूरसेन नामक दो पुत्र हुये। अग्रसेन महाराज वल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। महाराजा अग्रसेन के जन्म के समय गर्ग ॠषि ने महाराज वल्लभ से कहा था, कि यह बहुत बड़ा राजा बनेगा। इस के राज्य में एक नई शासन व्यवस्था उदय होगी और हज़ारों वर्ष बाद भी इनका नाम अमर होगा।

माधवी का वरण

महाराज अग्रसेन ने नाग लोक के राजा कुमद के यहाँ आयोजित स्वंयवर में राजकुमारी माधवी का वरण किया इस स्वंयवर में देव लोक से राजा इंद्र भी राजकुमारी माधवी से विवाह की इच्छा से उपस्थित थे परन्तु माधवी द्वारा श्री अग्रसेन का वरण करने से इंद्र कुपित होकर स्वंयवर स्थल से चले गये इस विवाह से नाग एवं आर्य कुल का नया गठबंधन हुआ।

तपस्या

कुपित इंद्र ने अपने अनुचरो से प्रताप नगर में वर्षा नहीं करने का आदेश दिया जिससे भयंकर आकाल पड़ा। चारों तरफ त्राहि त्राहि मच गई तब अग्रसेन और शूरसेन ने अपने दिव्य शस्त्रों का संधान कर इन्द्र से युद्ध कर प्रतापनगर को विपत्ति से बचाया। लेकिन यह समस्या का स्थायी समाधान नहीं था। तब अग्रसेन ने भगवान शंकर एवं महालक्ष्मी माता की अराधना की, इन्द्र ने अग्रसेन की तपस्या में अनेक बाधाएँ उत्पन्न कीं परन्तु श्री अग्रसेन की अविचल तपस्या से महालक्ष्मी प्रकट हुई एवं वरदान दिया कि तुम्हारे सभी मनोरथ सिद्ध होंगे। तुम्हारे द्वारा सबका मंगल होगा। माता को अग्रसेन ने इन्द्र की समस्या से अवगत कराया तो महालक्ष्मी ने कहा, इन्द्र को अनुभव प्राप्त है। आर्य एवं नागवंश की संधि और राजकुमारी माधवी के सौन्दर्य ने उसे दुखी कर दिया है, तुम्हें कूटनीति अपनानी होगी। कोलापुर के राजा भी नागवंशी है, यदि तुम उनकी पुत्री का वरण कर लेते हो तो कोलापुर नरेश महीरथ की शक्तियाँ तुम्हें प्राप्त हो जाएंगी, तब इन्द्र को तुम्हारे सामने आने के लिए अनेक बार सोचना पडेगा। तुम निडर होकर अपने नये राज्य की स्थापना करो।

सुन्दरावती का वरण

कोलापुर में नागराज महीरथ का शासन था। राजकुमारी सुन्दरावती के स्वयंवर में अनेक देशों के राजकुमार, वेश बदलकर अनेक गंधर्व व देवता उपस्थित थे, तब भगवान शंकर एवं माता लक्ष्मी की प्रेरणा से राजकुमारी ने श्री अग्रसेन को वरण किया। दो-दो नाग वंशों से संबंध स्थापित करने के बाद महाराजा वल्लभ के राज्य में अपार सुख समृद्धि व्याप्त हुई, इन्द्र भी श्री अग्रसेन से मैत्री के बाध्य हुये।

महाराजा वल्लभ के राज्य में अपार सुख समृद्धि व्याप्त हुई, इन्द्र भी श्री अग्रसेन से मैत्री के बाध्य हुये।

अग्रोहा का निर्माण

महाराजा वल्लभ के निधन के बाद श्री अग्रसेन राजा हुए और राजा वल्लभ के आशीर्वाद से लोहागढ़ सीमा से निकल कर अग्रसेन ने सरस्वती और यमुना नदी के बीच एक वीर भूमि खोजकर वहाँ अपने नए राज्य अग्रोहा का निर्माण किया और अपने छोटे भाई शूरसेन को प्रतापनगर का राजपाट सौंप दिया। ॠषि मुनियों और ज्योतिषियों की सलाह पर नये राज्य का नाम अग्रेयगण रखा गया जिसे अग्रोहा नाम से जाना जाता है।

अठारह यज्ञ

माता लक्ष्मी की कृपा से श्री अग्रसेन के 18 पुत्र हुये। राजकुमार विभु उनमें सबसे बड़े थे। महर्षि गर्ग ने महाराजा अग्रसेन को 18 पुत्र के साथ 18 यज्ञ करने का संकल्प करवाया। माना जाता है कि यज्ञों में बैठे 18 गुरुओं के नाम पर ही अग्रवंश (अग्रवाल समाज) की स्थापना हुई । यज्ञों में पशुबलि दी जाती थी। प्रथम यज्ञ के पुरोहित स्वयं गर्ग ॠषि बने, राजकुमार विभु को दीक्षित कर उन्हें गर्ग गोत्र से मंत्रित किया। इसी प्रकार दूसरा यज्ञ गोभिल ॠषि ने करवाया और द्वितीय पुत्र को गोयल गोत्र दिया। तीसरा यज्ञ गौतम ॠषि ने गोइन गोत्र धारण करवाया, चौथे में वत्स ॠषि ने बंसल गोत्र, पाँचवे में कौशिक ॠषि ने कंसल गोत्र, छठे शांडिल्य ॠषि ने सिंघल गोत्र, सातवे में मंगल ॠषि ने मंगल गोत्र, आठवें में जैमिन ने जिंदल गोत्र, नवें में तांड्य ॠषि ने तिंगल गोत्र, दसवें में और्व ॠषि ने ऐरन गोत्र, ग्यारवें में धौम्य ॠषि ने धारण गोत्र, बारहवें में मुदगल ॠषि ने मन्दल गोत्र, तेरहवें में वसिष्ठ ॠषि ने बिंदल गोत्र, चौदहवें में मैत्रेय ॠषि ने मित्तल गोत्र, पंद्रहवें कश्यप ॠषि ने कुच्छल गोत्र दिया। 17 यज्ञ पूर्ण हो चुके थे। जिस समय 18 वें यज्ञ में जीवित पशुओं की बलि दी जा रही थी, महाराज अग्रसेन को उस दृश्य को देखकर घृणा उत्पन्न हो गई। उन्होंने यज्ञ को बीच में ही रोक दिया और कहा कि भविष्य में मेरे राज्य का कोई भी व्यक्ति यज्ञ में पशुबलि नहीं देगा, न पशु को मारेगा, न माँस खाएगा और राज्य का हर व्यक्ति प्राणीमात्र की रक्षा करेगा। इस घटना से प्रभावित होकर उन्होंने क्षत्रिय धर्म को अपना लिया। अठारवें यज्ञ में नगेन्द्र ॠषि द्वारा नांगल गोत्र से अभिमंत्रित किया।

ॠषियों द्वारा प्रदत्त अठारह गोत्रों को महाराजा अग्रसेन के 18 पुत्रों के साथ महाराजा द्वारा बसायी 18 बस्तियों के निवासियों ने भी धारण कर लिया एक बस्ती के साथ प्रेम भाव बनाये रखने के लिए एक सर्वसम्मत निर्णय हुआ कि अपने पुत्र और पुत्री का विवाह अपनी बस्ती में नहीं दूसरी बस्ती में करेंगे। आगे चलकर यह व्यवस्था गोत्रों में बदल गई जो आज भी अग्रवाल समाज में प्रचलित है।

अठारह गोत्र

महाराज अग्रसेन के 18 पुत्र हुए, जिनके नाम पर वर्तमान में अग्रवालों के 18 गोत्र हैं। ये गोत्र निम्नलिखित हैं: –

गोत्रों के नाम-  ऐरन बंसल बिंदल भंदल धारण गर्ग गोयल गोयन जिंदल कंसल कुच्छल मधुकुल मंगल मित्तल नागल सिंघल तायल तिंगल

समाजवाद का अग्रदूत

महाराजा अग्रसेन को समाजवाद का अग्रदूत कहा जाता है। अपने क्षेत्र में सच्चे समाजवाद की स्थापना हेतु उन्होंने नियम बनाया कि उनके नगर में बाहर से आकर बसने वाले व्यक्ति की सहायता के लिए नगर का प्रत्येक निवासी उसे एक रुपया व एक ईंट देगा, जिससे आसानी से उसके लिए निवास स्थान व व्यापार का प्रबंध हो जाए। महाराजा अग्रसेन ने तंत्रीय शासन प्रणाली के प्रतिकार में एक नयी व्यवस्था को जन्म दिया, उन्होंने पुनः वैदिक सनातन आर्य सस्कृंति की मूल मान्यताओं को लागू कर राज्य की पुनर्गठन में कृषि-व्यापार, उद्योग, गौपालन के विकास के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की पुनः प्रतिष्ठा का बीड़ा उठाया।

महाराज अग्रसेन ने 108 वर्षों तक राज किया। उन्होंने महाराज अग्रसेन जीवन मूल्यों को ग्रहण किया उनमें परंपरा एवं प्रयोग का संतुलित सामंजस्य दिखाई देता है। महाराज अग्रसेन ने एक ओर हिन्दू धर्म ग्रंथों में वैश्य वर्ण के लिए निर्देशित कर्म क्षेत्र को स्वीकार किया और दूसरी ओर देशकाल के परिप्रेक्ष्य में नए आदर्श स्थापित किए। उनके जीवन के मूल रूप से तीन आदर्श हैं- लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, आर्थिक समरूपता एवं सामाजिक समानता। एक निश्‍चित आयु प्राप्त करने के बाद कुलदेवी महालक्ष्मी से परामर्श पर वे आग्रेय गणराज्य का शासन अपने ज्येष्ठ पुत्र विभु के हाथों में सौंपकर तपस्या करने चले गए।

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